बंद करो रावण दहन

बंद करो रावण दहन

यह तो पता नहीं कि रावण दहन कब से आरंभ हुआ और किसने शुरू किया। लेकिन इतना तो सभी जानते हैं कि इसका उद्देश्य प्रतीकात्मक रूप से असत्य पर सत्य की विजय, बुराई पर अच्छाई की विजय और असुरों पर देवों की जीत के प्रतीक स्वरूप में यादगार माना जाकर किया जाता है।

दशहरे पर यह परंपरा इतने गहरे तक पैठ जमाये हुए है कि हर साल रावण दहन होना पुरातन भारतीय परंपरा का अहम् हिस्सा हो गया है।

बरसों से लंका दहन, रावण दहन और मेघनाद, कुंभकर्ण आदि राक्षसों के पुतले जलाते रहे हैं, भयंकर शोरगुल भरा आतिशी माहौल बनाते रहे हैं। हर साल विजयादशमी पर वही सारे भाषण, विज्ञापन, सीख, शीर्षक से लेकर समाचारों तक में एक ही एक बात दोहरायी जाती रही है। इनमें असत्य, अन्याय, बुराई आदि पर सत्य, अच्छाई की जीत की चर्चा छायी रहती है।

दशहरे पर रावण दहन को लेकर एक प्रश्न सभी समझदारों के मन में उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर आज के युग में रावण दहन कितना प्रासंगिक रह गया है जबकि आज के कुकर्मी लोगों द्वारा ढाए जा रहे अन्याय, अत्याचार, शोषण, दुराचार, भ्रष्टाचार और तमाम प्रकार की बुराइयों के परवान पर होने के दौर में रावण बहुत अधिक बौना साबित होता है।

रावण ने वो सब नहीं किया जो आज के लोग कर रहे हैं। आज के भ्रष्ट, धूर्त, देशद्रोही और राष्ट्रभक्षी लोगों ने रावण को भी काफी पीछे छोड़ कर इतना अधिक पछाड़ दिया है कि इनके कारनामों और करतूतों के आगे रावण कहीं नहीं टिकता।

आश्रमों, मठों और धर्मधामों को धंधेबाजी का गढ़ बनाने, धर्म के नाम पर बलात्कार, जमीन-जायदाद, धन-दौलत का भण्डार जमा करने, सत्संग-कथाओं के लिए लाखों रुपयों की कारोबारी गणित, एयरकण्डीशण्ड आश्रमों और वाहनों में रहकर उन्मुक्त और स्वच्छन्द भोग-विलास, धर्म को छोड़कर राजनीति और राजनेताओं जैसा उन्मुक्त व्यवहार, प्रजा की बजाय खुद का विचार करने, अपने अधिकारों का इस्तेमाल सज्जनों, ईमानदारों को दबाने, कुचलने और खत्म करने जैसा कोई काम रावण ने कभी नहीं किया।

रावण ने रिश्वत लेने, कमीशन खाने, भ्रष्टाचार करने, राजसत्ता के दुरुपयोग और जनता को बेवजह सताने का काम कभी नहीं किया। कभी उसने प्रजा को तंग नहीं किया, मिलने के लिए लाईनें नहीं लगवायी, अधिकार और सत्ता पाने के लिए कुटिल षड़यंत्रों, झूठे बयानों, टीवी पर मिथ्या बहसों,  पब्लिसिटी के फण्डोंं का इस्तेमाल नहीं किया।

उसे इन सब भी आवश्यकता ही नहीं पड़ी क्योंकि प्रजा के प्रति उसने पूरी पारदर्शिता, ईमानदारी और स्नेह के साथ राजधर्म का पालन किया। उसने अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने के लिए गुर्गे, मुर्गे और छुटभइयों की फौज तैयार नहीं की, न आतंवादियों को शरण दी, न पनपाया। न उसने पत्थरबाजों को हवा दी और न ही अपनी कुर्सी बचाए रखने के चक्कर में नाजायज और नापाक समझौते किए।

यह सच है कि रावण में कुछ बुराइयां थीं लेकिन इसके साथ ही साथ वह प्रकाण्ड ज्ञानी, तपस्वी और राष्ट्र भक्त था तथा उसके लिए प्रजा और राष्ट्र सर्वोपरि था।

आज जो महान लोग हैं उनमें न तो ज्ञान है, न समझदारी और न ही मानवीय संवेदनाएं। एक तरफ रावण जितना ज्ञान नहीं, दूसरी तरफ रावण से हजार गुना अधिक अहंकारी मनोवृत्ति, अधिकारों का दुरुपयोग और सभी प्रकार की बुराइयों का जबर्दस्त घालमेल दिख रहा है।

