ढपोड़शंखी ही हैं ये शापित मूर्तियाँ

मूर्तियों के बारे में कहा जाता है कि ये प्रेरणा का संचार करती हैं और जो कोई इनके दर्शन करता है उसे धन्य कर देती हैं। भक्ति, श्रद्धा और धर्म के दायरों से बँधी मूर्तियों के अलावा समाज-जीवन और देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी उल्लेखनीय छाप छोड़ने वाले महापुरुषों की मूर्तियों की स्थापना कर समय-समय पर श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता रहा है।

ये उन लोगों का पावन स्मरण है जिन्होंने अपने जीवनकाल में समाज और देश के लिए कुछ अलग और उल्लेखनीय भूमिका का निर्वाह किया होता है और उनके प्रति कृतज्ञता भाव दर्शाने के लिए मूर्तियाँ श्रेष्ठ माध्यम हैं।

इन लोगों में से बिरले ही ऎसे होते हैं जिन्हें जीवनकाल में भी उतना ही सम्मान प्राप्त होता है लेकिन भारतीय मनोविज्ञान का तकाजा है कि अधिकांश की पहचान और महत्त्व का जागरण मरणोपरान्त ही होता है।

यह तो उन लोगों की बात है जो वाकई अच्छे होते हैं और सच्चा-अच्छा कुछ ऎसा कर जाते हैं कि सदियों तक पीढ़ियाँ याद रखती हैं। इनके अलावा जीवन्त मूर्तियों का भी एक बहुत बड़ा संसार है जो हमेशा वर्तमान में ही जीता है और वर्तमान में ही रमण करता हुआ अपने जीवन को धन्य करता है।

इस प्रकार की मूर्तियों के लिए किसी सर्कल, चौराहों अथवा बाग-बगीचों तक जाने की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि ऎसी मूर्तियाँ हमारे आस-पास ही हुआ करती हैं। जिस हिसाब से आजकल मानवीय आभामण्डल का क्षरण होता जा रहा है उस दृष्टि से इन मूर्तियों की संख्या सभी जगह खूब बढ़ती ही जा रही है।

इन जीवन्त मूर्तियों की ढेरों किस्में हैं और हर किस्म का अपना रोचक इतिहास है, रोमांटिक गाथाएं हैं, स्मरणीय कर्मयोग है तथा करतूतें ऎसी कि जिन्दगी भर याद रहें। ये मूर्तियां सिर्फ अपने ही काम आती हैं, किसी ओर के काम आना इनके क्षेत्राधिकार या अधिकार क्षेत्र में कभी नहीं रहा।

आजकल तकरीबन हरेक दफ्तर में ऎसी दो-चार मूर्तियां देखने को मिल ही जाती हैं। इनमें कोई से भी आकार-प्रकार की मूर्ति हो सकती है। आलीशान एयरकण्डीशण्ड कमरों में शानदार व्हील चेयर में धँसी हुई मूर्तियां भी हैं और टेबल-कुर्सियों व आस-पास फाईलों के ढेर के बीच जमा मूर्तियां भी।  धोती-झब्बे-पायजामे वाली भी हैं और टाई लगाई हुई सूटेड़बूटेड़ भी। इन मूर्तियों के चाल-चलन और चरित्र के बारे में उनके आस-पास के सभी लोग जानते हैं और इन विलक्षण मूर्तियों के अस्तित्व को तहे दिल से स्वीकारते भी हैं। खूब सारी मूर्तियां कोई काम नहीं करती, टाईमपास करने आती हैं।

हरेक जगह इन्हीं तरह की दो-चार मूर्तियां और भी मिल ही जाती हैं जो दिन में दस बार चाय की थड़ियों तक जाती हैं और चर्चाओं के साथ चाय की चुस्कियों का मजा लेकर लौट आती हैं। कुछ को भेलपूऱी, गरम-गरम कचौड़ियों और समोसों के स्वाद की तलब रह रहकर उठती है और स्वाद पाने के लिए परिक्रमाएँ करनी ही पड़ती है। दफ्तरों से थड़ियों तक इन मूर्तियों की चक्कर कटाई  का दौर दिन भर ऎसा बना रहता है कि जैसे जलझूलणी ग्यारस पर डोल यात्रा।

