दीवाली पर विशेष – साधकों के लिए चेतावनी

इस तरह के अल्पाहार और आतिथ्य से बचें…

साधकों के लिए वर्जित है इस तरह का अल्पाहार…

होली-दीवाली और अन्य सभी प्रकार के पर्व-त्योहारों पर आतिथ्य सत्कार पाने वाले साधकों को चाहिए कि वे खान-पान में शुद्धता का ध्यान रखें। अन्यथा ये त्योहारी खान-पान उनके जीवन के लिए घातक और पीड़ादायी हो सकता है।

परंपरा के अनुसार अक्सर होता यह है कि जब भी हम किसी के घर मिलने-जुलने जाते हैं तब टी-टेबल पर हमारे सामने पहले से सजी हुई अल्पाहार भरी प्लेट्स रखी होती हैं। जैसे ही हम जाते हैं, घर के लोग अल्पाहार का आग्रह करते हैं। और हम अपनी इच्छा के अनुसार कुछ न कुछ ग्रहण करते ही हैं।

दीवाली-होली आदि अवसरों पर टी टेबल पर रखे अल्पाहार को चन्द घण्टों में बहुत सारे लोग अपने हाथों से लेकर खाते हैं और चले जाते हैं। अल्पाहार भरी प्लेट्स और माल सब कुछ वही होता है, बदलते रहते हैं तो आने-जाने और खाने वाले अतिथि।

जब भी इस प्रकार का अल्पाहार एकाधिक लोगों द्वारा छुआ या खाया जाता है तब वह दूषित और उच्छिष्ट (झूठा) हो जाता है। इस तरह सर्वप्रथम खाने वाले के बाद जो-जो लोग इसे खाते हैं वे सारे के सारे पर्व-त्योहारों के नाम पर झूठन ही खाते हैं।

इस प्रकार का अल्पाहार अपनी शुचिता को भंग करता है क्योेंकि जो लोग आते हैं उनमें यह जरूरी नहीं की सारे ही सात्विक ही हों, रुग्ण न हों। मलीन मानसिकता वाले, खुराफाती और अपराधी न हों। इनमें कई सारे दुष्ट, माँसाहारी, शराबी, भ्रूण हत्यारे, रिश्वतखोर, भ्रष्ट और व्यभिचारी भी होते हैं।

और ऎसे लोगों के स्थूल शरीर के साथ जो सूक्ष्म शरीर होता है, उसके आभामण्डल में पापराशि की कई सारी सूक्ष्म ब्लेक लेयर्स होती हैं। जो भी इन पापियों के सम्पर्क में आता है, जहाँ इनका स्पर्श हो जाता है, उस स्थान, वस्तु और व्यक्ति में इनका पाप कुछ न कुछ अंश में घुस जाया करता है।

यदि खाने और खिलाने वाले समान स्तर के पापी हों या पापों व भ्रष्टाचार में लिप्त हों तो भी पाप का स्तर खिलाने वाले के हिस्से में बढ़ जाता है क्योंकि औरों को खिलाने-पिलाने और आतिथ्य प्रदान करने से कुछ न कुछ रिफण्ड सामने वाले से होता ही होता है। इसलिए ऎसे पापियों और भ्रष्ट लोगों को खिलाने से उनके पाप के सूक्ष्म किन्तु अदृश्य तंतुओं के माध्यम से खिलाने वाले के आभामण्डल में पाप का स्तर बढ़ जाता है।

इस तरह अल्पाहार में भी पापियों और आसुरी वृत्तियों वालों के स्पर्श और दर्शन मात्र से नमकीन, मिष्टान्न आदि सभी प्रकार के अल्पाहार दूषित भी हो जाते हैं और झूठे भी। इसका दोष उन सभी के भाग्य में जुड़ता चला जाता है जो बाद में इस अल्पाहार का इस्तेमाल करते चले जाते हैं।

फिर ज्यों-ज्यों आने वाले अतिथियों का सिलसिला बना रहता है, घर के लोग खाली होते रहने वाले पात्रों को पुनः-पुनः सामग्री से भरते चले जाते हैं। ऎसे में किंचित सामग्री भी पहले से पात्र में पड़ी होगी, वह नई भरी जाने वाली सामग्री को भी दूषित करती चली जाएगी। कुछ घण्टों के बाद इस सामग्री में इतनी अधिक झूठन और पापराशि का समावेश हो जाएगा कि कुछ कहा नहीं जा सकता।

इस सारे के आवागमनिया आतिथ्य के क्रम के दौरान यह भी संभव रहता है कि घर वाले बड़े लोग या बच्चे भी बीच-बीच में इनका स्वाद लेते रहते हैं। इस तरह आतिथ्यप्रदाताओं के लिए भी यह झूठन और पापों से भरी सामग्री जीवन के लिए घातक हो सकती है।

यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि जो लोग इस अल्पाहार को हाथ लगाते हैं अथवा देखते हैं, उनके गुण-दोष, भाग्य-दुर्भाग्य, पितृ दोष, ग्रह-नक्षत्रों के अनिष्टकारी तत्व, आरोग्य-बीमारियां, स्वभाव आदि सब कुछ आंशिक मात्रा में इस सामग्री में सूक्ष्म तत्वों के रूप में समाविष्ट होता रहता है। और यह सब आतिथ्य पाने वालों से लेकर आतिथ्यप्रदाताओं तक के लिए घातक हो सकता है। कई सारी नई बीमारियों का आगमन भी संभव है।

चूंकि साधक अहर्निश किसी न किसी देवी-देवता का भजन करता रहता है इसलिए उसमें दैवीय ऊर्जा का समावेश रहता है और वह यदि इस प्रकार की सामग्री को मात्र स्पर्श ही कर ले तो उसकी बहुत सारी ऊर्जा और शक्ति इस सामग्री की पापराशि के स्तर को न्यून करने में खर्च हो सकती है। वहीं पापोंं और झूठन भरी सामग्री के उपयोग से साधक के भीतर स्थित ईष्ट देवता और देवी रुष्ट हो जाती है। यह स्थिति लगातार बनी रहे तो साधक का संचित पुण्य अपनी मूर्खता और झूछन भरी सामग्री के साथ दूषित आतिथ्य से समाप्त हो सकता है।

यह स्थिति साधक की शुचिता को मिट्टी में मिला देने के लिए काफी है। कई साधकों के जीवन में असफलताओं का यह भी एकमात्र कारण है। 

प्रयास यह करें कि जहां कहीं जाएं वहां शुद्ध खान-पान को सर्वोपरि मानें। भ्रष्ट, रिश्वतखोरों, शराबियों, माँसाहारियों, क्रूर कर्म वाले हिंसकों और दुष्टों के यहाँ खान-पान से लेकर सभी प्रकार के व्यवहारों का त्याग करें अन्यथा भगवान की अति कृपा से प्राप्त दुर्लभ मानव जीवन व्यर्थ चला जाने वाला है।

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