ये पति नहीं, पतित हैं

ये पति नहीं, पतित हैं

यों तो आजकल तकरीबन तमाम संबंधों में मिलावट और घालमेल हो गया है। और यह मिक्चरी कल्चर भी ऎसा कि पता ही नहीं चल पाता कि कौन क्या है।

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाए तो हम सारे ही लोग सामाजिक प्राणी हैं लेकिन हमारे ही भीतर कई सारे लोग ऎसे हैं जो असामाजिकता के पूरक और पर्याय हो चले हैं और इसका खामियाजा पूरे समाज और तमाम प्रकार के संबंधों को उठाना पड़ता है।

इन्हीं रिश्तों में पति नाम का जीव है जो कहीं अग्नि के फेरों के साथ और कहीं दूसरी विधियों का अनुगमन कर दाम्पत्य जीवन आरंभ करता है लेकिन पौरुषी मानसिकता इतनी अधिक हावी रहती है कि पत्नी को बरसों तक यह विश्वास ही नहीं हो पाता कि वह उसका पति है।

और वो अनजान आदमी, जिसके लिए वह अपना घर-परिवार व पीहर के नाते-रिश्ते सारे छोड़कर दाम्पत्य के भरोसे उसके पास आ गई है। पत्नी का अपना कुछ नहीं होता। पीहर माता-पिता का घर होता है और ससुराल पति का।

पति की यह जिम्मेदारी है कि वह उसे इस तरह रखे कि किसी भी क्षण यह महसूस न हो कि वह छली गई या मन में सोचने लगे कि कहाँ आकर फँस गई।

दाम्पत्य के मामलों में सर्वाधिक कमी पारस्परिक विश्वास में आने लगी है। दाम्पत्य के मूल तत्वाेंं का क्षरण होने लगा है और इससे सामाजिक व्यवस्थाएं भी गड़बड़ाने लगी हैं। विदेशियों की समय-समय पर जुड़ते-टूटते दाम्पत्य संबंधों और पाश्चात्यों की वैचारिक विष्ठा का परम प्रसन्नता के साथ स्वाद लेते हुए हम लोग कौटुम्बिक प्रेम, श्रद्धा, स्नेह और माधुर्य को भुलाने लगे हैं।

जिन दो जीवात्माओं के मध्य प्रगाढ़ विश्वास और पारस्परिक साहचर्यपूर्ण माधुर्य होना चाहिए, उसमें कहीं न कहीं कमी आती जा रही है। कुछ स्थितियां अपवाद हो सकती हैं लेकिन अधिकांश मामलों में पति का पौरुषी दंभ, स्वेच्छाचार से परिपूर्ण उन्मुक्त व्यवहार और इतर संबंधों की तलाश एवं निर्वहन आजकल सबसे बड़ी सामाजिक समस्या बनकर उभर रहा है। इसका असर बच्चों से लेकर पूरे कुटुम्ब पर पड़ने लगा है।

और इसी का परिणाम है कि हमारी माता-बहनें पारिवारिक समस्याओं और उपेक्षा के दंश भोगती हुई जैसे-तैसे जिन्दगी काटने को विवश हैं।

हम सभी लोग सामूहिक भोजन, प्रसादी और उत्सवी आनंद में सामाजिक उत्थान और नारी सम्मान की बातें करते हैं, ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ और महिला सशक्तिकरण की डींगें हाँकते हुए साल भर में ढेरों तरह के आयोजनों में रमे रहते हैं लेकिन पतियों से प्रताड़ित, परित्यक्त और कुण्ठाओं, विषमताओं में घरों में नज़रबन्दी की तरह अभिशप्त जीवन जी रही मातृशक्ति को भूल जाते हैं, उनकी समस्याओं, अभावों और पीड़ाओं को नज़रअन्दाज कर जाते हैं।

तकरीबन हर समाज में अब काफी संख्या ऎसी महिलाओं की है जिनकी जिन्दगी ससुराल वालों के कारण से शापित है। खासकर पति, सास और ननदों की भूमिका बहूओं पर क्रूरता के सारे प्रयोगों को आजमाने लगी है।

जो स्त्री पति का संरक्षण चाहती है वह निराश्रित और संरक्षाहीन जीवन जीने को विवश है।  शर्मनाक दुर्भाग्य यह है कि जो इंसान सारे समाज के सामने संस्कारों की साक्षी में स्त्री को पत्नी बनाकर अपने घर लाता है वह अपना फर्ज भुलाने लगा है।

असली पति वही है तो पतित्व के धर्म का पालन करे। यदि वह पति धर्म का पालन नहीं करता है तो उसे पति न मानकर पतित की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। और ऎसे पतितों का उद्धार पतितपावन भगवान श्रीराम भी नहीं कर सकते।