खुद कभी धेला भी खर्चा नहीं करते। भक्तगण आते हैं, अपने काम के बारे में पूछताछ करते हैं और खुश करने के लिए परिक्रमाएं करवाते रहते हैं। खुश हो तब भी ठीक, न हो तो थड़ियों तक और अधिक यात्राएं करवाने की मजबूरी है ही, जब तक कि काम पूरा न हो जाए। फिर गर्मियों के मौसम में इन मूर्तियों को आईसक्रीम, ज्यूस, गन्ने का रस और सब कुछ ठण्डा भोग ही लगता है।

इन मूर्तियों का व्यवहार भी ऎसा कि कोई न कुछ समझ पाता है, न समझा पाता है। मूर्तियों में जान जरूर होती है मगर जानबूझकर न सुनती हैं, न बोलती हैं और न ही सामने वालों की ओर प्रेम से देखती ही हैं। मूर्तियाँ जड़ता ओढ़ कर कुर्सियों के सिंहासन पर धँसी ही रहती हैं। आम लोगों के लिए इन मूर्तियों को कितना ही महान बताया जाता रहे मगर इनकी महानता की जड़ मूर्तियों के महा गांभीर्य और स्थितप्रज्ञता में ही समायी होती है।

हमें तो चुपचाप देखना, सुनना और भुगतना ही पड़ता है। इसके सिवा कोई और चारा है ही नहीं। मूर्तियाँ जो ठहरी।हर गलियारे और बाड़े में इन मूर्तियों की भरमार को देख कर लगता है कि जैसे मूर्ति-मूर्ति वाले पारंपरिक खेल की कोई वैश्विक प्रतिस्पर्धा हो रही हो। खूब सारी मूर्तियां दफ्तरों में सिर्फ सोने के लिए ही आती हैं जैसे कि रात भर कहीं गश्त की हो या समाज अथवा देश की चिन्ता में क्षण भर नींद ही नहीं निकाल पाए हों।

ये अपना नींद का सारा कोटा अपने कर्मस्थलों में ही कुर्सियों की माँद में दुबक कर पूरा कर लिया करते हैं। ढेरों मूर्तियाँ दफ्तरी काम-काज भुला कर दिन में कई मर्तबा अपनी संगी मूर्तियों के साथ बेवजह इधर-उधर घूमती फिरती हैं और टाईम पूरा हो जाने पर ऎसी अदृश्य हो जाती हैं कि ढूँढ़ने पर पता नहीं चलता।

 खूब सारी मूर्तियाँ किसी काम से अपने पास आने वाले से बातचीत करने या दो शब्द तक का जवाब देने में हिचकती हैं मगर अपनी तरह की दूसरी नुगरी और निकम्मी मूर्तियों के साथ घण्टों गप्प हाँकती रहती हैं।

 मूर्तियों की ओर भी कई किस्में हैं। ये मूर्तियां किसी और काम आए न आएं, जरूरी कागजों का खा जाती हैं, फाईलों को चबा जाती हैं और हर तरह के बजट को घोल कर ऎसी पी जाती हैं पता ही नहीं चलता कि वे कागज, फाईलें और बजट किस कुंभकरण के पेट में जाकर जमा हो गए हैं।

तब इस बात पर विश्वास करने की इच्छा हो ही जाती है कि गणेशजी दूध पी सकते हैं। फिर गणेशजी के पेट की ही तरह इन कुंंभकरणी मूर्तियों के पेट की आसानी से कल्पना की ही जा सकती है।

अपने इर्द-गिर्द से लेकर दुनिया जहान तक में ऎसी मूर्तियों का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। किसी को कामचोरी, मूल्यहीनता, संवेदनशून्यता, नालायकी, बेईमानी, भ्रष्टाचार, बहानेबाजी और हराम के खान-पान से जिन्दगी चलाने, बिना परिश्रम की कमाई से बैंक लॉकर और घर भरने, जमीन-जायदाद जमा करने के गुर सीखने हों तो इन मूर्तियों के दर्शन कीजिएं, श्रद्धा और भक्ति भाव से इनका पावन सान्निध्य प्राप्त करें और मूर्तियों की तरह ही अपने आपको बना लें, फिर देखियें मूर्तियों का चमत्कार।

आप भले ही अच्छे इंसान के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर पाएं, मूर्ति के रूप में स्थान जरूर पा लेंगे। हमें कौनसी मरणोपरांत पूजा करवानी है, या अपनी मूर्ति लगवानी है। बाद में किसने देखा।  जो कुछ करना है जीते जी ही कर डालो।  अपने-अपने डेरों में बिराजमान सभी प्रकार की मूर्तियों को श्रद्धा सहित नमन।

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