आत्मघाती हैं ये शुभकामनाएँ

शीर्षक कुछ अटपटा सा लग सकता है किन्तु इसमें वो गहरा राज समाया हुआ है जिसके बारे में हम सब अनभिज्ञ हैं और इसी अज्ञानता के कारण हम नकलची बने हुए शुभकामनाओं के फव्वारें चलाते रहे हैं। जरूरी नहीं कि शुभकामनाएं सभी का शुभ ही करने वाली हों, कई बार ये हमारे लिए आत्मघाती भी हो सकती हैं।

कोई सा नव वर्ष हो या होली-दीवाली, राखी, जन्मदिन, शादी की वर्षगांठ हो या और कोई सा अवसर, शुभकामनाओं के बादल फटते रहना आम बात हो गई है। लोक व्यवहार और दुनिया वाले सभी लोगों को खुश करने और दिखावे में हमारा कोई मुकाबला नहीं।

कुछ वर्ष पहले तक शुभकामनाएं देने के लिए टेलीफोन, एसएमएस और डाक का खर्च भी आता था। तब वे ही लोग शुभकामनाएं व्यक्त किया करते थे जो कि घर-परिवार वाले, कुटुम्बी और आत्मीय सम्पर्कित हुआ करते थे और सभी एक-दूसरे को जानने-पहचानने वाले हुआ करते थे।

अब शुभकामनाएं देने में कहीं कोई खर्च नहीं होता इसलिए हम साल भर में कई-कई बार सैकड़ों-हजारों लोगों को किसी न किसी पर्व-अवसर या त्योहार की बधाई और शुभकामनाएं देने में पीछे नहीं रहते। जब मौका मिला बधाई और शुभकामनाओं की धड़ाधड़ बारिश कर दिया करते हैं।

जब से सोशल मीडिया और इन्टरनेट का अवतरण हुआ है तब से तो हमारी जिन्दगी के लिए शुभकामनाओं की वृष्टि करते रहना ही हमारा सर्वोच्च प्राथमिक और रोजाना का नित्यकर्म हो चला है। आश्चर्य की बात ये कि हम जिन लोगों को न कभी मिले, न जानते हैं उनको भी बधाई और शुभकामना संदेशों की फुहारों से नहला देने में पीछे नहीं रहते। 

आम हो या खास इंसान, सभी इसी फिराक में रहते हैं कि दुनिया में सभी लोग उनसे खुश रहें ताकि वक्त जरूरत कोई सा काम पड़ने पर इनके साथ न्यूनाधिक रिश्तों और संवाद व्यवहार का लाभ मिल सके। और लाभ न भी मिल सके तो कम से कम ये लोग उनके किसी काम में रोडे न अटकाएं अथवा विरोध न करें।

और इसी परम उद्देश्य को लेकर अधिकांश लोग परिचितों से लेकर अपरिचितों तक को सोशल मीडिया के माध्यम से अथवा प्रत्यक्ष मिलने पर बधाई एवं शुभकामनाएं फेंकने में पीछे नहीं रहते। आजकल बधाई और शुभकामनाओं का पूरा व्यवहार परिचय सातत्य अथवा लाभ-हानि के गणित के कारोबार का पर्याय होकर रह गया है अथवा पूरी की पूरी औपचारिकताओं से परिपूर्ण।

लोग किसी के लिए कुछ न कर सकें, न करना चाहें, समाज के लिए कोई योगदान न दे सकें तो कोई हर्ज नहीं, शुभकामनाओं की बारिश करते रहने में सबसे अव्वल रहा करते हैं। हालात ये हैं कि हम शुभकामनाओं का मर्म ही नहीं समझ पा रहे हैं। बधाई और शुभकामनाओं को केवल शब्दों का तिलस्म मानकर ही चल रहे हैं।

यह कहना गलत नहीं होगा कि बधाई और शुभकामनाओं की वैध-अवैध और मितव्ययताहीन वृष्टि हमारे लिए आत्मघाती ही है और हमारे जीवन के लक्ष्यों के पूर्ण न हो पाने, असफलताओं, अभावों और समस्याओं का एक कारण यह भी है।

हम लोग शुभकामनाओं और बधाई की वाचिक अभिव्यक्ति और लेखन को केवल और केवल औपचारिकता मानकर चलते हैं इसलिए आम जीवन में यह सामान्य प्रवाह की तरह चलता रहता है। अपनी पूरी जिन्दगी में हम सैकड़ों-हजारों और लाखों लोगोंं के प्रति किसी न किसी अवसर पर बधाई एवं शुभकामनाएं व्यक्त करते रहते हैं। और इस तरह अधिकांश मामलों में औरों की देखा-देखी में रमे रहते हैं। जबकि बहुत कम लोग ऎसे होते हैं जो कि वाकई बधाई एवं शुभकामनाओं के हकदार होते हैं।