बहुत सी स्ति्रयों को शिकायत रहती है कि शादी के बाद वे अपने आपको ससुराल में नज़रबंद महसूस करती रहती हैं। जिस पति को अपनी पत्नी को पर्याप्त समय देना चाहिए, वह पति घरेलू समय में भी दोस्तों के साथ गुलछर्रे उड़ाता है अथवा अपने दफ्तरों और काम -धंधों में रमा रहता है।

कई स्ति्रयों की अपने पति को लेकर हमेशा शंका बनी रहती है। पति अपनी पत्नी के प्रति वफादार नहीं होकर जब दूसरी औरतों के चक्कर में पड़े रहते हैं, गुटखों, दारू और दूसरे नशों और बुराइयों में फंसे रहते हैं, तब दाम्पत्य के गणित का गड़बड़ाना स्वाभाविक है।

खूब सारे पतियों के बारे में यह आम शिकायत रहती है कि वे घर के लिए उतना समय नहीं देते जितना देना चाहिए। बहुत से पतियों के बारे में यह सुना जाता है कि उनके दूसरी औरतों से इतने प्रगाढ़ संबंध हैं कि कुछ कहते शर्म आती है।

दुराचारी पति अपनी पत्नियों को प्रताड़ित करते रहते हैं, उन्हें घर-गृहस्थी का खर्च चलाने के लिए रुपए नहीं देते, दूसरी औरतों पर बेहिसाब खर्च करते रहते हैं और पारिवारिक क्लेश करते रहते हैं।

सुना यह भी जाता है कि अधिकांश पत्नियां अपने पतियों के दूसरी औरतों के साथ नाजायज संबंधों से परेशान हैं। इन पत्नियों को उन औरतों से भी शिकायत बनी रहती है जो पैसोंं, उन्मुक्त भोग-विलास और अपने दैहिक आनंद के लिए पतियों के पतित्व की हत्या करने को ही अपना धरम मानती हैं।

पतियों की व्यभिचारी और मर्यादाहीन स्थितियों के कारण समाज का दुरावस्था की ओर उन्मुख है। समाज और समाज के ठेकेदारों की स्थिति यह है कि वे ऎसे भटके हुए पतियों को सामाजिक दण्ड दे पाने या कि कुछ रोक-टोक करने का साहस नहीं रखते। केवल द्रष्टा भाव से तमाशबीन की तरह दाम्पत्य की होली को जलते हुए देखते रहते हैं।

भुगतना पड़ता है उन बेचारी स्ति्रयों को जिनके लिए न कहीं कोई संरक्षण मिल पाता है, न सुखद आसरा। जिन लोगों को पति परमेश्वर होने का सम्मान मिला हुआ है उन सभी को यह सोचना चाहिए कि वे परमेश्वर कहलाने लायक हैं भी या नहीं।

उनकी बुरी आदतों और अमर्यादित व्यवहार के रहते हुए उन्हें परमेश्वर कहना भगवान का अपमान है। काफी सारे पतियों की इस व्यभिचारी, आक्रामक और प्रताड़ना भरी मनोवृत्तियों के बावजूद आधा आसमाँ  करवा चौथ और हरितालिका तीज से लेकर साल भर उनकी दीर्घायु और खुशहाली के लिए व्रत-पर्व और उपवास करता है, यह उदारता हमारी मातृशक्ति में ही देखने को मिल सकती है। यह दुनिया भर में बेमिसाल है।

दाम्पत्य में बंधे हुए हम सभी लोगों को अपनी शादी की सालगिरह पर यह सोचना चाहिए कि हम पति परमेश्वर कहलाने लायक हैं अथवा पतित हो गए हैं।

उन सभी पतियों की दीर्घायु और यशस्वी जीवन की कामना करें जिन्हें उनकी पत्नियां सच्चे मन से पति परमेश्वर मानती हैं।

3 comments

  1. एक दम सत्य है पर पुरुष अपनी पुरूषोचित मानसिकता नहीं छोड़सकता या यों कहें तो ठीक रहेगा कि छोड़ना ही नहीं चाहता।
    सदियों से चली आ रही इस विरासत को ढोते रहने की आदत सी पड़ गयी है। इस मिथ को तोडने का प्रयास महिलाओं द्वारा किया तो जा रहा है पर उतना नहीं। धीरे धीरे सब ठीक होगा।पर पहल महिलाओं द्वारा ही करनी होंगी।

  2. नरेंद्र

    ये पति नही पतित है।पढ़ा ।उत्कृष्ट है ,प्रेरणादायी लगा

  3. Sare ptiyo ko ye smjna chahiye