चन्द्रग्रहण पर विशेष – समझदारों के लिए स्वर्णकाल से भी बढ़कर है यह

ग्रहण कोई सा हो, चाहे सूर्य ग्रहण हो अथवा चन्द्र ग्रहण, यह इंसान के जीवन में स्वर्णकाल से भी अधिक मूल्यवान है। इसे अच्छी तरह समझने की आवश्यकता है। ग्रहण वह समय है कि जब अपने ईष्ट, देवी-देवताओं तथा साध्य के बीच कोई अवरोध नहीं होता। सारे अवरोध ग्रहण काल की सम्पूर्ण अवधि में समाप्त हो जाते हैं।  यह वह समय है कि जब साध्य और साधक के मध्य कोई नहीं रह पाता। एक ध्रुव पर साधक होता है और दूसरे ध्रुव पर साध्य।  साध्य और साधक के मध्य सीधे संबंध वाला यह समय केवल और केवल ग्रहण काल ही होता है जिसका उपयोग कर हम अपने जीवन को आशातीत सफल, दैवी कृपाओं से सम्पन्न एवं सिद्धियुक्त बना सकते हैं।

आज पूर्णिमा, मंगलवार रात्रि को चन्द्र ग्रहण है। ग्रहण का स्पर्श रात्रि डेढ़ बजे होगा, इसका मध्यकाल 3.01 बजे होगा तथा ग्रहण का मोक्ष प्रातः 4.30 बजे होगा।

ग्रहण के दौरान किए जाने वाले विशेष कर्म –

1. ग्रहण के स्पर्श काल में स्नान कर साधना आरंभ कर दें। जिन मंत्रों और स्तोत्रों का हम रोजाना या आम दिनों में जप-पाठ आदि करते हैं उनकी कम से कम एक आवृत्ति ग्रहण काल में करनी ही चाहिए। ज्यादा आवृत्तियां हो जाएं तो अच्छा है। इससे इन मंत्रों और स्तोत्रों की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है और अचूक प्रभाव छोड़ते हैं। आम दिनों में रोजाना करने वाले मंत्र और स्तोत्रों की आवृत्ति ग्रहण काल में नहीं की जाए तो वे मंत्र एवं स्तोत्र साल भर सुप्त पड़े रहते हैं, इनका कोई प्रभाव नहीं होता। इसलिए प्रयत्नपूर्वक इनका जप-पाठ करें। अच्छा हो कि नित्यकर्म की पूजा का एक बार आवर्तन ग्रहण काल में हो ही जाए।


2. ग्रहण काल में जो भी मंत्र जप, स्तोत्र पाठ किए जाते हैं वे अनन्त गुना फल देते हैं।

3. आम तौर पर मंत्र सिद्धि के लिए यह नियम है कि जितने मंत्र के अक्षर हैं, उतने लाख जप होने पर ही मंत्र का जागरण होता है अन्यथा हम रोजाना चाहे कितने मंत्र जप करते रहें, इसका कोई असर नहीं होता। अपनी कुल और वंश परम्परा से की जाती रहने वाली उपासना का अवलम्बन किया जाए तो इसका अच्छा प्रभाव सामने आता है क्योंकि हम पुरखों की दिव्य और अदृश्य साधना  परंपरा से जुड़ जाते हैं और ऎसे में पूर्वजों द्वारा की गई साधना का बल प्राप्त होता है और पितरों की विशेष कृपा का अनुभव होता है।

4. बहुत से लोग सिद्धियों के लिए प्रयोग करते हैं और देवी-देवताओं को किसी न किसी आराध्य या गुरु की शपथ(सौगंध) देने वाले मंत्रों का प्रयोग करते हैं। यह विशुद्ध रूप से ब्लेकमेलिंग और अनुचित एवं घृणित कर्म है। अपने स्वार्थ के लिए देवी-देवताओं को विवश करने वाले मंत्रों या स्तोत्रों का पाठ कभी नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार दूसरों को नुकसान पहुंचाने के लिए या प्रभावित करने वाले प्रयोगों से भी बचना चाहिए क्योंकि ये सारे कर्म बाद में दुःखदायी हो जाते हैं और प्रकृति विरूद्ध होने से प्रकृति भी इस प्रकार के जीवात्माओं की दुर्गति करने से पीछे नहीं रहती। किसी को शत्रु मानने या प्रभावित करने के लिए प्रयोग करने की बजाय अच्छा यह है कि अपना सुरक्षा कवच मजबूत करें, दैवीय कृपा प्राप्त कर लें, इससे सारे कर्म अपने आप सिद्ध होते चले जाएंगे।

