असली निःशक्त तो ये हैं

हम सभी के शरीर को भगवान को इतना सक्षम बनाया है कि हम अपने काम खुद कर सकें और जहाँ तक हो सके किसी की मदद न लें। सभी अपने-अपने काम स्वतंत्रतापूर्वक एवं पूरी आसानी से करते रहें, तभी सृष्टि अपने आप चलती रह सकती है।

उन लोगों की बात अलग है जो किसी न किसी जन्मजात अशक्तता या अपंगता से ग्रस्त हैं अथवा किसी दुर्घटना या बीमारी के कारण शक्तिहीन हो चुके हैं अथवा किसी भी शारीरिक वजह से परेशान हैं। पर इनका प्रतिशत नगण्य है। 

कुछ दशक पहले तक हर आदमी अपने काम खुद कर लिया करता था, किसी के भरोसे नहीं रहकर अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी पूरी मस्ती के साथ जीता था, किसी की सेवा लेना  या किसी से अपनी सेवा-सुश्रुषा कराना पसंद नहीं करता था।

यहाँ तक कि बुजुर्गावस्था में पहुँच जाने के बाद भी इंसान भगवान से यही प्रार्थना किया करता था कि उसे इस तरह उठा लेना कि किसी से सेवा नहीं करानी पड़े। किसी दूसरे से सेवा लेने या कराने तक को पाप समझा जाता था और हर आदमी इससे बचने की हरसंभव कोशिश करता रहता था। इनका मानना था कि औरों की सेवा लेने से नवीन प्रारब्ध कर्म का निर्माण हो जाता है और यह किसी भी जीवात्मा के उद्धार या गति-मुक्ति के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता।

सर्वसमर्थ और शक्तिमान आदमी ने आलस्य, प्रमाद और प्रभुत्व से ग्रसित होकर अपनी क्षमताओं को भुला दिया और अब मामूली से कामों के लिए भी उसे दिन में कई-कई बार दूसरों की सहायता लेनी पड़ती है। इस दृष्टि से हम सभी लोग अब निःशक्तों की श्रेणी में आ गए हैं।

निम्न और आधे मध्यम वर्ग में आने वाले लोगों को छोड़ दिया जाए तो  तकरीबन शेष आधे मध्यम वर्ग और नब्बे फीसदी उच्च वर्ग में तो यह निःशक्तता इतनी घर कर गई है कि इसका कोई पार नहीं। हालात ये हो गए हैं कि जो आदमी जितना बड़ा होता चला जाता है वह मेहनत के मामले में निःशक्त होता चला जाता है।

बहुत अधिक बड़े हो जाने पर आदमी को आरामतलबी का इतना अधिक नशा चढ़ जाता है कि उसे अधिकांश कामों के बारे में दूसरों पर निर्भर रहने की आदत पड़ जाती है। इन बड़े, महान और लोकप्रिय कहे जाने वाले लोगों को शारीरिक श्रम के मामले में पराश्रित रहने की ऎसी लत पड़ जाती है कि कोई सा काम खुद नहीं कर पाते। इस अवस्था में ये खान-पान को छोड़कर सारे कामों में औरों के भरोसे ही रहते हैं।

अब तो परिश्रमहीनता को बड़े आदमियों का पर्यायवाची मान लिया गया है। जो जितना बड़ा उतना अशक्त।  साहबी संस्कृति इतनी अधिक जड़ें जमा चुकी है कि हर बड़े आदमी को लगता है कि पूरी दुनिया उनकी ही सेवा-चाकरी के लिए पैदा हुई है और इनसे सेवा लेना इनका जन्मसिद्ध अधिकार है।

हाल के वर्षो में अभिजात्य निःशक्तों का एक बहुत बड़ा वर्ग हमारे सामने आकार ले चुका है जिसे देखते ही लगता है कि वाकई इनसे बड़ा निःशक्त कोई हो ही नहीं सकता। सब कुछ कर पाने का सामथ्र्य और शक्ति होने के बावजूद इन निःशक्तों से वे काम भी नहीं हो पाते जो कि एक सामान्य से सामान्य इंसान आसानी से अकेले कर डालता है।