ऎसे में गंभीरता से यह सोचना जरूरी हो चला है कि आखिर आज के दौर में रावण दहन का क्या औचित्य है जबकि रावण के मुकाबले हजार गुना अधिक पापी, कुकर्मी,  व्यभिचारी, भ्रष्टाचारी, धूर्त, मक्कार, लुटेरे और धुतारे हजारों की संख्या में सभी जगह फन और पंजे फैलाये पसरे हुए हैं।

वह राम ही थे जिनमें रावण को मारने की क्षमता थी और वह भी इसलिए कि राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे। आज राम के मुकाबले हजारवां अंश भी किसी में है जो दावे के साथ कह सकता हो कि वह राम काज करने के लिए पैदा हुआ है इसलिए उसे रावण दहन का अधिकार है।

जो लोग हर साल रावण दहन की औपचारिकताएं पूरी कर रहे हैं उन्हें क्या अधिकार है इसका, जबकि वे लोग उन सभी कुकर्मों और राक्षसी कर्म में जुटे हुए हैं जो रावण ने भी नहीं किए। रावण ने कभी अतिक्रमण नहीं किया, भूमाफियाओं से मिलकर प्रकृति और परिवेश के साथ धोखा नहीं किया, न पहाड़ों को छिन्न-भिन्न किया, न पहाड़ियाँ काटीं, न नदी-नालों और तालाबों-कूओं-बावड़ियों को बर्बाद किया।

हम सभी लोग किसी न किसी मामले में अपराधी हैं ही। और जो सीधे तौर पर प्रत्यक्ष अपराधी नहीं हैं वे भी अपराधियों के अपराधों में समान भागीदारी रखते हैं क्योंकि वे अन्याय, अत्याचार और शोषण को चुपचाप देख रहे हैं, नर पिशाचों और पिशाचिनियों, डाकूओं और डाकिनियों के कुकर्मों और कहर को देखते हुए भी चुप्पी साधे बैठे हैं।

इन कुकर्मियों और पाखण्डियों को संरक्षण और प्रोत्साहन दे रहे हैं अथवा इनके साथ खान-पान और रहन-सहन कर रहे हैं, इनका यशोगान कर रहे हैं और अपने क्षुद्र स्वार्थों के पूरे होने की एवज में सज्जनों, सच्चे और अच्छे लोगों के जीवन का आनंद छीन रहे हैं।

इसलिए अन्याय, अत्याचार और शोषण ढाने वाले भी दोषी हैं और चुपचाप भोग या देख रहे हम लोग भी बराबरी के पातकी और महापापी हैं और इस पाप से बरी नहीं हो सकते। इस जन्म में नहीं तो आने वाले जन्मों में पापों का फल भोगना ही है।

रावण से कई हजार गुना पापी होकर भी रावण दहन करना, रावण दहन देखने के लिए जमा होना और रावण दहन पर आनंद मनाना कितना दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है।

कितना अच्छा हो कि हम वर्तमान के सत्य को पूरी ईमानदारी के साथ स्वीकारें और रावण दहन बंद करें क्योंकि हमारे आस-पास और देश में रावण से भी अधिक महापातकी और व्यभिचारी लोगों की भरमार है। अच्छा हो कि अपने भीतर के रावण और तमाम प्रकार के असुरों का खात्मा करने का संकल्प लें और अच्छा इंसान बनने का प्रयत्न करें।

विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं ….।

2 comments

  1. Laxman Singh Rathore

    वास्तव में आज यह सख्त जरूरत है।
    लेकिन क्या लोक राजनेता समझाएंगे और क्या यह बात मानेंगे। यही यक्ष प्रश्न है?

    • धन्यवाद भाई श्री लक्ष्मणसिंह जी,
      हर दिन एक नरपिशाच और पिशचिनी पैदा होकर सामने आ रही है और रोज यक्ष प्रश्नों को प्रसूत कर हमारे लिए चुनौती छोड़ जाती है।
      प्रकृति सबका ईलाज करती है लेकिन थोड़ा समय इसलिए लेती है ताकि इनके कुकृत्यों के कारण पाप का घड़ा पूरा भर जाए ताकि जब फूटे तो विस्फोट की आवाज सुनने में भी दूसरों को महान आनंद की अनुभूति हो और घड़ा फूट जाने का सार्वजनिक प्रमाण भी सामने आ सके।