5. सामान्यतः यह माना जाता है चन्द्र ग्रहण में देवी मंत्र और सूर्य ग्रहण में देवताओं के मंत्रों को सिद्ध करना चाहिए। अपने जीवन की आवश्यकताओं की प्राथमिकताओं वाली सूची बनाकर ग्रहण में इनसे संबंधित मंत्र जप या स्तोत्र पाठ करने चाहिएं। 

6. यह ध्यान रखना चाहिए कि ग्रहण काल में ईष्ट मंत्र का अधिक से अधिक जप होना चाहिए। ईष्ट की कृपा आत्मिक कल्याण और पारलौकिक लक्ष्य की प्राप्ति कराती है। इसलिए इस पर सर्वाधिक जोर होना चाहिए। इसके बाद काम्य कर्मों के अनुरूप इनसे संबंधित देवी-देवताओं के मंत्रों के जप किए जाने चाहिएं।

7. कई बार होता यह है कि ग्रहण काल बहुत कम समय का होता है। ऎसे मेें यह अनिश्चय की स्थिति होती है कि कौनसा मंत्र जप या स्तोत्र पाठ करें और कौनसा नहीं। इस स्थिति में सर्वाधिक प्राथमिकता ईष्ट मंत्र और उसके बाद रोजाना किए जाने वाले मंत्र और स्तोत्रों का प्रयोग करना चाहिए।

8. व्यक्तिगत अनुभव में आता है कि ग्रहण काल में बहुत सारे मंत्रों के जप, स्तोत्रों के पाठ करने की बजाय ईष्ट मंत्र, आत्म कल्याण के मंत्रों पर जोर देना चाहिए। बहुत सारे देवी-देवताओं का यजन करने की बजाय अपनी पुरखों की परंपरा के देवी/देवता की ही साधना करनी चाहिए। बहुत सारे पण्डित, ज्ञानी और कर्मकाण्डी अपने-अपने हिसाब से मंत्र और स्तोत्रों का प्रयोग बताते हैं। इस स्थिति में इंसान दुविधाओं में फंस कर धर्मसंकट का सामना करता है कि कौन सा प्रयोग करे। इस प्रकार के सारे संशयों को दूर करते हुए यह स्पष्ट मान लेना चाहिए कि अपनी कुल परंपरा का आश्रय लेने से मंत्र या स्तोत्र अपने आप और बहुत जल्दी सिद्ध हो जाते हैं क्योंकि अपने पूर्वजों और रक्त संबंधियों द्वारा पूर्व काल में इनके हजारों-लाखों जप हो चुकने के कारण इनमें अपरिमित परमाण्वीय शक्ति समाहित होती है। आवश्यकता बस उस ऊर्जा प्रवाह से अपने तार जोड़ने भर की है।

9. मंत्र सिद्धि के लिए यह माना जाता है कि मंत्र का जागरण तभी होता है जबकि उसके जितने अक्षर हैं उतने लाख जप हो जाएं। बल्कि अच्छा यह है कि इनके सवाये जप हो जाएं। ऎसा नहीं होने पर हम जिन्दगी भर चाहे रोजाना कितनी ही मालाएं करें, सब व्यर्थ है क्योंकि जो मंत्र सोया हुआ है उससे कोई काम नहीं लिया जा सकता। यह अपने आप में समय, श्रम और शारीरिक क्षमताओं को नष्ट करना ही है। यह समझना चाहिए कि अक्षर ब्रह्म है और वही सिद्ध होता है।

10. कलियुग की वर्तमान आपाधापी और प्रतिस्पर्धा के दौर में हमारे पास उतना समय नहीं होता कि किसी मंत्र के लाखों जप कर सकें। यही कारण है कि मंत्र सिद्धि नहीं हो पाती और हम दोष देने लगते हैं मंत्रों और देवी-देवताओं को।

11. ग्रहण काल अपने आप में ऎसा सिद्ध काल है कि इसमें किसी भी मंत्र का जप कर लिया जाए तो वह अपने आप जागृत और सिद्ध हो जाता है और फिर उसका प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगता है।

12. गायत्री मंत्र 24 अक्षरों का है, महामृत्युंजय मंत्र 52 अक्षरों का है। ऎसे मंत्रों को सिद्ध करना यानि की पुरश्चरण के लिए 24 तथा 52 लाख जप की आवश्यकता होती है। यह सामान्य इंसान के बस में नहीं होता। लेकिन इन मंत्रों की दो-चार मालाओं का ही जप कर लिया जाए तो इससे इतने लाख की ऊर्जा प्राप्त हो जाती है और ये मंत्र सिद्ध हो जाते हैं।  इतना महत्व है ग्रहण काल में मंत्र सिद्धि का। फिर भी हम अधिकांश आलसी, प्रमादी लोग ग्रहण काल में सोये पड़े रहते हैं और जीवन के इन महानतम स्वर्णकाल से वंचित हो जाते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि हमें ग्रहण के एक-एक सैकण्ड का पूरा उपयोग करने के लिए सायास और प्रसन्नतापूर्वक उद्यत रहना चाहिए।