दिमागी तौर पर अपने आपको सर्वोपरि, सर्वश्रेष्ठ, अधिकार सम्पन्न, संप्रभु और सर्वशक्तिमान मानने वाले इन अभिजात्यों का शरीर निःशक्तता से इतना अधिक ग्रस्त होता है कि ये अपने काम भी नहीं कर पाते।

खान-पान, रहन-सहन, लोक व्यवहार, परिभ्रमण से लेकर रोजमर्रा के तकरीबन सारे कामों में ये लोग दूसरों के भरोसे ही रहा करते हैं, खुद का कोई सा काम खुद नहीं कर पाते। जब इंसान में परिश्रम करने का उत्साह समाप्त हो जाता है तो एक समय बाद शरीर भी उनकी आदत को समझ जाता है और वह भी इसी हिसाब से ढल जाया करता है।

मानसिकता रखेंगे शहंशाहों की, बराबरी करेंगे भगवान से, और काम-काज तथा शरीर संचालन के मामले में निर्बल मजदूर और निःशक्तों से भी गये बीते हो गए हैं ये अभिजात्य निःशक्त। अटैची पकड़ने, चाय-पानी पिलाने, घर के काम करने, खाना बनाकर खिलाने, गाड़ी का दरवाजा खोलने, सेल्यूट कर स्वागत करने, ऑनर देने, बाय-बाय करने, पानी की बोतल उठाकर रखने, फाईलें बाँधने और लाने-ले जाने, जूते पहनाने से लेकर अपने और घर के सारे काम-काज करने के लिए इन्हें कोई न कोई हमेशा चाहिए होता है।

जबकि ये सारे काम ये अपने बूते कर सकते हैं पर हूजूरियत और अभिजात्य मार्के का आत्म स्वीकृत शोषकीय अहंकार ही ऎसा पड़ा होता है कि बेचारे कुछ भी नहीं कर पाते, सब कुछ दूसरों के भरोसे ही चल पाता है। पता नहीं और कौन-कौन से काम के लिए औरों के भरोसे रहा करते होंगे।

अभिजात्यों के इस संप्रभुत्व के आगे सब कुछ गौण है। इनके घर वाले भी इन्हीं की तरह पराश्रित ही हो जाते हैंंं। इस तरह अभिजात्यों के लिए पूरे घर के लोग निःशक्तता से प्रभावित होकर दूसरों के भरोसे रहा करते हैं। इन अभिजात्यों के परिवार और कुटुम्बी भी इन्हीं की तरह आरामतलबी होकर निःशक्त अवस्था को प्राप्त कर लिया करते हैं। इनसे भी कोई काम नहीं होता।

पता नहीं सभी प्रकार का सामथ्र्य होते हुए भी औरों को अपना प्रभुत्व दिखाने, जमाने भर में वर्चस्व स्थापित करने और झूठी प्रतिष्ठा के लिए हमें जिन्दगी भर निःशक्त बने रहना क्यों भा गया है। 

अभिजात्य वर्ग में घुसपैठ करती जा रही इस शहंशाही किन्तु निकम्मेपन, हद दर्जे के आलस्य और प्रमाद की मानसिकता के कारण भले ही लोक में उनका मिथ्या वर्चस्व और वैभव स्थापित होता दिखाई दे, असल में ये लोग एक समय बाद शारीरिक के बाद मानसिक निःशक्त भी हो ही जाते हैं।

आमतौर पर ऎसे अभिजात्यों के बारे में यह कहा जाता है कि दिमागी घोड़े दौड़ाकर शतरंजी चालों को चलने में माहिर ये महान लोग पहले मानसिक तौर पर बीमारू होते हैं और फिर शारीरिक। लेकिन आजकल के अभिजात्यों में उल्टा हो रहा है। अब ये शारीरिक श्रम से जी चुराते हुए शक्तिहीन हो जाते हैं और फिर मानसिक रुग्णता के घेरे में आ जाते हैं। 

