साल खत्म हो रहा है, हम नहीं

साल खत्म हो रहा है, हम नहीं

सब तरफ आपाधापी मची है, वह भी इस बात को लेकर कि साल आज खत्म हो रहा है और क्या ऎसा कुछ कर डालें कि आने वाले साल में किसी बात का कोई मलाल न रहे। न आत्महीनता रहे, न अपराध बोध, और न ही परंपरागत रूप से जाने कितने साल से चला आ रहा आलस्य, प्रमाद और वो बहुत कुछ जो हमें कमजोर करता रहा है। और जिसके कारण से हमें हर बार नए साल का बेसब्री से इंतजार बना रहता है।

साल का अवसान क्या हो रहा है, सब तरफ लोग जबर्दस्त पगलाये हुए हैं। इस कदर उद्विग्नता, अशान्ति और असन्तोष के दावानल में कूदे हुए हैं कि जैसे आज सन् का अवसान न होकर उन्हीं का अंतिम दिन हो। इसलिए जो उन्मुक्त और स्वच्छन्द भोग-विलास, आनंद, मौजमस्ती और धींगामस्ती करनी संभव हो, कर डालें।

कुछ रईसजादों और उनके परिवार वालों के पास भ्रष्टाचार व हराम का या कि पूर्वजों का अकूत धन जमा है, जिसे ठिकाने लगाने के लिए ऎसे ही अवसरों की तलाश अर्से से बनी रहती है। इस बहाने वो सब कुछ जायज होने की परिभाषा पा जाता है जो आम दिनों में लज्जाजनक हो। और अधिसंख्य लोग ऎसे हैं जिन्हें वर्ष समाप्ति या नव वर्ष के आगमन से कोई सरोकार नहीं होता बल्कि मुफत का माल-ताल खाने-खिलाने और पीने-पिलाने, करने-करवाने आदि के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।

धन-दौलत को ऎश के नाम पर उड़ाने वाले लोगों की सबसे बड़ी कमजोरी यह रहती है कि वे किसी न किसी अपराध बोध या आत्महीनता के भय के मारे अकेले मौज-मस्ती नहीं कर पाते। इन लोगों को कंपनी चाहिए होती है।

यह कंपनी उन्हें वे चालाक और मुफ्तखोर भोगी लोग देते हैं जो खुद का एक धेला भी खर्च नहीं करते बल्कि लाखों-करोड़ा खर्च करवा देने और मुफतिया सुख पाने की कला में माहिर हुआ करते हैं। ऎसे मुफतिया लोगों की आजकल सब जगह भरमार है जो बहला-फुुसला कर मुर्गे तैयार करने में सिद्ध होते हैं। इनके भाग्य से सब जब ऎसे मुर्गे मिल भी जाते हैं जो इन पर पूरी उदारता के साथ खर्च करते रहते हैं।

इस मामले में यह दोस्ती अंधे और लंगड़े वाली कहानी को चरितार्थ करती है। दोनों पक्षों को उनके लायक लोग मिल जाया करते हैं। दोनों का ही काम बन जाता है। बहुत बड़ी संख्या ऎसे लोगों की भी है जो कि पूरी बेशर्मी के साथ किसी से भी पुराने वर्ष को विदाई और नए वर्ष के स्वागत के नाम पर मुँह मीठा करने, पार्टी देने या कि खिलाने-पिलाने के लिए दूसरों को उत्तेजित कर तैयार कर दिया करते हैं। इन भिखारियों को साल भर ऎसे ही अवसरों की तलाश बनी रहती है जब उल्लू बनाकर वे औरों के पैसों पर मौज कर सकें।

आमतौर पर औसत बुद्धि वाला हर इंसान जीवन में कुछ प्रगति करने को आतुर होता है और ऎसे में जब भी वर्ष बदलने या कि दूसरे किसी अच्छे अवसर का आगमन होता है, वह नए संकल्प को ग्रहण करता है और भविष्य में संकल्पबद्ध बने रहकर तरक्की और ऊँचाइयों को पाने के लिए प्रयास करता रहता है।

हर इंसान साल के आखिरी दिन यही सोचता है कि पुराने साल में जो हो गया सो हो गया, जो गलतियां हो गई उनके बारे में भुलकर नए साल में दृढ़ संकल्प लेकर जिन्दगी की गाड़ी को थोड़ी आगे बढ़ाए।

लेकिन ऎसा हो नहीं पाता। दो-चार फीसदी लोग ही होते हैं जो अपने संकल्पों पर दृढ़ रहकर तीव्रतर प्रगति करने में सफल हो पाते हैं अन्यथा शेष सारे लोग ऎसे होते हैं जिन पर संकल्प का भूत दो-चार दिन सवार रहने के बाद अपने आप उतर जाता है और नया साल आए सप्ताह भर भी नहीं बीत पाता कि फिर आ जाते हैं पुराने ढर्रे पर। वही ढाक के पात तीन के तीन।