बधाई एवं शुभकामनाओं को औपचारिकता मान लेने की वजह से ये शब्द प्राणहीन हो गए हैं और उनका कोई प्रभाव नहीं होता। ये शब्दद सारहीन और थोथे ही होकर रह गए हैं। हम सभी इस सत्य से नावाकिफ हैं या उपेक्षा करते हैं कि हमारे मुँह से निकला हुआ या कि हमारे द्वारा लिखा गया हर शब्द अपनी एक खास ताकत रखता है। और इसीलिए शब्द ब्रह्म कहा जाता है।

वाणी से निकले हुए शब्द या वाक्य केवल ध्वनि नहीं हैं अपितु उनके साथ अपनी संचित और स्वाभाविक दोनों प्रकार की ऊर्जा का समावेश रहता है। इसलिए हम जिसके प्रति बधाई एवं शुभकामनाएं व्यक्त करते हैं चाहे वह वाचिक हो या लिखित, इनके साथ अपनी आत्मिक ऊर्जा भी संलग्न रहती है। इस दृष्टि से ये शब्द तभी तक अपना प्रभाव दिखा पाते हैं जब तक कि हमारी ऊर्जा इनके साथ हो। इस दृष्टि से इस आन्तरिक ऊर्जा का संयमित और विवेकपूर्ण इस्तेमाल करना जरूरी होता है।

लेकिन हमारी स्थिति यह है कि हम पात्र-अपात्र, अच्छे-बुरे, सज्जन-दुष्ट आदि किसी भी पक्ष का कोई विचार किए बिना चाहे जिस किसी को बधाई एवं शुभकामनाएं परोसने के आदी हो गए हैं। हमारी अपनी संचित ऊर्जा और शब्दों की अपरिमित परमाण्वीय ताकत का हमें अन्दाजा नहीं होता इसलिए चाहे जिस किसी के प्रति बधाई एवं शुभकामनाएं व्यक्त कर दिया करते हैं चाहे उसे हम जानते हों या नहीं।

 इस मामले में हम सारे लोग भेड़चाल की जिन्दगी अपना चुके हैं। एक ने किसी को बधाई व शुभकामनाएँ दी नहीं कि एक के बाद एक सारे के सारे पिल पड़ते हैं इसके लिए । और यह सिलसिला लम्बे समय तक चलता रहता है।  यही कारण है कि अब न हमारे द्वारा दी गई बधाई का असर रहा है, न शुभकामनाओं का।

 हम चाहे कितनी ही बधाइयां या शुभकामनाएं देते रहें, कोई प्रभाव नहीं होता। हमारी शुभकामनाओं के बावजूद वे लोग अभावग्रस्त, दुःखी, अवसादी, समस्याओं से परेशान, बीमार और असफल रहा करते हैं, अपेक्षित मनोकामनाएं और आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पाती। ऎसी स्थिति में हमारे द्वारा व्यक्त की गई शुभकामनाएं नाकारा ही सिद्ध होती हैं।

यही वजह है कि आजकल शुभकामनाएं और बधाई अभिव्यक्ति का जो नॉन स्टाप चलन चल पड़ा है वह सिर्फ औपचारिकता ही है, इससे अधिक कुछ नहीं। हो सकता है कि कुछ लोग वाकई हमारे शुभचिन्तक हों, लेकिन उनकी शुभकामनाओं का भी असर इसलिए नहीं होता क्योंकि वे भी जमाने की उस भीड़ में शामिल हो चुके हैं जो रोजाना किसी न किसी अवसर पर खूब सारे लोगों को शुभकामनाएं व्यक्त करते हुए अपने शब्दों की प्राणशक्ति को गँवा चुके हैं।

शुभकामनाओं में वो ताकत होती है कि जिसे दी जाए वह निहाल हो जाता है लेकिन यह तब ही संभव है कि जब हम पात्रता का विचार करते हुए शुभकामनाएं दें और हमारे शब्दों में मौलिक ताकक बरकरार हो। पर आजकल ऎसा रहा ही नहीं। हम औरों को खुश करने के लिए शुभकामनाओं की फुहारें उछालते रहते हैं अथवा इसलिए कि शुभकामनाएं न दो तो कहीं बुरा न मान जाएं। जहां शुभकामनाएं औरों की देखादेखी या सामने वालों को खुश करने अथवा फैशनी व्यवहार अपनाते हुए दी जाएं, वहाँ ये शब्द अर्थवत्ता और प्रभाव खो देते हैं।

