बदबू फैलाते हैं ये सड़े हुए लोग

हर क्रिया के पीछे तीन प्रभाव होते हैं। बुरा, अच्छा या उदासीन। बहुत कम मामलों में उदासीन स्वभाव बना रहता है। शेष सब कुछ या तो बुरा और अच्छा ही होगा। न कुछ आंशिक बुरा होता है, न आंशिक अच्छा।

इस मामले में परम्परागत संस्कार, सिद्धान्त, मर्यादाएँ और सीमाएँ ही हैं जो अच्छे-बुरे का निर्णय करती हैं। इसके लिए हमारी सभ्यता और संस्कृति के पुरातन मूल्यों का आधार माना जाता रहा है।

 जो सृष्टि के लिए कल्याणकारी, आनंद देने वाला है, जिसके अवलम्बन से आत्मिक प्रसन्नता का बोध होता है, बार-बार दोहराने की इच्छा होती है और श्रेष्ठ लोगों द्वारा सराहा जाता है, वह हर कर्म अच्छा है और अच्छाइयां देने वाला है।

इसके ठीक विपरीत जिस कर्म से न हमें आत्मिक प्रसन्नता हो, न औरों को। दूसरों को पीड़ा, दुःख और विषाद का अनुभव हो, परिवेश में नकारात्मक भावों का संचरण हो, समझदार और श्रेष्ठ लोग जिसकी निन्दा करें, उलाहना दें, दुबारा न उस कर्म को करने की इच्छा हो, न देखने की, तब समझ लेना चाहिए कि यह कर्म निन्दित और त्याज्य है तथा सीधे-सीधे शब्दों में कहा जाए तो यह बुरा कर्म है।

इस हिसाब से बुरे और अच्छे का आकलन किया जाकर उन्हीं कर्मों को अपनाया जाना चाहिए जो अच्छे, सच्चे और श्रेष्ठ हैं तथा जिनसे आत्मा के स्तर से लेकर परिवेश तक में आनंद भाव, उमंग और उल्लास का संचरण होता रहे।

हर इंसान बुरे-भले कर्म और बुराई-अच्छाई में भेद को अच्छी तरह समझता है लेकिन कभी अपने हीन संस्कारों, वर्ण संकरता, कभी घटिया और घृणित संगी-साथियों तथा कभी पुरुषार्थहीन खान-पान, नशे और दूसरे व्यसनों से प्रभावित होकर वह सस्ते और घटिया मजे को पाने के लिए सारी मर्यादाओं और सीमाओं को त्याग कर नंगे-भूखे और उन्मादी की तरह व्यवहार करता है।

उसके लिए बुराई किसी भेल-पूड़ी, चाट-पकौड़ी और नमकीन की तरह ही स्वाद देने लगती है। फिर जो स्वाद बिना मेहनत किए, मुफ्त में मिलता रहे, औरों की दया से प्राप्त होता रहे उसे पाने के लिए इंसान  हमेशा आतुर रहता है।

आजकल सब तरफ यही कुछ हो रहा है। काले मन और खुराफाती दिमाग वाले, बेड़ौल जिस्म को ढो रहे निरंकुश लोगों की स्थिति उस पागल साण्ड की तरह हो जाया करती है जो रेत या मिट्टी के ढेर में सिंग फंसा कर धूल उछालता है और अपने आपको सारी सृष्टि का नियंता मानकर उछलकूद करता रहता है। 

आजकल ऎसे बहुत सारे उन्मादी साण्डों की भीड़ हर तरफ बढ़ती जा रही है। इंसान अब खूब सारे विचित्र और अजीबोगरीब हालातों में जीने लगा है। बहुसंख्य लोगों की जिन्दगी अपने रईस माँ-बाप और कुटुम्बियों के सहारे चल रही है, इन्हें न कमाने की जरूरत है, न कोई मेहनत करने की।

इनके बाप-दादाओं ने मजूरों की तरह काम करते हुए, पसीना बहाकर, कृपणता ओढ़कर खुद को कृत्रिम विपन्न बनाते हुए इनके लिए इतनी अकूत सम्पदा जमा कर रखी है कि इन्हें कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है।

खाए जाओ, गुलछर्रे उड़ाये जाओ। फिर ऎसे लोगों के लिए पानी की तरह पैसा बहाने के लिए भगवान ने इन्हें संगी-साथियों की फौज भी ऎसी दे रखी है कि खर्च करने में किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं आती। संचित पूंजी  का क्रमिक खात्मा करने के लिए ये आस-पास मण्डराने वाले लोग ही काफी होते हैंं।

