अध्यात्म चिन्तन – समर्पण प्रयोग

जो झोली पुण्य या पाप की हमारी है उसे पूरी तरह खाली किए बिना नया कुछ भी सृजन नहीं होता। पहले पुराना साफ होगा, फिर नया भरेगा।

नया कुछ अच्छा बन भी जाएगा, तब भी क्यू में जो पहले के हैं उन्हें ही भुगतना पड़ेगा। सुख और दुःख जहां रखे हैं उन्हीं रास्तों से होकर इन्हें भोगते हुए आगे बढ़ना है, वहाँ कोई गली या शोर्ट कट नहीं है।

सिर्फ एक ही उपाय है सारे कर्मों से पिण्ड छुड़ाने का, और वह यह है कि अपने आपको पूरी तरह भगवान के श्रीचरणों में समर्पित कर दो।

लेकिन यह समर्पण आधा-अधूरा या आंशिक न हो, पूर्ण होना चाहिए।

समर्पण के बार अपने कर्म या जीवन को लेकर तनिक भी आशंका रखना भगवान का सरासर अपमान है।

एक बार समर्पण भाव अपना लेने के बाद कर्मों का क्षय करने के लिए हमें अपनी ओर से कुछ भी प्रयत्न नहीं करना पड़ता, जल्द से जल्द कर्म क्षय हो जाते हैं और नया जीवन मिल जाता है।

पर इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में अन्यतम श्रद्धा, अगाध विश्वास और सम्पूर्ण समर्पण जरूरी है। जिसने इस शाश्वत सत्य को स्वीकार कर लिया, उसका बेड़ा पार है। एक बार भगवान के होकर तो देखो।

ज्यादा धैर्य या श्रद्धा-विश्वास न रख सको, तो सप्ताह, पखवाड़ा या एक माह भर तक के लिए ही यह प्रयोग करके देखें।

इसके बाद ठीक न लगे तो छोड़ दें, लेकिन आधे-अधूरे मन से न तो साधना करें न समर्पण या भक्ति की बात।

कामनाओं के लिए इंसानों पर निर्भरता भी बनी रहे, और भगवान से भी कहते फिरें, यह अश्रद्धा ही है।

इंसान या भगवान दोनों में से एक को चुनना पड़ेगा या फिर अपने भीतर वो उदारता और ब्रह्मत्व भाव पैदा करना होगा कि मनुष्य में ईश्वर को देख पाएं।

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