जरूरी है अभिव्यक्ति कौशल

ज्ञान, भक्ति और कर्म सभी मामलों में यथासमय यथोचित प्रकटीकरण जरूरी है। अभिव्यक्ति अपने आप में व्यक्तित्व का वह अहम् पहलू है जो हमारे पूरे जीवन और लोक व्यवहार को परिभाषित भी करता है और प्रभावित भी।

अभिव्यक्ति के मामले में कई तरफा इंसान सामने आते हैं। लोगों की एक किस्म केवल और केवल काम में विश्वास रखती है उसे यह पसंद नहीं कि वह अपने बारे में किसी को बताए। बल्कि ऎसे लोगों को अपने बारे में कुछ भी अच्छा कहने में हिचक होती है और शर्म भी आती है। ये लोग इसीलिए मंचों और भीड़-भाड़ से दूर रहा करते हैं।

कुछ लोग उतना ही बोलते हैं जितना पूछा जाता है। लेकिन एक प्रजाति ऎसी भी है जो करती कुछ नहीं मगर अभिव्यक्ति के मामले में यह दूसरे सभी को पीछे छोड़ दिया करती है।  हर वक्त यही जताती है कि वे ही हैं जो काम कर रहे हैं और इतना सारा कर रहे हैं कि उसका कोई पार नहीं है।

ये राई जितना काम करते हैं और पहाड़ जितना बताते हैं।  इन लोगों के पास दूसरा कोई हुनर हो न हो, प्रकटीकरण और नॉन स्टॉप अभिव्यक्ति का ऎसा तिलस्मी हुनर इनके पास होता है कि हर कोई यह मानने लग जाता है कि यही वे लोग हैं जो काम करते हैं, बाकी सारे लोग निकम्मे या कमजोर हैं।

विद्वत्ता, ज्ञान, हुनर और कर्म के अनुपात में अभिव्यक्ति हर इंसान के लिए नितान्त  जरूरी है। बहुत सारे लोग होते हैं जो विद्वान, कर्मयोगी, परिश्रमी और समर्पित कार्यकर्ता होते हैं लेकिन अभिव्यक्ति में कमजोर होने के कारण पिछड़ कर रह जाते हैं। और उनकी बजाय वे लोग दौड़ में आगे आ जाते हैं जो कि काम-धाम और ज्ञान-हुनर के मामले में पिछड़े होते हैं मगर चबा-चबा कर माधुर्य भर कर बोलने की कला में इतने पारंगत होते हैं कि दूसरे सारे लोग इनके वाक्जाल में फंस जाते हैं।

जितनी पैठ या ज्ञान का स्तर हो उतनी अभिव्यक्ति हर इंसान के लिए जरूरी है। आजकल देखा यह जा रहा है कि अभिव्यक्ति के मामले में अच्छे लोग पिछड़ते जा रहे हैं।

यह स्थिति छोटों-बड़ों सभी में देखी जा रही है। इस अभिव्यक्ति कौशल में कमजोर रहने का नुकसान बहुत से लोगों को उठाना पड़ता रहा है। बच्चों को ही देख लिया जाए तो अक्सर निरीक्षण, संभाषण, सहशैक्षिक गतिविधियों, प्रतिस्पर्धाओं, सार्वजनिक अवसरों और सामान्य लोक व्यवहार के दौरान अधिकांश बच्चों में हिचक रहती है और सब कुछ ज्ञान होने के बावजूद घबराहट के कारण वे बोल नहीं पाते।

इसका अर्थ यह निकाल लिया जाता है कि ये लोग पूछे गए विषय में अज्ञानी  या अनभिज्ञ हैं और पूरा ज्ञान नहीं रखते। बहुत सारे इलाके ऎसे हैं जहाँ लोगों में अभिव्यक्ति कौशल की भारी कमी पायी जाती है।

केवल इसी एकमात्र कारण से पढ़े-लिखे, हुनरमंद और मेहनती लोगों को पिछड़ना पड़ता है क्योंकि वे घबरा जाते हैं और सटीक जवाब नहीं दे पाते हैं।  खासकर इन्टरव्यू के समय ऎसे लोगों को नुकसान होता है और मुख्य धारा का आस्वाद नहीं कर पाते हैं।आजकल नई पीढ़ी में अभिव्यक्ति कौशल का अभाव अधिक देखा जा रहा है जो इनके भविष्य के लिए ठीक नहीं कहा जा सकता। कितना अच्छा हो कि अभिव्यक्ति को सटीक, धारदार एवं माधुर्यपूर्ण बनाने के लिए स्कूल स्तर पर विशेष आयोजन हों, विभिन्न संगठनों, संस्थाओं और सार्वजनिक कार्यक्रमों में अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित किया जाए।

किसी समय इसी अभिव्यक्ति कौशल को निखारने और बच्चों की हिचक को तोड़ने के लिए शनिवारीय कार्यक्रम हुआ करते थे और इनका प्रभाव न केवल अभिव्यक्ति को संबल देने में होता था बल्कि प्रतिभाओं को निखारकर आगे लाने में भी इनका विशेष महत्व था।इस दिशा में उन सभी को गंभीरता से सोचने की जरूरत है जो लोग पीढ़ी निर्माण में किसी न किसी रूप में अपनी भूमिका और भागीदारी का निर्वाह कर रहे हैं।

अभिव्यक्ति इंसान के व्यक्तित्व को निखारने का सशक्त माध्यम भी है और उसके इन्द्रधनुषी विकास की बुनियाद भी। फिर आजकल आत्मप्रचार और आत्म विशेषताओं के सार्वजनीन प्रकटीकरण का जमाना है जिसमें बहुविध अभिव्यक्ति के सहारे ही तरक्की के तरानों को सुना जा सकता है।