इन लोगों के माथे और हाथ में पराये पैसों पर मौज उड़ाने की लकीरें बनी होती हैं। लुटाने वाले भी खूब हैं और लूटने वाले भी। इसी प्रकार बहुत सारे लोग दिन-महीने-साल यों ही गुजार दिया करते हैं। इन लोगों को समय की कीमत ही नहीं मालूम।

दुनिया में काफी आबादी उन लोगों की है जिन्हें समय काटना भारी पड़ रहा है इसलिए रोजमर्रा की जिन्दगी में उनके पास करने को न कोई काम होता है, न जीवन का कोई लक्ष्य। इन लोगों की जिन्दगी या तो नशे की तलब पूरी करने में गुजर जाती है, ताश खेलने में निकल जाती है या फिर दूसरों की बुराई करने में।

अधिकांश लोगों के लिए टाईमपास और सस्ते मनोरंजन का सबसे सरल, सहज और सुलभ माध्यम है बुराई करना। अधिकांश लोगों के लिए बुराई करना ऎसा मुफ्त का काम है जिसमें अपनी ओर से कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ता। बुराई करते रहो, अपने आप बुराइयों का भण्डार सुनने को मिलता रहेगा। कारण यह कि इंसान के लिए सबसे सस्ता मनोरंजन यही है।

यही वजह है कि आजकल बुराई करने वाले और सुनने वाले लोगों की गिनती तक नहीं की जा सकती। हर क्षेत्र, हर गली और हर बाड़े-कूचे में खूब सारे लोग ऎसे फालतू मिल जाएंगे जिनके पास कुछ भी ऎसा नहीं है जिसे अच्छा कहा जा सकता हो।

इन लोगों की जिन्दगी ही बुराई करने के लिए है, पूरा जीवन बुरे, घृणित और हीन कर्मों के लिए है और बुराई करना इनके लिए जीवनदायी की तरह काम करता है। दो-चार घण्टे किसी की बुराई किए बिना गुजार दें तो इनकी स्थिति निर्जलीकरण और कुपोषण प्रभावित हो जाती है।

सडांध के भभकों और कूड़ा-करकट के सजातीय आकर्षण की तरह इन बुरे और नुगरे लोगों को अपनी ही तरह के खूब सारे लोग ऎसे मिल जाते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि इनके मुँह से कभी किसी की अच्छाई नहीं सुनी गई, हमेशा ये लोग किसी न किसी की बुराई करते हुए आत्म आनंदित होते रहते हैं।

 इन्हें खुश देखना चाहें तो इनके सामने किसी न किसी की बुराई करते रहो, बुरे कामों के ताने-बाने बुनते रहो, औरों को बेवजह परेशान और दुःखी करने के सारे खोटे करम करते रहो, दूसरों को नुकसान पहुंचाने के हरसंभव उपायों के बारे में इनसे चर्चा करते रहो, ये खुश रहेंगे।

इन लोगों की जिन्दगी का मूलाधार ही बुराई है, बुरे कर्म हैं। इस मामले में ये कलियुग मेें अंधकासुर कहे जा सकते हैं जिनकी जिन्दगी का मकसद अंधेरों की खुशामद करना, चिमगादड़ों और उल्लूओं की तरह अंधेरों से चिपके रहना और बुराइयों भरे खोटे कामों में रमे रहते हुए दुनिया में प्रदूषण फैलाना ही रह गया है।

आजकल ऎसे लोगों की रेवड़ें सर्वत्र विद्यमान हैं। कुल मिलाकर आशय यही है कि जो इंसान बुराई सुनने और सुनाने में रुचि लेता है, बुरे कर्म करता है, वह बुरा है। क्योंकि हर बुरा आदमी चाहता है कि दुनिया भर की बुराई के बारे में जानें, उसका संग्रहण करे तभी वह बुराइयों का प्रस्फुटन कर सकता है।

आजकल के हर इंसान का यही पैमाना है। जो बुरा सुनता है, बुराई करता है, वह सौ फीसदी बुरा होगा ही। ऎसे लोगों का साथ, सान्निध्य और किसी भी प्रकार का सम्पर्क तक महापातकी बनाने वाला होता है।

ऎसे बुरे लोगों के शगुन जो लेता है उसका जीवन नारकीय हो जाता है।  इसलिए इन महान पातकियों से दूर रहें और जीवन भर के लिए यह संकल्प लें कि न किसी की बुराई करें, न किसी के बारे में बुरा सुनें। बुराई सुनने-सुनने के लिए बहुत सारे कूड़ादान और डंपिंग यार्ड विद्यमान हैं जो इस काम में दिन-रात जुटे हुए हैं। इन्हेंं अपना काम करने दें।

