बच के रहियो आदमी की जात से
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बच के रहियो आदमी की जात से

सामाजिक प्राणी के रूप में सदियों से अपनी पहचान रखने वाला इंसान आज जितना असामाजिक होता जा रहा है उतना पिछली सदियों में कभी नहीं देखा गया।

इंसान होने का अर्थ है इंसानियत से परिपूर्ण होना और दुनिया भर के दूसरे सभी प्राणियों के लिए संरक्षक, पालक और प्रगतिकारी धर्म निभाना। लेकिन आज का इंसान इस कसौटी पर खरा उतरने की बजाय उन सारे कामों में लगा हुआ है जिनका इंसानियत से दूर-दूर तक का कोई रिश्ता नहीं है। पहले जानवरों से इंसान को भय लगता था इसलिए इंसान अपने साथ दूसरे इंसान रखता था और बस्तियों में समूह के रूप में रहकर अपने आपको सुरक्षित समझता और अनुभव करता था।

आज इंसान ने अपनी सारी परंपरागत पहचान को बट्टा लगा दिया है। अब इंसान अपने इंसान होने के सारे गुण धर्म भुला चुका है और उसने जानवरों से लेकर असुरों, नरपिशाचों आदि सभी के अवगुणों को अपना लिया है।

यही कारण है कि आज जानवरों की बजाय इंसान को इंसान से अधिक भय लगता है। तभी तो आजकल बस्तियों में आत्मीय रिश्तेदारों की अपेक्षा कुत्तों की संख्या बढ़ती जा रही है। जिस घर की ओर देखें, कुत्ते ही कुत्ते नज़र आते हैं। और इन घरों पर वेलकम या सुस्वागतम् की बजाय  पूरे गौरव और गर्व की अभिव्यक्ति करते हुए सुन्दर से बोर्ड पर सुपाठ्य शब्दों में यही लिखा  नज़र आता है – कुत्ते से सावधान। जितना बड़ा और वैभवशाली, प्रभावशाली आदमी, उसके वहाँ उतने ही बेशकीमती कुत्ते। जिस देश में कुत्ते ही स्टेटस सिम्बोल हो जाएं, उस देश के भविष्य की कल्पना अच्छी तरह की जा सकती है।

आदमियों की बस्ती से लेकर पॉश कॉलोनियों तक ऎसे खूब सारे सूचना पट्ट इस तरह स्वागत पट्ट की तरह नज़र आने लगें तो यह मान लेना स्वाभाविक ही है कि आदमी के भय से, आदमी से बचने के लिए अब कुत्तों का सहारा लेना ही बाकी रह गया था। फिर कुत्ते भी कोई दो-चार किस्म के नहीं, खूब सारी प्रजातियों के कुत्ते इन घरों की ही तरह दर्शनीय भी होते जा रहे हैं।  लोग कभी आलीशान घर को देखते हैं और कभी इनके भीतर जालियों से मुँह निकाल कर ढेर सारी भाव-भंगिमाओं के साथ अपनी जात की आवाजों के साथ भौंकने वाले कुत्तों को।

यह आदमी की जात ही ऎसी है कि जहाँ-जहाँ इसके पाँव पड़े हैं वहाँ-वहाँ बंटाढार के सिवा कुछ नहीं हुआ। हो सकता है दो-चार फीसदी असली आदमियों ने जमाने और दुनिया के दूसरे प्राणियों के हित में कुछ किया हो अन्यथा आदमियों का इतिहास रहा है कि इन्होंने जहाँ मौका मिला, संहार और विध्वंस के सिवा कुछ नहीं किया।

आदमी जिन जंगलों, वनों, वृक्षों और  हरियाली भरे पहाड़ों में घुस गया वहाँ जंगल के जंगल साफ कर दिए, वन्य जीवों का बसेरा उजाड़ दिया और खुद फार्म हाउस, फेक्टि्रयों, खदानों और आलीशन बंगलों के साथ बस गया। यह आदमी और उसकी मशीनों की ही ताकत है कि कल तक जहाँ पहाड़ नज़र आते थे, आज वहाँ कहीं समतल मैदान नज़र आ रहा है और कहीं खाईयां-घाटियां और गहरे-गहरे बेतरतीब गड्ढे।