हम लोग समझदार होने के बाद से लगभग हर साल इसी मानसिकता में जी रहे हैं। बरसों से हम आज के दिन यही सब करते हैं लेकिन इस पर दृढ़ नहीं रह पाते। यदि बरसों से लिए जाते रहे संकल्पों पर हम दृढ़ रहकर कर्म करते तो आज नवीन संकल्प ग्रहण करने की आवश्यकता ही न रहे,  बल्कि अपनी इतनी अधिक तरक्की हो गई होती कि आज के दिन हम भगवान से आने वाले वर्ष के लिए सुख-समृद्धि की मांग नहीं करते बल्कि अब तक प्राप्त उपलब्धियों और कृपा के लिए भगवान को धन्यवाद देने की स्थिति में होते और हमें सहयोग करने वाले अथवा हमारी समृद्धि में भागीदार बनने वाले लोगों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का उत्सव रच रहे होते।

दरअसल हमारे भीतर इतने अधिक पैमाने पर खुदगर्जी, स्वार्थ और दुष्टताओं ने प्रवेश कर लिया है कि हम मायावी संसार की चकाचौंध में अपार बौरा जाते हैं कि हर साल केवल वर्ष के अंतिम दिन को जश्न का अवसर मानकर इस बहाने वो सब कुछ कर गुजरते हैं जिनसे हमें दैहिक सुख की प्राप्ति होती है।

बरसों से हम 31 दिसम्बर के दिन और रात में वही सब कुछ करते आ रहे हैं फिर भी हमारी हैसियत नहीं बदली। जहाँ बरसों पहले थे वहीं के वहीं ठहरे हुए हैं। बढ़ी है तो सिर्फ आयु, कुटिलताएं और राग-द्वेष।

आज की रात लोग ऎसे पगला जाते हैं कि जैसे कि वर्ष नहीं बल्कि उनका अवसान होने जा रहा हो, आज के दिन ही के लिए ही हैं वे, पता नहीं कल रहेंगे कि नहीं। जी भर कर आमिष-निरामिष खाएंगे, पीयेंगे, नाचेंगे-झूमेंगे और वो सब कुछ करेंगे जो शरीर को परस्पर सुख प्रदान करता है।

दुनिया में कुछ फीसदी लोगों को ऎसी मदमस्ती करने का बहाना भर चाहिए चाहे अवसर कोई सा क्यों न हो। इस मामले में साल के आखिरी दिन को छोड़कर अच्छा अवसर और क्या हो सकता है।

इतनी धीेंगामस्ती करेंगे कि सभी को यह महसूस होगा कि बेचारे साल के अंतिम दिन आज-आज कुछ भी कर लें, कल से सुधर जाएंगे।  आज की आधी रात के पहले तक उन्मुक्त और स्वच्छन्द फ्री स्टाईल भोगी और उसके बाद ऎसे नज़र आएंगे जैसे कि नए साल में सब कुछ बदल गया हो।

भले ही आधी रात के पहले वाली खुमारी और शारीरिक ऊर्जाओं के क्षरण से व्याप्त शिथिलता दो-चार दिन तक बरकरार क्यों न रहे।  साल के अंतिम दिन की आधी रात तक इनकी ऎसी स्थिति हो जाती है कि लगता है नए वर्ष के पहले दिन ये सारे के सारे संत-महात्माओं और संकल्पसिद्धि के लिए निकले कर्मयोगियों की भूमिका में नज़र आएंगे।

बरसों से पुराने साल को विदा देने और नए साल के स्वागत में आधी रात के अंधेरे में उत्सवी जश्न का जलवा दिखाने वालों में नब्बे फीसदी वे ही लोग शामिल रहते हैं जो बरसों से हर साल यही सब करते आ रहे हैं फिर भी इस भ्रम में हैं कि आने वाला साल उनके लिए सुकूनदायी सिद्ध होगा।  और इसके लिए पुराने साल को विदा करने से पहले वे सारे कर्म कर डालो, जो कुछ शर्म छोड़कर कर सकते हैं।

होना तो यह चाहिए कि पुराने वर्ष में हम जो नहीं कर पाए हैं, जो गलतियां हमसे हुई हैं उनके बारे में आत्मचिन्तन करें और इन बुराइयों, प्रमाद, आलस्य और कामचोरी को पुराने साल के साथ ही विदा करें और नए साल का स्वागत करते हुए दृढ़ संकल्पित हों ताकि आने वाले वर्ष को विदा देते समय हमें बाहरी नशों और दूसरे शरीरों तथा पदार्थों पर निर्भर नहीं रहना पड़े और पूरे होश हवास के साथ संक्रमण वेला के कर्तव्य कर्म को पूर्ण कर सकेंं।

रात के आगोश में धींगामस्ती करते हुए नव वर्ष की अगवानी जीवन के अंधेरों को दूर नहीं कर पाती। इसके लिए लालिमा भरी प्रभात चाहिए।  इस सत्य से नावाकिफ लोगों के लिए अंधेरा ही आराध्य होता है।

One comment

  1. कैलेंडर बदलने की बधाई sir

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