फिर भी इतना तो कहना ही पड़ेगा कि परिवेश में जो बदबू के भभके उठते रहे हैं उनके पीछे ये सड़े हुए लोग अधिक जिम्मेदार हैं जिनका दिल-दिमाग और जिस्म सब कुछ बुराइयों के प्रदूषण से इतना भरा हुआ है कि कई जन्मोंं में भी खाली न हो।

जात-जात के कुत्ते दिखने और अठखेलियां करने में चाहे कितने ही अच्छे लगें, लेकिन जब ये सड़ जाते हैं तब खुद के मुँह से अपने जिस्म के खून को चूसते रहने का आनंद पाते हैं किन्तु आस-पास इतनी बदबू फैलाते रहते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। इन हालातों को देखकर हर कोई यही कहता है कि हे भगवान! इन सड़ियल कुत्तों को मुक्ति दे और जितना जल्द हो, हमसे दूर कर।

सच्चे मन से की गई प्रार्थनाओं में दम होता है, भगवान जरूर सुनता है। इसलिए इन सड़े हुए लोगों को समझाने में अपना समय न गँवाएं बल्कि भगवान से प्रार्थना करें कि संसार को इनसे मुक्ति दिलाएं ताकि सब लोग राजी-खुशी रहते हुए मानवता की सुगंध के कतरों का आनंद पाते हुए अच्छी तरह जी सकें, जियो और जीने दो का उद्घोष कर सकें।

1 thought on “बदबू फैलाते हैं ये सड़े हुए लोग

  1. सड़ियल कुत्तों की तरह सडान्ध मारते मलीन लोगों से रहें सावधान …
    इंसान के लिए जरूरी है कि वह दिल का साफ, दिमाग का शुद्ध और शरीर का स्वस्थ हो। लेकिन खूब सारे लोग ऎसे देखे जाते हैं जो लोक व्यवहार में अपने आपको गुणी, सर्वश्रेष्ठ कर्मयोगी, सहज-सरल और मधुरभाषी सिद्ध करने के लिए भले ही ऊपर से दोहरा चरित्र दिखाएं, मगर उनके दिमाग में हमेशा खुराफात भरी रहती है, दिल में हमेशा मलीनता का ज्वार उमड़ता रहता है और हराम के तथा मुुफतिया खान-पान से पूरा का पूरा जिस्म परायी गन्दगी के कारण किसी माँसाहारी खूंखार जीव की तरह सडान्ध मारता रहता है।
    ऎसे लोग जहाँ होते हैं वहाँ व्यापक पैमाने पर नकारात्मकता का माहौल कई-कई मीटर परिधि तक पसरा रहता है और वे स्थल कबाड़ होने लगते हैं जहाँ इनकी मौजूदगी बनी रहती है। इनकी मौजूदगी या आवागमन मात्र से सारी आसुरी और नकारात्मक शक्तियाँ उन कार्यस्थलों और परिसरों में पसरी रहती हैं, जहाँ इनका डेरा या परिभ्रमण होता है।
    बाहर से दिखने पर कई सारे लोग इनकी तारीफ इसलिए करते हैं क्योेंकि उन्हें इनके असली चरित्र, चाल-चलन और कुचेष्टाओं का पता ही नहीं होता, वे केवल इनकी चिकनी-चुपड़ी, मीठी और बनावटी बातों में आ जाते हैं। फिर ये दोहरे-तिहरे चरित्र वाले नुगरे लोग सज्जनों की निन्दा करते हुए आगे बढ़ने और दुनिया के सारे वैध-अवैध लाभ पाने के आदी हो जाते हैं।
    संसार भर का परम सत्य यही है कि जो जितना अधिक दुष्ट, कामचोर, लम्पट, भ्रष्ट और बेईमान होता है, उसे उतने अधिक पैमाने पर बनावटी और मिलावटी छद्म व बाहरी व्यक्तित्व के निर्माण के लिए सजग और सचेत रहना पड़ता है।
    ऎसे लोगों के असली चरित्र को जानने के लिए निरपेक्ष भाव से चिन्तन करने की आवश्यकता है ताकि समाज और क्षेत्र में पूज्य, सम्माननीय और आदरणीय माने जाने वाले ऎसे लोगों की असलियत सभी के सामने आ सके और इनकी कलई खुल सके। ऎसे लोगों को बेनकाब करना भी समाज और देश की सबसे बड़ी सेवा और स्वच्छता अभियान का हिस्सा है। आईये हम सभी मिलकर इस दिशा में कदम बढ़ाएं।

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