मनोरोगी होते हैं फालतू बोलने-सुनने वाले

काम करने वाले इंसानों के मुकाबले बातें करने वाले लोगों का प्रतिशत कहीं ज्यादा है। यों कहें कि काम करने वाले केवल दस फीसदी हैं और शेष सारे हैं बातें करने वाले। फिर जो बातें करने में उस्ताद होता है वह सुनने के मामले में भी उतना ही अधिक आतुर रहा करता है।

आदमी जितना काम नहीं करता उतना बातें करता रहता है। हमारे श्रीमुख से कही और श्रीकानों से सुनी गई बातों में से पाँच फीसदी को छोड़कर शेष सारी बातों का कोई अर्थ नहीं होता।

इस मामले में हम अपने मुख और कर्ण दोनों का जमकर दुरुपयोग कर रहे हैं और अपने जीवन की कुल ऊर्जा का नब्बे फीसदी इसी में गँवा दिया करते हैं।

इस ऊर्जा का हम सायास संरक्षण करने लग जाएं जो हमारी जिन्दगी इतनी अधिक सुनहरी और मस्त हो जाए कि जितनी हम सोच भी नहीं सकते। इंसान की कुल ऊर्जाओं में से यदि कुछ फीसदी की बचत कर ली जाए जो उसकी अतीन्दि्रय क्षमताओं अथवा इंसानी प्रतिभाओं का विलक्षण प्रभाव सामने आ सकता है।

अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं है कि उनमें क्या क्षमताएँ हैं और इनका किस प्रकार सदुपयोग किया जा सकता है। यह हम जिस दिन जान जाएंगे उस दिन हमें अपने विकास और आनंद पाने के लिए किसी की दरकार नहीं रहेगी।

दुनिया के कुल शोरगुल का अधिकांश हिस्सा मानवी समुदाय का होता है। यह संभव है ही नहीं कि दो या दो से अधिक इंसान एक जगह जमा हो जाएं और उनमें बातें हो ही नहीं चाहे उन्हें कितने ही गंभीर काम में लगाया हुआ हो। बातों का विस्फोटक प्रदूषण हमेशा घातक स्तर तक रहता है।

बातें ही एकमात्र ऎसा माध्यम हैं जिनके जरिये हर कोई अपने आपको दूसरों से महान, विद्वान और आगे से आगे सिद्ध करता रहता है। हर कोई इसी अहंकार में मरे जा रहा है कि उसे जितना ज्ञान है, जो ज्ञात है वैसा औरों को नहीं है चाहे घर-परिवार और समुदाय से लेकर दुनिया भर का ताजातरीन ज्ञान ही क्यों न हो।

आदमी कहीं भी, कभी भी चुप नहीं रह सकता। यहाँ तक कि लिफ्ट, मन्दिर, मरघट, अस्पताल और आईसीयू तक में क्यों न हो। चौराहों, सड़कों, पार्कों, बस-रेल, सफर, घर-दफ्तर, दुकान और दुनिया का कोई सा ठिकाना ही क्यों न हो।

आमतौर पर महिलाओं को बातूनी कहा जाता है लेकिन अब इस मामले में पुरुष भी पीछे नहीं हैं। अब सब तरफ बराबरी हो गई है। ढेरों पुरुष ऎसे मिल जाते हैं जो कि  न केवल बतियाने बल्कि जोर-जोर से चिल्लाने के आदी हैं।

जहाँ ऎसे आदमी होते हैं वे दिन-रात हर काम बेवजह चिल्लाते हुए ही करते हैं और यह जताते हैं कि पूरे बाड़े और कुनबे में केवल वे ही हैं जो कि काम कर रहे हैं, वे न हों तो कहीं कोई काम हो ही नहीं।

इसलिए चिल्लाने और बोलने के मामले में अब महिलाओं को दोष नहीं दिया जा सकता। अब यह काम आदमियों ने संभाल लिया है।  आजकल आदमी भी औरताें की तरह बातें करने लगे हैं और औरतें भी आदमियों की तरह रहने लगी हैं।

आदमी हो या औरतें, दोनों ही इंसानी किस्मों में बोलने और चिल्लाने वालों की भरमार है। और इनमें भी उन लोगों का प्रतिशत खूब ज्यादा है जो परम जिज्ञासु, प्रोफेशनल डिटेक्टर जैसे, खोजी और बाल की खाल निकालने वाले हैं।

दुनिया में कहाँ क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है, इस बारे में जानना और जी भर कर चर्चा करना इन लोगों का जन्मसिद्ध पावन अधिकार हो गया है। इस मायने में ये लोग रहस्योद्घाटक किस्म के हैं  जिनकी लगभग पूरी जिन्दगी ही औरों के बारे में कोई न कोई नवीन और विस्फोटक खोज करना ही होता है।

बातों के इन महाराजाओं और महारानियों को सभी जगह देखा जा सकता है। इनके लिए हर स्थान काफी हाउस है जहाँ दिल खोलकर और जुबान लम्बी कर हर तरह की बातों का मुफ्त में रसास्वादन करने की खुली छूट है।

हमारी पूरी जिन्दगी का कोई सफर ऎसा नहीं होता जहाँ फिजूल की बातें करने वालों की भरमार न हो। बस-रेल-रिक्शा का सफर हो या फिर कोई सा आयोजन, सब तरफ बातों के बतंगड़ बनाने वालों की पावन मौजूदगी इंसानियत को धन्य कर रही है।

कई जगह तो ये बातें करने वाले यदि अचानक चुप हो जाएं तो आशंका खड़ी हो जा जाती हैं कि कहीं इन्हें हार्ट अटैक तो नहीं हो गया, कोमा में तो नहीं चले गए, किसी ने जीभ तो नहीं काट दी अथवा अचानक साँसें थम तो नहीं गई। चिल्लाने के बारे में सीधा सा गणित यही है कि जो जितना अधिक चिल्लाता है वह उतना अधिक गिरा हुआ और नीच इंसान होता है।

हमारे जीवन की सभी प्रकार की असफलताओं, बीमारियों और अनिष्टों का एक बड़ा कारण यह भी है कि हम अपने अच्छे उपयोग में लायी जा सकने वाली शब्दशक्ति का अधिकांश भाग यों ही फालतू बोल-बोल कर गँवा दिया करते हैं। और खुद नहीं बोलेंगे तो मोबाइल या टेप से गाने सुनते-सुनवाते रहते हैं।

इसे बचाकर रखें तो हमारे सारे काम स्वतः सिद्ध होने लगें क्योंकि हमारी ज्ञानेन्दि्रयों और कर्मेन्दि्रयों की जो शक्तियां अपने संयम की वजह से संचित होने लगती हैं वे प्रकारान्तर से दिव्य ऊर्जा में रूपान्तरित होकर संकल्प शक्ति के अनुरूप प्रवाहित होने लगती हैं। पर इस सबके लिए आत्म संयम जरूरी है।

जो बातों के रसिया हैं वे आत्म संयम के मामले में सबसे कमजोर इंसान होते हैं इस कारण से उनकी पूरी जिन्दगी औसत ही चलती रहती है, ये लोग कभी कोई बड़ी उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाते। जो लोग जीवन में मौन को अपनाते हैं उन्हीं के शब्दों की ताकत बनी रहती है और वे ही संसार को कुछ दे पाने की स्थिति में होते हैं।

हम बोलने वाले लोग कुछ नहीं कर सकते, सिवाय बोलने और बोलते रहने के। भगवान उन सभी को शक्ति दे जो ज्यादा बोलने वालों से परेशान हैं।