जनहित में विनम्र सुझाव …

शौक से जलाओ पुतले …पर सामूहिक भोज भी तो करो …

जो लोग आए दिन देश में किसी न किसी मुद्दे को लेकर किसी न किसी का पुतला फूंकते रहते हैं। उन्हें चाहिए कि उत्तरक्रियाओं में भी कंजूसी नहीं बरतें। पुतला फूंकने के बाद सभी उत्तर क्रियाएं भी की जानी चाहिएं। ऎसा न करने से अनिष्ट होता है। जो पुतला फूंकता है उसका भी नुकसान होता है और भागीदारों तथा दर्शकों का भी। इस दोष के निवारण के लिए यह जरूरी है कि जो लोग पुतले फूंकते हैं, वे मिलकर इनकी उत्तर क्रिया के निमित्त दसवें दिन से लेकर तेरहवें दिन तक रोजाना शाम को अधिक से अधिक संख्या में सामूहिक भोज करें तभी उनका पुतला दहन परिपूर्णता प्राप्त कर सकता है।  इस सामूहिक भोज में उन सभी को आमंत्रित किया जाना चाहिए जो पुतला-शवयात्रा में शामिल होते हैं और जो पुतलों की शवयात्रा को देखते हैं। शौक से जलाओ पुतले, चाहे जिसके जलाओ, जलाते रहो, पर सामूहिक भोज के बिना सब कुछ बेकार है।  आजकल पुतला दहन जैसे निर्णायक मोड़ को पा जाने के बाद भी अभीष्ट प्राप्त नहीं हो पाता, इसका मूल कारण यही है कि हम पुतला दहन की उत्तर क्रियाओं पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। होना तो यह भी चाहिए कि पुतला दहन करने वाले लोग मासिक भोज, संवत्सरी भोज, श्राद्ध आदि भी करें अन्यथा महान दोष के भागी होते हैं।  बेवजह शोक को आमंत्रित करने वालों को चाहिए कि शोक निवारण भी करें अन्यथा शोक हमारे जीवन के लिए स्थायी हो सकता है।