जुड़े रहें जड़ों से

आधार के बिना सब कुछ निराधार है। यह आधार अपने आप में वह शाश्वत मंच है जिससे जुड़े रहकर हम केन्द्र का सामीप्य और सान्निध्य पाते हुए खुद को हमेशा ऊर्जित और ताजगी भरा महसूस करते हैं और उसी की ताकत से जीवन क्रम को आनंद भाव के साथ आगे से आगे बढ़ाते हुए मस्ती पाते हैं, मौज उड़ाते हैं।

कालजयी यश और कीर्ति वही प्राप्त कर सकता है जिसकी बुनियाद मजबूत हो। और यह उसी की हो सकती है जो गहरे तक जमीन से जुड़ा हो। जमीन का यह जुड़ाव और स्नेह ही जमीर देता है।

जो जमीन का नहीं हो सकता, उसका जमीर अकाल मृत्यु को प्राप्त कर लेता है और फिर वह त्रिशंकु की तरह भटकने को ही जिन्दगी समझ लेता है। बिना आधार वालों की स्थिति यही होती है। जीतेगा और जीता वही रहेगा जिसका जमीन और जमीर से गहरा नाता है।

एक तरफ नींव है और दूसरी और कंगूरों का अहंकारी वर्चस्व। नींव को किसी से कोई सरोकार नहीं है, वह धरती माता का स्नेहिल आँचल पाकर अपने आप में मस्त है। और उधर कंगूरों का अहंकार सातवें आसमान की ओर बढ़ता ही चला जा रहा है।

कंगूरों को हमेशा लगता है कि जमीन हमारी वजह से है और जमीन पर रहने वाले लोग उन्हीं की कृपा पर जिन्दा हैं।  यह कोई नई बात नहीं है। हर युग मेंं इन्द्र महा अहंंकारी, शोषक, अन्यायी, अत्याचारी, विध्वंसक और व्यभिचारी रहा है।

उसे मजा आता है शील और पवित्रता भंग करने में, श्रेष्ठ, कल्याणकारी और लोकमंगल से ओत-प्रोत संकल्पों को विखण्डित करना उसका स्वभाव है और यही कारण है कि कभी परीक्षा के नाम पर तो कभी परीक्षण के नाम पर वह कहर ढाता रहता है।

और कुछ नहीं तो इन्द्र को जब हर तरफ से निराशा और हताशा हाथ लगती है तब कुढ़ता हुआ प्रतिशोध का रास्ता अपना लेता है और बरपाने लगता है नए-नए कहर।

इन्द्र की इस सदाबहार फितरत से सभी लोग वाकिफ हैं और तभी बहुत सारे लोग इन्द्र-इन्द्राणी की आराधना और स्तवन करते हुए खुश करने के जतन करते रहते हैं, सामूहिक भोज करते हैं और इन्द्र यज्ञ करते हुए उसके नाम समिधाएं और हवि समर्पित करते हैं।

फिर भी भरोसा नहीं कि उन्मुक्त व्यवहार और मनमानी करने वाला इन्द्र परिवार रीझ ही जाए। उसका रीझना तभी संभव हो पाता है जब उसके अहंकार को स्वीकार करते हुए हर दृष्टि से परितृप्त किया जाता रहे। पर भरोसा तब भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि भरमाना और भ्रमित करना भी उसका स्वभाव है और छलना भी।

यही वजह है कि आसमानी हवाओं के बूते वह बादलों को उड़ा ले जाता है, कभी मेघों को भरमाकर इधर-उधर धींगामस्ती करने लगता है और कभी सूरज की रोशनी तक को छिपा डालने के लिए काले-घने बादलों की बदचलनी का पूरा-पूरा प्रदर्शन देखते हुए अंधेरा करने तक के काम कर डालता है।

पूरे के पूरे परिवेशीय अंधकार के पीछे जो सबसे बड़ा कारण है वह यह कि हम हमारे अपने लोगों, अपनी जमीन, संस्कृति, वैज्ञानिक रहस्यों से भरी और सत्य की तमाम कसौटियों पर खरी उतरी परम्पराओं से दूर होते जा रहे हैं, हम अपनी सनातन संस्कृति और जड़ों से कटते जा रहे हैं जिनके सहारे हमारे पूर्वज और सदियां बंधे रहकर उत्तरोत्तर उन्नति की राह पाते रहें।

गोवर्धनधारी भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र के अहंकार का मर्दन करने और शाश्वत सुख-शांति पाने के लिए जिस गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका अंगुली पर धारण कर संरक्षण और सान्निध्य प्रदान कर सत्य का अहसास कराया था उसे आज हम सभी भूलते जा रहे हैं

जमीनी हकीकत और जमीन से जुड़ाव को त्यागकर पाश्चात्यों के रंग में रंगते हुए हवा में उड़ने का बेताब हो रहे हैं। हमारी स्थिति न घर के न घाट के वाली होती जा रही है। पुराने युग में एक ही त्रिशंकु था, अब हर तरफ त्रिशंकुओं की भरमार है।

और हर त्रिशंकु को लगता है कि आसमान उसी का है, किसी और का नहीं। इसी के फेर में न हम आसमान के रहे, न जमीन के। हवाओं के साथ बहते रहने को ही जिन्दगी का सबसे बड़ा सच समझ बैठे हैं।

रंग-बिरंगे गुब्बारों की तरह इधर से उधर उड़ते रहकर हम जमीन वालों को चिढ़ा रहे हैं कि हमसे बड़ा और ऊँचा और कोई नहीं।  आसमानी हवाओं ने हमारी नीयत में खोट जानकर खुद को भी बदल दिया है। शातिर हवाओं की बदचलनी पूरे परवान पर है।

हम इतने ऊँचे उठ गए हैं कि अब हम पर खुद का नियंत्रण ही नहीं रहा। जिधर हवाएं ले चलती हैं उधर चले जाने को विवश हैं।

कभी हवाओं की सुगंध को पहचान कर हम दिशा और दशा तय करते हैं, कभी मुद्राओं की खनकार को सुन कर, और अधिकांश बार तो भीखमंगों की तरह भटकते हुए हर उस द्वार तक पहुंच जाते हैं जिधर कुछ मनचाही भीख मिल जाने की उम्मीद हो।

सब तरफ बहुत कुछ छूटता चला जा रहा है। समन्दर में जहाजों का बंदरगाह से संबंध विच्छेद होता जा रहा है, नदियों से नौकाओं को तटों से कसकर बांध रखने वाली रस्सियां इतनी गल गई हैं कि कभी भी बदहवास लहरों का झोंका आया नहीं कि सब कुछ खुलकर उन्मुक्त अवस्था प्राप्त हो जाया करता है।

अब भी कुछ बिगड़ा नहीं है, क्यों न हम अपनी जड़ों की सुगंध को पहचानें, अपने लोगों, संस्कारों और परंपराओं की जड़ों से बंधे रहने का प्रयास करें। जड़ों से जुड़कर ही हम जिन्दा रह सकते हैं, अलग होकर न कोई जी सका है, न जीवन्त रह सका है।