स्मृति शेष – अलौकिक योगिनी सिद्ध तपस्विनी तुलसा माँ

तुलसा माँ – वह दैदीप्यमान शक्तिपुंज, जिनका स्मरण आते ही सादगी, त्याग-तपस्या, मानवीय करुणा और सेवा-परोपकार के माधुर्य से भरा एक ऎसा चेहरा सामने उभर आता है जो वात्सल्य के तीव्रतर आकर्षण और भक्ति भाव के ओज-तेज व दिव्यताओं से परिपूर्ण है।

TULSA MAA

सिद्ध तपस्विनी तुलसा माँ न केवल सिद्ध तपस्विनी और भक्तिमती मीरा की परंपरा की एक कड़ी ही थीं बल्कि उनके सामाजिक सरोकारों में भी माधुर्य की अजस्र धाराओं का सुकूनदायी प्रवाह हमेशा अनुभव होता था।

तीन दशकों में तुलसा माँ के आश्रम-मन्दिर में कई बार गया और उनका आशीर्वाद पाया।  आतिथ्य सत्कार और सेवा के क्षेत्र में तुलसा माँ की मनुहार की केाई सानी नहीं। हर क्षण भगवदभक्ति में रमी रहने वाली तुलसा माँ का आश्रम वह दिव्य तपोवन है जहाँ कुछ क्षण बिताने भर से आत्म आनंद की अनुभूति होती है।

डूंगरपुर सेवा काल के दौरान उनके आश्रम में अक्सर जाना होता था। उसी दौरान राजस्थान पत्रिका, डूंगरपुर के तत्कालीन ब्यूरो प्रमुख अग्रज श्री राजेन्द्र उपाध्याय के कहने पर तुलसा माँ पर एक लेख भी लिखा था जो कि नवज्योति के राज्य संस्करण सहित कई समाचार पत्रों में प्रकाशित भी हुआ।

 कुछ वर्ष पहले की ही बात है। एक बार बेणेश्वर पीठाधीश्वर गोस्वामी अच्युतानंद जी महाराज की शिष्य मण्डली के साथ वाहन में उदयपुर से साबला जाने का मौका मिला। साथ में वागड़ के प्रमुख कवि डॉ. जनार्दन जलज भी थे।

आधी रात का वक्त हो रहा था। महन्तजी की इच्छा सेरिया में थोड़ी देर रुक कर तुलसा माँ के दर्शन की हुई। रात को जैसे ही आश्रम में पहुंचें, तुलसा माँ माला से जप कर रही थीं। उन्होंने बड़े ही प्रेम से महन्तजी और हम सभी की आवभगत की और हाल-चाल जाने। तुलसा माँ ने महन्तजी के समक्ष कहा कि प्रभुजी पधारे हैं, यह सौभाग्य है लेकिन भोजन-प्रसाद लिए बगैर कोई नहीं जा पाएगा।

शिष्य मण्डली को सामान दे दिया गया। डॉ. जनार्दन जलज ने भी पीताम्बर पहना और भोजन निर्माण में हाथ बंटाया। आधी रात बीत चुकी थी और इधर दाल-बाटी और चूरमे का प्रसाद तैयार था।

भगवान को भोग लगाया और बड़े प्रेम से प्रसाद पाया। आनंद आ गया। लौटने की बात आयी तो तुलसा माँ ने रात्रि विश्राम का खूब आग्रह सभी से किया किन्तु अगले दिन किसी विशिष्ट कार्यक्रम की वजह से यह संभव नहीं था।

तुलसा माँ का यह स्नेह सभी के प्रति बरसता रहता। जो कोई उन्हें एक बार भी मिला होगा, वह उन्हें भुला नहीं पाएगा।

इसके बाद भी उदयपुर कार्यकाल के दौरान गृह नगर बांसवाड़ा आते-जाते अक्सर सेरिया स्थित उनके आश्रम में दर्शनों का सौभाग्य मिलता रहा।

जब भी मैं उनके दर्शनों के लिए पहुंचता, वे दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद में नहला देतीं।

हमेशा एक ही बात कहती – बेटा, तुम पर भगवान की अपार कृपा है। नौकरी-वोकरी तो ठीक है, गृहस्थी चलाने के लिए करते रहो, लेकिन भगवान ने तुम्हें आध्यात्मिक कार्यों के लिए भेजा हुआ, उसमें ध्यान दो। कुछ खुलासा करने का जब भी आग्रह करते, तब वे हँसते हुए इतना ही कह देती – देखते जाओ, आगे ही आगे सब अच्छा ही होगा। आनंद आएगा।

तुलसा माँ अपने आप में ऎसी दिव्य विभूति थीं कि जिनके दर्शन से ही आत्म आनंद उमड़ आता।

उनका ओज-तेज और माधुर्य से भरी वाणी का आकर्षण तो था ही, वे अत्यन्त सहज, सरल और भगवत्प्रेम में निमग्न रहने वाली सिद्ध तपस्विनी थीं। सिद्धावस्था से भी अत्यन्त उच्चतम स्तर को पाने के बावजूद अहंकार और माया उन्हें लेश मात्र भी कभी छू नहीं पाए।

उत्तरायण की पहली एकादशी के दिन उनका गोलोक वास सभी के लिए बहुत बड़े शून्य जैसा हो गया है। भगवान ने भक्त को अपने अंक में समा लिया।

तुलसाँ माँ को हमेशा याद किया जाता रहेगा। उन्होंने जन-जन में भगवान की भक्ति के प्रति जो प्रेरणा जगाई, धर्म मार्ग की ओर मोड़ा, इसके लिए वागड़ और मेवाड़ क्षेत्र ही नहीं पूरा देश हमेशा उनका कृतज्ञ रहेगा।

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