असली देशद्रोही तो ये लोग हैं

देशद्रोहियों, संस्कृति नाशकों और विधर्मियों को बाहर कहीं तलाशने की आवश्यकता नहीं है। हमारे अपने कहे जाने वाले उन महान, पॉवर युक्त और बड़े लोगों को देख लीजियें जो हमें शक्तिहीन करने के लिए न हमारे धर्म-कर्म की स्वतंत्रता बरकरार रखने  देते हैं, न हमें पूजा-पाठ करने देते हैं, न हमें अपने उन अवकाशों को भुगतने देते हैं जिनका उपयोग हम शक्ति संचय, सांस्कृतिकता के निर्वाह और सनातन परंपराओं में भागीदारी में करना चाहते हैं। ऊँचे आसनों पर बैठे ये लोग खुद को शक्ति सम्पन्न बनाने के लिए बाबाओं, तांत्रिकों और पण्डितों से लेकर मन्दिर-मन्दिर चक्कर काटते रहते हैं, नवरात्रियों में अनुष्ठान करवाते रहते हैं, और आम लोगों को किसी न किसी चक्कर में ऎसे फांदे रखते हैं कि वे कुछ न कर पाएं।  नवरात्रि या अन्य सभी पर्वों पर शक्तिसंचय के लिए हम लोग मंत्र जप, त्याग-तपस्या, पूजा-पाठ और अनुष्ठान करते रहते हैं। यह संचित शक्ति हमें तथा हमारे देश को शक्ति सम्पन्न बनाए रखती है। किसी एक पर्व या नवरात्रि में ही यदि देशवासी मंत्र जाप करते हैं तो अरबों मंत्र जाप की शक्ति देश को प्राप्त होती है, ब्रह्माण्ड में इसका प्रभाव दिखने लगता है, अक्षर ब्रह्म हमारे देश को पावन भी बनाता है और शक्ति सम्पन्न भी। लेकिन पिछले कुछ दशक से देखा जा रहा है कि जो लोग अपने आपको स्वयंभू ईश्वर मान बैठे हैं वे देशवासियों के हाथ में शक्तिसंचय के अवसर छीन रहे हैं, किसी न किसी तरह साधकों और आम भक्तों के पर्व व नवरात्रि अवकाशों में किसी न किसी बहाने समय नष्ट कर दिया करते हैं ताकि आम लोग साधना करते हुए शक्ति का संचय नहीं कर सकें और वे शक्तिहीन दास की भूमिका में बने रहें। दुर्भाग्य से एक ख्ेाप ऎसी आ रही है जिसका भारत की संस्कृति, संस्कारों, परंपराओं और धर्म से कोई सरोकार नहीं है, ये लोग पाश्चात्य संस्कृति के प्रभावों से घिरे हुए हैं और देश को गर्त में ले जाने के लिए मैकाले के परदादाओं की तरह व्यवहार कर रहे हैं।  यह भी दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि जो लोग राष्ट्रवाद की बातें करते हैं, राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाने का दम भरते हैं, भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के ढोल बजाते हैं, हिन्दू संस्कृति और हिन्दुओं के कल्याण की बातें करते हैं वे लोग भी इस विषय पर चुप्पी साधे हुए हैं। देश को शक्ति सम्पन्न बनाना है, ऊर्जावान नागरिकों का निर्माण करना है, समस्याओं और विषमताओं से निपटना है, आतंकवादियों का समूल  सफाया करना है, तो शक्ति संचय करना जरूरी है चाहे वह मंत्र शक्ति हो अथवा दैवीय शक्ति, लेकिन यह तभी प्राप्त हो सकना संभव है जब हम अपने नागरिकों को परंपरागत धर्म, संस्कृति और परंपराओं के अनुरूप अपने कर्तव्य निर्वाह और साधना के लिए समय दें। इसके लिए उन लोगों पर कठोर पाबंदी लगानी होगी जो लोग भारतीय उत्सव-पर्व-त्योहारों, नवरात्रियों और शक्ति संचय के विभिन्न पर्वों पर लोगों को घेरे रखकर शक्ति संचय के अवसरों की निर्मम हत्या करते हैं। असल में वे सारे लोग देशद्रोही से कम नहीं हैं जो अपने नागरिकों को धर्म, संस्कृति एवं परंपराओं के माध्यम से संस्कृति रक्षा और दैवीय ऊर्जाओं की प्राप्ति के मार्ग में बाधक बनते हैं। इन देशद्रोहियों को पनपाने के लिए वे बाबा और पण्डित भी दोषी हैं जो कि इनके लिए तंत्र-मंत्र, अनुष्ठान और पूजा-पाठ करते-करवाते हैं। उन सभी बड़े और महान कहे जाने वाले लोगों को सोचना चाहिए कि आम जन को शक्तिसंचय और दैवीय कृपा प्राप्ति के अवसरों से किसी न किसी बहाने वंचित कर वे लोग देश की समग्र ऊर्जा शक्ति को ही खत्म कर रहे हैं।  क्यों न ठोस व्यवस्था की जाए  कि इंसान को अवकाशों के उपभोग, धर्म-संस्कृति और पर्वों तथा परंपराओं के निर्वाह की पूरी स्वतंत्रता मिले और इस दौरान कोई से दूसरे कार्यक्रम, बैठकों, आयोजनों पर सख्ती से पाबंदी हो।  वर्तमान युग में अधिकांश लोगों के तनावों, घातक बीमारियों और सामाजिक एवं पारिवारिक समस्याओं का मूल कारण वे एक-दो फीसदी लोग ही हैं जो हर क्षण अपनी चवन्नियां चलाना चाहते हैं। और चाहते हैं कि जो समय मिला है वह दूसरों को किसी न किसी तरह तंग करने के लिए है, शोषण के लिए है। देश के बुद्धिजीवियों के लिए यह गंभीर चिन्तन का विषय है।  बुद्धिबेचकों को भी सोचना चाहिए कि आखिर वे देश को किस दिशा में ले जा रहे हैं। भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद और परंपराओं की बातें करने वाले लोगों को भी सोचना चाहिए कि उनकी चुप्पी देश को कहां ले जाएगी। कर्मयोग तभी तक स्वस्थ रह सकता है जब तक वह संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा रहे, अन्यथा वह इंसान, समाज और देश के लिए पराभव का कारण बनता है।