असुर ही हैं पारिवारिक सुख छीनने वाले

विश्व की लघुतम इकाई परिवार है। इसी से समुदाय, क्षेत्र, प्रदेश एवं देश बनता है और दुनिया के रूप में पृथ्वी पर मानव समुद्र का सृजन करता है। घर-परिवार से लेकर दुनिया का कोई सा महानतम या दुश्कर कार्य हो, वह परिवार से हमारे रिश्तों पर निर्भर करता है।
जो इंसान जितना अधिक पारिवारिक होता है वह उतना अधिक इंसानियत से भरा-पूरा व सेवाभावी होता है और मानवता की भलाई के लिए उतने अधिक समर्पण भाव से काम करता है।
जो कुटुम्ब के साथ रहता है वही वसुधैव कुटुम्बकम् का उद्घोष कर सकता है बाकी तो सारे लोग केवल नारे ही लगाने वाली किराये की भीड़ का हिस्सा हुआ करते हैं।
जो मनुष्य जितना अधिक पारिवारिक होता है उतना ही अधिक सामाजिक होता है। पारिवारिक आत्मीयता का भाव जिसमें अधिक होता है उसकी सामाजिकता का प्रतिशत भी उतना ही अधिक ही रहता है। न घर-परिवार के लोगों का ये मान रखते हैं, न माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, गुरुओं, मार्गदर्शकों, सम्बलदाताओं या सहयोगियों का या और किसी का। बल्कि इन बुजुर्गों और मददगारों की उपेक्षा में भी इन्हें आनंद आता है।
ऎसे संस्कारहीन और कुटुम्ब केन्द्र से भटके हुए लोगों का अपने परिवार से कोई माधुर्य भरा रिश्ता नहीं होता है बल्कि परिवार के लोग और संबंधी इन्हें जी भर कर कोसते हैं, इनकी संस्कारहीनता और मर्यादाविमुखता का जिक्र करते हुए निन्दा तक करते रहते हैं।
पर इस निर्लज्ज और संवेदनहीन प्रजाति के लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जो लोग अपने माँ-बाप या कुटुम्ब के नहीं हो सकते, वे न समाज या क्षेत्र के हो सकते हैं, न देश के। इनके लिए अपने स्वार्थ के आगे सब कुछ बौना होता है।
दूसरी प्रजाति में वे लोग आते हैं जो आसुरी परंपराओं को जीवित रखते हुए हमेशा यही प्रयास करते रहते हैं कि पारिवारिक सुख पाने वाले लोगों को किस तरह परेशान किया जाए, किस प्रकार लोगों को अपने घर-परिवार और क्षेत्र से विलग रखा जाए, किस प्रकार प्रताड़ित किया जाए। उनका पारिवारिक सुख और आनन्द किस प्रकार खत्म किया जाए, परिवार के साथ रहने वाले लोगों को किस प्रकार परिवार से दूर-बहुत दूर रखा जाए ताकि उनके कौटुम्बिक सुख की निर्मम हत्या को देख-देख कर इन रक्तबीजों को तृप्ति मिलती रहे।
पूरी दुनिया में सामाजिकता और असामाजिकता के मौजूदा हालातों और कारणों पर गहन शोध किया जाए तो यही सामने आता है कि जो लोग परिवार के साथ आत्मीयता के साथ रहते हैं वे लोग मानवीय संवेदनाओं, सहानुभूति और सहिष्णुता के संवाहक और पालनकर्ता होते हैं और ये अपने कर्मयोग को अच्छी तरह निभा सकने में समर्थ होते हैं।
इन लोगाें की मानसिक और शारीरिक सेहत अपेक्षाकृत बेहतर होती है। ये दीर्घायु होने के साथ-साथ सामाजिक सेवा और परोपकार के क्षेत्रों में भी अग्रणी और उल्लेखनीय भूमिका का निर्वाह करते हैं।
