गिरगिटों को पछाड़ रहे खरबुजिया आदमी

पानी तो होता ही है ऎसा कि जिसमें मिलाओ उस रंग का हो जाता है। इस मामले में आदमियों की भी अत्यन्त विचित्र किस्में हैं। फिर आजकल का आदमी तो गिरगिटों और खरबूजों को भी मात दे रहा है। इनसे भी कई कदम आगे निकल चुका है।

हालात ये हैं कि आदमी कभी तो गंभीरता के साथ बात करता है, कभी मुस्कान बिखेरता हुआ मस्ती का माहौल पैदा कर डालता है, कभी कुटिल मुस्कान के साथ अपनी षड़यंत्री चालें चलता हुआ औरों को भरमाने में कामयाब होने का दम भरता है, कभी दोगलेपन का परिचय देता है और कभी ‘क्षणे रुष्टा क्षणे तुष्टा’ के भावों को परिचय देता हुए अपने उन्मादी स्वभाव से रूबरू कराता है।

यह आदमी ही है जो कभी सतरंगी बर्ताव करता है, कभी रंग पर रंग बदलता है और कभी बदरंग होता भी है और कर भी दिया करता है।

 आदमी  अनेक रंगों में रंगा होता है। पता ही नहीं चलता कि इंसान गिरगिट का पुनर्जन्म है या कि खरबूजे का मानवी संस्करण।

आदमी स्थायी भावों से बँधा कभी नहीं रह सकता। वह अपनी सुख-सुविधा और स्वार्थों, जायज-नाजायज कामों, उन्मुक्त भोग-विलास की ऎषणाओं और सम सामयिक हवाओं से प्रभावित होकर या फिर किसी न किसी के दासत्व के दबाव में अपने रंग बदलता ही रहता है। 

यह आदमी बनाया ही ऎसा गया है कि यह किसी का नहीं हो सकता।  अपने काम निकलवाने और स्वार्थ पूरे करने के लिए वह किसी भी स्तर तक जा सकता है।

उसे पता होता है कि वृहन्नलाओं की तरह नाच-गान करने वाले और बहुरुपियों की तरह स्वाँग रचने वाले ही कुछ न कुछ पाते हैं, जबकि स्वाभिमान से जीने वालों के भाग्य में हमेशा दुःख ही दुःख बदा होता है।

वे लोग हमेशा आनंद में देखे जाते हैं जो कि गिरगिटों की तरह रंग बदलते हैं। इसी प्रकार हाँ में हाँ और ना में ना मिलाने वाले लोग भी हैं जिनके लिए कहा जाता है कि खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है।

इंसानी खरबूजों का तो भगवान ही मालिक हैं। इन लोगों ने रंग बदल-बदल कर सारे माहौल को इतना खराब कर दिया है कि सब कुछ बदरंग कर दिया है।

 पता ही नहीं चलता कि कौनसा रंग काम का है और कौन सा नाकारा। रंगों के मायाजाल का इस्तेमाल कर जमाने भर को अपने घरों का कैनवास समझने वाले लोगों ने कबाड़ा ही कर दिया है।

फिर हर खरबूज का अहंकार सातवें आसमान पर रहने लगा है। खरबूजों और इनकी तरह के दूसरे खरबूजों का अपना अलग ही संसार है जो हमेशा रंग बदलता रहता है और एक-दूसरे खरबूजे को कभी भ्रमित करता है, कभी मोहित।

खरबूजे आजकल अपने आपको तीसमार खाँ समझने लगे हैं। खरबूजों को अपनी करने दो, अपने संगी खरबूजों के साथ धींगामस्ती करने दो तो सारे खरबूजे मस्ती से इधर-उधर लुढ़कते रहेंगे।

और कुछ कह दिया जो हर खरबूज तरबूज बनकर स्केटिंग करने लगता है, उछलकूद करने लगता है और जाने कैसे-कैसे रंगों को इधर-उधर फेंकता रहता है।

 इस संसार में अब खरबूजों और तरबूजों का ही चलन है। जो रंग बदलना जानता है, मौका देखकर हर कहीं लुढ़कने की कलाओं में माहिर है वही सफलता के सोपानों की ओर बढ़ता चला जा रहा है।

 आजकल रंग भी खूब सारे हैं और रंग बदलने वाले भी। सर्वत्र बस रंग ही रंग है और यही रंगबदलू रंग समाज की छाती पर चढ़कर मनमानी का परचम लहराने लगे हैं।

कोई क्या करे इन खरबूजों का जो न ईमान-धरम से कोई वास्ता रखते हैं, न सत्य से, और न ही अपने स्वाद से।

खरबूजों को देखें और उनकी हरकतों को मनोरंजन का माध्यम बनाएं। ज्यादा दुःखी न हों, ये खरबूजे हर कहीं रहे हैं और सदियों तक यों ही रहेंगे, एक-दूसरे को देखकर रंग भी बदलते रहेंगे।

अपने आस-पास भी खूब सारे खरबूजे अक्सर बने रहते हैं जो कि  अपने हीन स्वार्थों के लिए संगी खरबूजों को देखकर रंग भी बदल देते हैं और सिद्धान्त भी।

खरबूजों का अपना कोई सिद्धान्त नहीं होता। हर खरबूजा अपने किसी न किसी हमदर्द के बूते उछलकूद करता है और खरबूजों का समूह बनाकर चलता है।

खरबूजों में बड़े-छोटे किसी का कोई भेद नहीं होता, कोई सा खरबूजा सामने हो, दूसरा खरबूजा रंग बदलने को हर क्षण तैयार रहेगा ही।

जात-जात के खरबूजों को देखते हुए यही मान लें कि रंग, रस और स्वाद चाहिए तो खरबूजा बनकर जियो। हाँ में हाँ मिलाते रहो, दांये-बांये और पीछे-पीछे चलते रहो, कुछ न कुछ झूठन तो हमारे लिए बचेगी ही। फिर एक बार जब खरबूज संस्कृति को अंगीकार कर ही लिया तो बचा ही क्या है। खरबूजों का यों ही अध्ययन करते रहें, अपने आप ज्ञानवद्र्धन भी होगा और सीख भी मिलेगी।

1 thought on “गिरगिटों को पछाड़ रहे खरबुजिया आदमी

  1. नीलाम हो रहा है आदमी, ये आज का आदमी

    कभी सब्जी मण्डियों की टोकरियों में रखी सब्जी हो जाता है आदमी।
    कभी माँस-मछली और मदिरा के बाजार में बिकने वाला माल हो गया है आदमी,
    था कभी टिकाऊ और भरोसेमन्द आदमी,
    अब बिकाऊ और विश्वासघाती हो गया है आदमी,
    कभी कुछ हो जाता है आदमी, कभी कुछ।
    सब कुछ हो गया है आदमी, सिर्फ आदमीयत को छोड़कर आदमी।
    रंग बदलने लगा है आदमी,
    चन्द टुकडों, स्वार्थ और झूठन में बिकने लगा है आदमी,
    शरमा गए हैं रंग बदलने वाले गिरगिट और खरबूजे भी आदमी की फितरत को देख कर,
    पता नहीं क्या से क्या हो गया है आदमी।
    लगता है कि अब खोखला बिजूका ही हो गया है आदमी।
    कोई भरोसा नहीं रहा आदमी, पता नहीं कब क्या से क्या जाए आदमी।
    आज इसका कहलाता है, कल किसी और का हो जाता है आदमी,
    और परसों का भी कोई भरोसा नहीं, पता नहीं कब किसका हो जाए आदमी।

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