बेचारे पैंथर और दूसरे वन्य जीवों का ठिकाना खत्म हो गया। ऎ से में ये जीव आखिर जाएं तो कहाँ। कैेसे मान लें कि बस्तियों में आकर तबाही बचाने के लिए ये पैंथर ही दोषी हैं।  इन जीवों को अपने डेरे उजाड़ देने वालों की पहचान होती तो बात कुछ और होती। एक भूमाफिया नहीं बच पाता। पर ऎसा हो नहीं पाया।

आदमी जहाँ गया वहाँ कबाड़ा ही किया है। नदियों, नालों और तालाबों के किनारे गया तो वहाँ भी बस्तियां और कॉलोनियां बसाने, प्लॉट काटने और बेच देने के फेर में सदियों पुराने जल मार्गों को संकुचित कर डाला और तटों पर ऎसा अधिकार कर लिया कि जैसे इनके बाप-दादे वसीयत में लिख गए हों। शहरों और गांवों में बस्तियों के बीच और अपने घरों के आस-पास पड़ी खाली जमीन पूरे क्षेत्र के लोगों की शामलाती काम आती थी, तीज-त्योहार, मौसर, शादी-ब्याह और सामूहिक आयोजनों के काम आती थी उसे भी सभी ने थोड़ी-थोड़ी हद बढ़ाकर लील लिया।

और अब घर-बस्ती से दूर लाखों रुपए खर्च कर टैण्ट हाउसों और वाटिकाओं की मजबूरी सारे भोग रहे हैं। देवालयों के आस-पास पहुंच गया तो आदमी ने भगवान के नाम पर दुकानदारी शुरू कर दी, होटलें, रेस्तरां और रिसोर्ट बनवा दिए जिनमें क्या कुछ नहीं होता, यह सभी को पता है।

धर्मस्थलों में होने वाले अधर्म के कारण ही बाबा केदारेश्वर ने कुपित होकर मजा चखाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। पर कहर बरपा बेचारे निर्दोष यात्रियों पर। लगभग सभी धर्म स्थलों पर आज धर्म के ठेकेदारों, भगवान के नाम पर बहुत कुछ काण्ड और कर्मकाण्ड कर रहे पण्डे, पुजारियों, बाबाओं से लेकर भिखारियों तक का जबर्दस्त जमावड़ा है। कहीं प्रसाद के नाम पर पैसा बनाने का धंधा चल रहा है और कहीं वीआईपी दर्शन के नाम पर श्रद्धालुओं को भी दो जमातों में विभक्त कर दिया है।

लगता है कि इस देश में भगवान और धर्म के नाम पर कुछ भी किया जा सकता है, कोई भी बोलने वाला नहीं। सभी का इतना तगड़ा नेटवर्क पसरा हुआ है कि इसके आगे  4-जी और 5-जी भी पानी भरें। दुनिया के जो इलाके अब तक आदमी की पहुंच से दूर हैं वे ही सारे पूरी नैसर्गिक मौलिकता के साथ सुरक्षित हैं अन्यथा आदमी  की पहुंच जहां-जहां हो गई उन इलाकों का तो भगवान भी अपने आपको मालिक नहीं कह सकता।

आज का आदमी अभिशप्त और अपशकुनी हो चला है, वह जहाँ पहुंच जाता है वहाँ सब कुछ मटियामेट होकर ही रहता है।  क्या कहें आदमी की इस जात के लिए, और कितना कहें। जितना सुनाएं उतना कम है। हम सभी लोग आदमी की जात से अच्छी तरह वाकिफ भी हैं और इसी में शामिल भी। हम भी तो आखिर आदमी ही कहे जाते हैं। हो सकता है हममें से कुछ लोग वाकई आदमी हों भी।

आजकल आदमी जितना अधिक असामाजिक होता जा रहा है उतना दुनिया का कोई जीव नहीं। दूसरे सारे जानवर जहाँ कहीं मिलते हैं, एक-दूसरे को बस एक ही सीख देते हैं – बच के रहियो, आदमी की जात से, बड़ी कमजात है, कुछ भी कर सकती है, मनचाहा कहर ढा सकती है।