सच कहा जाए तो ये लोग किसी भी समुदाय, क्षेत्र या देश की वो धरोहर हैं जिसके सहारे देश आगे बढ़ता है और तरक्की के मुकाम दर मुकाम तय करता निरन्तर बढ़ता ही चला जाता है। दूसरी ओर परिवार से दूर रहने या कर दिए जाने वाले लोगों में मानवीय संवेदनाओं का उतना ग्राफ हो ही, यह नहीं कहा जा सकता।
आजकल देश, क्षेत्र और समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा असामाजिकता का है और इसी कारण से कई समस्याएं बढ़ती ही जा रही हैं। देश में विचित्र प्रजाति पनपती जा रही है जिसका काम ही रह गया है अन्याय, शोषण और अत्याचार।
और इसके लिए सबसे बड़ा हथियार बन गया है किसी न किसी बहाने पारिवारिक सुख की निर्मम हत्या। बहुत सारे लोग हैं जिनके लिए ये अचूक अस्त्र और सहारा बना हुआ है जिसके सहारे वे कुछ भी कर गुजरते हैं, किसी भी हद तक जा सकते हैं।
यों कहा जाए कि इन शुम्भ-निशुम्भों, महिषासुरों और चण्ड-मुण्डों की पूरी जिन्दगी ही इस पर टिकी हुई है तो कुछ बुरा नहीं है। पशु-पक्षी और मनुष्य हो या कोई सा जीव, सभी चाहते हैं कि अपने कुटुम्ब-कुनबे के साथ रहें, इसी मोह को कमजोर नस मानकर ये आसुरी भावों से भरे लोग प्रहार करते हैं और अपने तीर चलाते रहते हैं।
कई बार ये विषबुझे तीर इतने घातक होते हैं कि इंसान की पूरी की पूरी जिन्दगी को तबाह कर डालते हैं। लेकिन इससे उन लोगाेंं को क्या, जिनके लिए सामाजिकता, मानवीय संवेदनाओं और मर्यादाओं से कहीं अधिक मूल्य है कच्चे कानों में आने वाली आवाजों का, अपने आगे-पीछे मण्डराने और जयगान करते हुए पुचकारने वालों का, अपने लिए सब कुछ करने वालों का, अपनी सेवा-चाकरी में सर्वस्व समर्पण भाव से जुटे अनुचरों का। और उन सभी का जिनसे असुरों को गहन तृप्ति का दिली अहसास होता है।
देश की सर्वाधिक समस्याओं का मूल कारण पारिवारिक विखण्डन है, संयुक्त परिवार प्रथा का क्षरण है और इसके लिए जो लोग जिम्मेदार हैं वे असामाजिक कहे जाने चाहिएं। असल में ये लोग समाज और देश के लिए अभिशाप भी हैं और कलंक भी।
हम चाहे कितनी बड़ी-बड़ी बातें कर लें सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की, विश्व बन्धुत्व, परम वैभव, मातृभूमि की सेवा व समर्पण, सौहार्द और भाईचारे की, सहिष्णुता और सहनशीलता की। जब तक दुनिया के निर्माण की लघुतम इकाई परिवार का माधर्यु, साहचर्य और समन्वय नहीं होगा तब तब सब कुछ बेमानी है।
आज का युगधर्म और पुण्य यही है कि किसी का पारिवारिक सुख-चैन न छीनें, हरसंभव परिवार सुख प्रदान करने के लिए सहूलियतदाता बनें और पारिवारिक आनंद की हत्या के दोष व पाप से अपने आपको बचाएं रखें।
जो लोग परिवार सुख में बाधा डालते हैं, जानबूझकर, आनंद पाने या प्रतिशोध में आकर किसी का पारिवारिक सुख छीनते रहते हैं वे भले ही कुछ दिनों के लिए खुश हो जाएं और अपने अहंकार की तृप्ति की महा डकार सुनाते रहें, अपने पैशाचिक वजूद का सिंहासन दिखाते रहें, मगर एक न एक दिन इनका पाप का घड़ा इतना अधिक भर जाता है कि ये कहीं के नहीं रहते। परिवार सुख आज का सबसे बड़ा धर्म है और इसमें सहभागी बनना सबसे बड़ा पुण्य।