13. बहुत से देवी-देवताओं के मंत्रों और काम्य कर्मों की सिद्धि के लिए खूब सारे मंत्रों का प्रयोग करने से बचना चाहिएं। कोई सा एक मंत्र सिद्ध हो जाने पर उसके प्रयोग से दूसरे सारे मंत्र सिद्ध हो जाते हैं। कई सारे मंत्रों और स्तोत्रों की उलझन में फंसे रहने की बजाय एक-दो मंत्रों का अभ्यास होना चाहिए। अपने कर्म की सफलता या सिद्धि प्राप्त करने के लिए यह जरूरी नहीं है कि कई मंत्रों और स्तोत्रों का प्रयोग किया जाए, बल्कि जरूरी यह है कि एक -दो मंत्रों का ही जप करें और अधिक से अधिक जप करें। जरूरी यह है कि लाखों की संख्या में जप उन्हीं एक-दो मंत्रों के हों।

14. समझदार और मंत्र विज्ञानी लोग एक-दो छोटे से मंत्रों का ही अधिक से अधिक जप करते रहते हैं। इससे  इनकी सिद्धि अधिक होती है।

15. यह भी अनुभूत प्रयोग है कि ग्रहण काल में किसी बीज मंत्र अथवा ॐ अथवा दो-तीन अक्षरों का मंत्र सिद्ध कर लिया जाए और बाद में किसी अन्य मंत्र को संपुटित कर जपा जाए तो वह मंत्र भी सिद्ध और जागृत होता है और उतना ही प्रभाव छोड़ता है जितना ग्रहण काल में सिद्ध किया हुआ मंत्र।

16. जीवन में कोई से मंत्र सिद्ध करें लेकिन इस बात का पक्का ध्यान रखें कि कोई सा एक मंत्र ऎसा सिद्ध होना चाहिए कि जिसके बारे में कोई भी जानकार अन्दाज नहीं लगा सके। यह गोपनीय मंत्र उस समय काम आते हैं जबकि साधक पर संकट या किसी मांत्रिक-तांत्रिक प्रयोग होने की स्थिति आ जाए अथवा किसी ब्रह्म राक्षस से ग्रसित हो जाए।

17. ग्रहण काल में लाल स्याही से अपने हस्ताक्षर और नाम सफेद कागज पर 15-20 बार  लिख-लिख कर अभ्यास कर लें। अपने नाम का उच्चारण भी कर लें। इससे अपना नाम, हस्ताक्षर आदि भी सिद्ध हो जाते हैं और फिर जहां लिखे या बोले जाते हैं, उनका पॉवर बढ़ा हुआ नज़र आता है।

18. हम रोजमर्रा जिन संबोधन वाक्यों का प्रयोग करते हैं उनका भी ग्रहण काल में 15-20 बार उच्चारण कर लेने से ये मंत्र के रूप में सिद्ध हो जाते हैं। बाद में जब भी इन्हें बोला जाता है, तब विशेष प्रभाव दर्शाते हैं।

19.ग्रहण काल में थाली में  कुंकुम लेकर अपनी अंगुलियां इस पर फिराते हुए अपने ईष्ट मंत्र से सिद्ध कर लें। बाद में इसका तिलक लगाने पर अपने व्यक्तित्व का प्रभाव बेहतर दिखता है।

20. जिन मंत्रों और स्तोत्रों का जप या पाठ करके हम ग्रहण काल में सिद्ध करते हैं उन्हें बाद में रोजाना किए जाने पर इनका प्रभाव बढ़ता जाता है।

21. अपने जीवन की कामनाओं के अनुसार ग्रहण काल में मंत्रों के जप या स्तोत्रों के पाठ का क्रम निर्धारित कर पूरे समय साधनारत रहना चाहिए।

22. ग्रहण काल में साधना से पूर्व भगवान गणेश, भैरवनाथ, दत्तात्रेय, शिव आदि का स्मरण करना न भूलें। दत्तात्रेय का स्मरण करने से सिद्धि प्राप्त होने में आने वाली सारी बाधाएं दूर होती हैं।

23. देवी उपासना से पूर्व भैरव उपासना जरूरी है। इससे सिद्धि में संशय नहीं होता।

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