राखी पर हावी फिजूलखर्ची

राखी पर हावी फिजूलखर्ची

पाश्चात्य चकाचौंध और विदेशी अप-संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ मान बैठे हम लोगों ने अपने पर्व-त्योहारों और उत्सवों की मौलिकता और मूल संदेश को मटियामेट कर डाला है।

अब ये पर्व या तो औपचारिकता होकर रह गए हैं अथवा फैशनी फिजूलखर्ची और छोटे-बड़े पर्दे की मायावी चित्रावली की बन्दरछाप नकल। यों भी हम लोग नकल करने के मामले में प्रसिद्ध हैं और खासकर उन बातों की नकल करने के लिए तो पूरी दुनिया में मशहूर हैं ही जो हमारे किसी काम की नहीं बल्कि दिखावों की नौटंकियों और दूसरों को दिखाने भर के लिए हैं।

किसी भी कर्म की मौलिकता, शुचिता और शुद्धता से हमें कोई लेना-देना नहीं रहा बल्कि अब हम वही सब कर रहे हैं जिसका संबंध न हमारे जीवन से है, न संस्कृति, परिवेश और हमारी सभ्यता से। हमारी संस्कृति, जीवन पद्धति और संस्कारों के परिपालन, खूबियों और खासियतों को जानने, इनके अनुसंधान और प्रभावों आदि सभी को हमने दरकिनार कर उन सारी चीजों और विचारों को अपना लिया है जो हमारे लिए आत्मघाती हैं और समाज तथा राष्ट्र के लिए विनाशकारी।

हमारे सारे त्योहारों की मूल भावना खत्म हो गई है और इसका स्थान ले लिया है नौटंकियों ने। और ये नौटंकियां भी इतनी अधिक खर्चीली हैं कि ईमानदारी और सच्चाई से कमाने वाला आदमी आर्थिक तंगी के बावजूद लोगों की नज़रों में कृत्रिम सम्पन्नता दिखाने के लिए वो सब कुछ कर रहा है जो आत्मा और हृदय को पीड़ा देता है।

हम सभी लोग जो कुछ कर रहे हैं उनमें से अधिकांश पाखण्डों और आडम्बरों का कोई मतलब नहीं हैं, उन बहुत सी बातों का कोई अर्थ नहीं है जिन्हें धंधेबाजों और धर्म के ठेकेदारों ने अपनी चवन्नियां चलाने के लिए इस तरह समाहित कर दिया है कि उससे समाज की अर्थ व्यवस्था खोखली होती जा रही है और हमारे पर्व-त्योहारों व उत्सवों की अर्थवत्ता छिन्न-भिन्न हो चुकी है।

त्योहार कोई सा हो, बिना पैसे जैसे कुछ हो ही नहीं सकता। कुछ दशक पहले बिना पैसा खर्च किए या मामूली पैसों में हम पर्व-त्योहारों से उत्साह और उल्लास के इतने अधिक कतरे साथ ले आया करते थे कि कई दिनों तक इनकी ताजगी और मस्ती पूरे परिवार और परिवेश में छायी रहा करती थी।

जैसे ही इसमें थोड़ी कमी आयी नहीं कि दूसरा उत्सव आ धमकता है। और इस तरह पूरा का पूरा उत्साही माहौल में थिरकता रहा करता था। और ये उल्लास तथा उत्साह पूरी की पूरी जिन्दगी मौज-मस्ती के साथ गुजार देने में समर्थ था। आज कोई सा पर्व, उत्साह और त्योहार हो, लगता ही नहीं कि इससे कोई उत्साह या आह्लाद प्राप्त कर पाना संभव हो।

उत्सवों के आयोजन की आत्मा मर चुकी है और हर व्रत, पर्व, उत्सव और त्योहार नए-नए कारोबारी स्वरूप में इतना बड़ा धंधा हो चुका है कि ये उत्सव अब केवल उन्हीं के लिए आनंद देने वाले रह गए हैं जिनके पास अनाप-शनाप पैसा है, भ्रष्टाचार, कमीशन और रिश्वतखोरी की कमाई है या फिर काली कमाई और हराम का मामला छाया हुआ है।

जब से उत्सवों ने कारोबारी रंग-रूप ग्रहण कर लिया है तभी से इनकी आत्मा मर चुकी है और लगता है कि केवल खोखली देह ही बची है। दूसरे सारे पर्व-उत्सवों की तरह ही रक्षाबंधन के बारे में भी कहा जा सकता है कि राखी के त्योहार का मूल उद्देश्य और परंपराएं क्या हैं, यह किसी को पता नहीं है। जैसा फिल्मों और छोटे पर्दे पर दिखाया जाता है हम लोग नकलची बन्दरों की तरह हूबहू वैसा ही अपना लेते हैं।

हमने राखी के मूल भाव को नष्ट कर दिया है और अब राखी केवल औपचारिकता मात्र होकर रह गई है। रक्षाबंधन वह पर्व है जब हम पारस्परिक रक्षा के उस सूत्र को कलाई पर बाँधते हैं जो सर्वस्व प्रकार की रक्षा के लक्ष्य से दिव्य और प्रभावशाली मंत्रों से अभिमंत्रित है और इसकी दिव्यता और प्रभाव के कारण सभी प्रकार से हमारी रक्षा होती है।

यह रक्षा सूत्र रेशम की डोर मात्र होना चाहिए क्योंकि रेशम मंत्रों की दृष्टि से सुचालक है और इस रेशमी डोर को ही मंत्रों से अभिमंत्रित कर रक्षा सूत्र का स्वरूप दिया जाता है। असली राखी का मतलब रेशम की डोर ही है बाकी सारी राखियां बेकार हैं चाहे वे स्वर्ण, रजत और हीरे जटित हों या नोटों, चमक-दमक अथवा और किसी तरह की।

ये केवल दिखावा ही है और इन महंगी राखियों का कोई अर्थ नहीं है। फिर आजकल चाईना की राखियां आ रही हैं, इनमें प्लास्टिक, सूती धागों और तमाम प्रकार के भड़काऊ वस्त्रों-फुन्दों का प्रयोग होने लगा है। विदेशों से आयी इस सामग्री को राखी के रूप में इस्तेमाल करने वाले हम सभी लोगों को देशद्रोही और आत्मघाती ही मानना चाहिए क्योंकि हमारी यही मूर्खता किसी दिन देश को ले डूबेगी और उस दिन हम राखी भी नहीं मना सकेंगे। पता नहीं हम भारतीयों को कब अक्ल आएगी।

रेशम का धागा ही सबसे श्रेष्ठ रक्षा सूत्र है जिसे मंत्रों से अभिमंत्रित कर कलाई में बाँधने का बड़ा ही महत्व है जो वैदिक और पौराणिक काल से चला आ रहा है। राखी के नाम पर दिखावे और नौटंकियां छोड़ें और यथार्थ एवं सत्य को जानें। महंगी राखियाँ और चमक-दमक छोड़ें और रेशम की डोर को अपनायें।