दशकों से मिलने वाली सुविधाएं छीन लिए जाने की स्थितियों के आ जाने के बाद तो ये मानसिक और शारीरिक दोनों दृष्टि से बीमारू और नाकारा होने की स्थिति  में प्रवेश कर जाते हैं और फिर अंतिम समय तक कुढ़ते रहते हैं।

यही वजह है कि हर अभिजात्य निःशक्त अपनी सेवा निवृत्ति के बाद अक्सर अस्पतालों के चक्कर काटते या आईसीयू वार्ड में ईलाज करवाते देखे जाते हैं अथवा किसी के सहारे अपने कामों को पूरे करने-करवाने के लिए परिभ्रमण करते हुए इन्हें सहज ही देखा जा सकता है।

दुनिया के अधिकांश गंभीर मरीजों में भी इन्हीं की संख्या सर्वाधिक होती है जिन्हें हमेशा यही भ्रम रहा है कि दुनिया उनकी सेवा के लिए है और वे ही इस धरती के स्वयंभू अधीश्वर अथवा नियंता हैं।

इनमें भी अधिकांश लोग ऎसे हो जाते हैं कि घुटने जवाब दे जाते हैं, न चल-फिर पाते हैं, न बुढ़ापे का सुकून ले पाते हैं। घर की खटिया से लेकर आईसीयू की शैय्याओं तक इनका अशक्तता भरा यह सफर तब तक चलता रहता है जब तक कि ‘जय सियाराम’ न हो जाए।

इनका जय सियाराम हो जाना उन सभी लोगों के लिए वरदान सिद्ध होता है जिनकी सेवाएं लेकर ये आयु पूरी करते हैं।  ऎसे लोगों के जाने के बाद सभी लोग शांति, मुक्ति और सुकून का अहसास करते हैं और इनका नाम ले लेकर कोसते हैं।

 भगवान को भी कोसते हैं कि आखिर ऎसे निखट्टुओं को उसने क्यों पैदा किया होगा जो  अधीनस्थों और दूसरों का शोषण करते हुए आयु पूरी करते हैं और जब ऊपर जाते हैं तब भी समाज और मातृभूमि के लिए कुछ भी सौंप नहीं जाते।

इस किस्म के अभिजात्य निःशक्तजन अब दुनिया में खूब पैदा होते जा रहे हैं। हर क्षेत्र  में इनकी खूब फसलें उग आयी हैं।

अपने आस-पास तथा अपने क्षेत्र में भी इस प्रजाति के स्वयंभू व स्वनामधन्य निःशक्तों की कोई कमी नहीं है जिनकी जिन्दगी ही औरों के भरोसे कट रही है और बेचारे दूसरे लोग किसी दबाव, मजबूरी, प्रलोभन या भय के मारे इनकी सेवा-चाकरी करते हुए भगवान से प्रार्थना करते रहते हैं – हे भगवान ! इन्हें जल्दी उठा ले। जितना जल्दी हो सके कर दे इनका राम नाम सत्य। बाहर वाले भी यही दुआ करते हैं, और घर वाले भी।

1 thought on “असली निःशक्त तो ये हैं

  1. दया और करुणा के पात्र हैं
    ये हट्टे-कट्टे वैभवशाली और प्रभावशाली निःशक्त ..

    भगवान का दिया हुआ सब कुछ है लेकिन शरीर को इतना अधिक प्रमादी, कामचोर और रईसी स्वभाव वाला बना दिया है कि परिश्रम करना ही नहीं चाहते।
    जीवन का हर व्यवहार ऎसे करते हैं जैसे कि दम-खम ही नहीं रहा हो। लाभ और लूट के सारे कामों में फूल स्पीड़ में काम करते हैं लेकिन जहाँ शरीर को हिलाने-डुलाने और मेहनत करने का मौका आता है वहाँ कुर्सियों और सोंफों में धंसे रहते हैं।
    आरामतलबी पाले बैठे इन आलसी, भोगी-विलासी नाकाराओं की इस प्रजाति से बढ़कर और कोई अशक्त हो ही नहीं सकता।

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