शुभकामनाएं अभिव्यक्त करने के लिए सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए पात्रता का परीक्षण। जिसे हम शुभकामनाएं दे रहे हैं, वह व्यक्ति हमारी शुभकामनाओं के लिए पात्र है भी या नहीं, यह देखना चाहिए। समाज और देश के लिए सच्चा और अच्छा, सदाचारी और लोक कल्याणकारी हो, तब तो शुभकामनाएं देने में कोई हर्ज नहीं है।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हम उन लोगों को भी शुभकामनाएं दे डालते हैं जो दुष्ट, लम्पट, झूठे, व्यभिचारी, शवराबी, हिंसक, नशेड़ी, भ्रष्ट, बेईमान, रिश्वतखोर, लूटेरे और गुण्डे-बदमाश हैं और किसी भी दृष्टि से शुभकामनाओं को पाने के अधिकारी नहीं हैं। इन लोगों को शुभकामनाएं देने पर समाज का दो प्रकार से नुकसान होता है। यदि हमारे शब्दों में ऊर्जा है, तब तो इन असुरों को पुष्टि प्राप्त होगी, और यह समाज और देश के लिए घातक है।

दूसरा हमारी संचित ऊर्जा ऎसे उदासीनों और नालायकों पर खर्च हो रही है जो कि समाज के शत्रु हैं अर्थात असामाजिक हैं। ये दोनों ही स्थितियां हमारे लिए आत्मघाती हैं। न साँप को दूध पिलाएं, न अपनी ऊर्जा को फालतू मेंं गँवाएं।

जब हम अपनी आत्मिक और मौलिक शब्द शक्ति और शब्दों की ऊर्जा को अपात्रों पर खर्च कर गँवा दिया करते हैं तब हमारे संकल्प कमजोर होने लगते हैं, हमारे या अपने घर-परिवार के इच्छित काम नहीं हो पाते, समस्याओं और अभावों का सामना करना पड़ता है, बीमारी और दुःखों से घिरने लगते हैं।

और इन सभी का मूल कारण यही है कि हम अपनी मौलिक भीतरी ऊर्जा को संरक्षित करने एवं इसके भण्डार में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि करने की बजाय लुटा देते हैं। यही ऊर्जा हम अपने लिए या अच्छे लोगों, समाज और देश के कल्याण के लिए बचा रखें तो अपने खूब सारे संकल्पों को सहज ही पूर्ण कर सकने में समर्थ हो सकते हैं। इसका दूसरा फायदा यह भी होगा कि नुगरों और नालायकों की शक्तिहीनता बढ़ेगी और ऎसा होना समाज, क्षेत्र व देश के हित में ही है।

परमाण्वीय क्षमता से भी अधिक ताकतवर अपनी शब्दशक्ति को पहचानें और इसका उपयोग वहीं  करें जहाँ पात्रता का पूर्ण परीक्षण हो जाए अन्यथा शुभकामनाएं देकर औरों को खुश करते रहने की यह स्वार्थ भरी आदत कभी खुद को ले डूबेगी। इस गहरे रहस्य को जो समझ जाएगा वह निहाल हो जाएगा।

1 thought on “आत्मघाती हैं ये शुभकामनाएँ

  1. अर्थहीन और घातक है
    हर किसी को शुभकामनाएं और बधाई दे डालना ..

    बधाई और शुभकामनाएँ देना हमने अपने रोजमर्रा का शौक बना डाला है।
    लेकिन हम इस रहस्य को भूल जाते हैं कि औरों को खुश करने के चक्कर में इस आदत को पालना हमारे लिए, समाज, क्षेत्र और देश के लिए कितना घातक हो सकता है।
    शुभकामनाएँ देना अच्छी बात है लेकिन यह उन्हें ही दें, जो परिचित हैं, पात्र हैं और सज्जन हैं। दुष्टों, असामाजिक तत्वों, भ्रष्ट लोगों और आसुरी वृत्ति वाले लोगों को शुभकामनाएं देने से पाप लगता है और समाज तथा देश का नुकसान होता है।
    जो सज्जन, शुचितापूर्ण, समाज के लिए हितकारी, सच्चे राष्ट्रभक्त हैं उन लोगों को दिल से शुभकामनाएँ देनी चाहिएं लेकिन चोर-उचक्कों, लूटरों, असामाजिक तत्वों, गुण्डे-बदमाशों, भ्रष्टाचारियों, रिश्वतखोरों को कभी शुभकामनाएं न दें।
    ऎसा करना अपने पाँवों पर कुल्हाड़ी मारना है क्योंकि ये ही दुष्ट मातृभूमि और समाज के लिए घातक सिद्ध होते हैं।
    साँपों को दूध पिलाकर उनमें जहर उत्पादन को बढ़ावा देना कहाँ का न्याय है। ऎसे दुष्टों के लिए दण्डात्मक कार्यवाही का चलन चलाएं, सार्वजनिक तौर पर इन्हें सुनाएं, हतोत्साहित करें और इनसे दूरी बनाएं।
    इन असुरों से मुक्ति पाने के लिए भगवान से सच्चे मन से प्रार्थना करें कि धरती को इनके भार से मुक्त करे और समाज व देश में शान्ति, आनंद एवं सुकून का माहौल बनाए।

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