ये कभी न होंगे अपने …

अपने आस-पास ऎसे लोग बहुत बड़ी संख्या में विचरण करते रहे हैं जो अपनी पहचान कायम करने के फेर में वो सब कुछ कर रहे हैं जिनसे परायेपन और अलगाव का बोध होता है। इन लोगों के जीवन में सब कुछ पराया होता है। खुद का कहने को शरीर भर है, मन, आत्मा और विचारों से लेकर इनके प्रत्येक कर्म में बू आती है परायेपन की, ऎसे में ये किसी के नहीं हो सकते।

अपनी पहचान को कायम रखने की गरज से ये लोग दूसरों को खुश रखने के लिए रोजाना करते रहते हैं समझौते, जो कभी पाक नहीं होते। अपने आपको बुलन्द करने के भरम में न इन्हें अपनी आत्मा की आवाज सुनाई देती है, न अपनों की।  ऎसे में पराए अपने लगने लगते हैं और जो अपने हैं वे पराए।

जो लोग अपनी पहचान बनाने के सफर में निकले हैं उन्हें चाहिए कि जो कुछ करें वो सब सही-सही और यथार्थ हो, अन्यथा दूसरों के भरोसे बटोरी जाने वाली साख के पहाड़ भी जमा कर लिए जाएँ तब भी कोई छोटी सी चिंगारी और हवाओं का जोर इसे अस्तित्वहीन कर देने के लिए काफी होते हैं।

ऎसे लोगों की क्षणिक पहचान बन जरूर जाती है मगर फिर ऎसी मिटती है कि दुबारा कोई इनके बारे में सोच भी नहीं सकता। इसलिए कुछ लोगों पर कोई भरोसा कभी नहीं किया जा सकता। इन लोगों को जैसे हैं वैसे ही स्वीकार करते हुए भगवान के भरोसे छोड़ दें। इनमें बदलाव लाने का कोई प्रयास न करें। ऎसे लोगों पर किया जाने वाला समय, श्रम और पैसे का खर्च बेकार सिद्ध होता है। इन्हें अपने हाल पर जीने के लिए छोड़ दें।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *