स्मृतिशेष – श्री हरीशचन्द्र द्विवेदी

सर्वस्पर्शी सौम्य व्यक्तित्व

 ताजिन्दगी चहचहाता रहा प्रशंसा के परिन्दों भरा आसमाँ

      वागड़ की रत्नगर्भा वसुन्धरा एक से बढ़कर एक रत्नों की जननी रही है। इन विभूतियों ने अपने प्रेरणापुन्ज आदर्श व्यक्तित्व और कर्मयोग की बदौलत न सिर्फ वागड़ बल्कि देश-दुनिया के कई-कई क्षितिजों तक इस अंचल का नाम रौशन किया और ऎसे-ऎसे काम किए जिनसे इन्हें युगों तक पूरे आदर के साथ याद किया जाता रहेगा।

      इस सुदीर्घ और यशस्वी गुरु परम्परा मेें हरीशचन्द्र द्विवेदी का नाम नई पीढ़ी से लेकर बुजुर्गों तक पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है और ‘गुरुजी’ के रूप में पूज्य माने जाने वाले हरीश द्विवेदी विलक्षण विभूतियों में गिने जाते हैं।

      मानवीय संवेदनाओं और जीवन मूल्यों से भरे-पूरे व्यक्तित्व के प्रतीक द्विवेदी अच्छे शिक्षाविद्, सुधी सामाजिक चिन्तक, मनीषी साहित्यकार और दिव्य जीवन के उत्तम साधक  रहे हैं।

      उनका जन्म 22 मई 1922 डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा कस्बे में सुसंस्कृत औदीच्य ब्राह्मण परिवार में देवीलाल द्विवेदी के घर झाबुआ (मध्यप्रदेश) के मशहूर राज ज्योतिषी एवं तपोनिष्ठ साधक हरिशंकर जोशी की सुपु़त्री श्रीमती ललिता देवी की कोख से हुआ। उनके दादा मीठालाल मेवाड़ के बान्सी बोहिड़ा ठिकाने के आला मुंशी एवं कुशल प्रशासक थे।

ननिहाल में हुआ पल्लवन

      बाल्यकाल का भरण-पोषण एवं शिक्षा-दीक्षा ननिहाल में ही हुई। ऎसे में इनके लिए नानी का वात्सल्य चिरस्मरणीय और स्वर्णिम रहा है। इनकी बाल्यवास्था यद्यपि सुसंस्कृत, परोपकारयुक्त वातावरण में बडे़ लाड प्यार एवं दुलार से झाबुआ(मध्यप्रदेश) ननिहाल में व्यतीत होने से झाबुआ से ही मैट्रिक तक शिक्षा पाई ।माँ शारदा की कृपा उन पर आरंभ से ही रही है।

      यहीं मातृ-पितृ भक्त इकलौते पुत्र द्विवेदी को माताजी के आग्रह से मात्र 18 वर्ष की आयु में कक्षा नवीं में विवाह बंधन में बंधना पड़ा। डॉक्टर बनने की आशा में वे विज्ञान के विद्यार्थी रहे किन्तु इकलौते पुत्र होने की वजह से बाहर पढ़ने जाने की इजाजत नहीं मिली। घर बैठे इन्टरमीजिएट की परीक्षा उन्होंने 1943 में पास की ।

      ननिहाल तथा थान्दला के सेठ कुसुमकांत के सहयोग एवं प्रेरणा तथा बहनोई प्रसिद्ध मनोविज्ञानी डॉ. भवानीशंकर उपाध्याय के सानिध्य में  उन्होंने बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय से सन 1946 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की जब सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन वहां के उपकुलपति थे और महामना मदनमोहन मालवीय भी जीवित थे। इसके लिए उन्हें डूंगरपुर रियासत की ओर से छात्रवृत्ति दी गई।

शिक्षकीय जीवन से हुई शुरूआत

      उनकी आजीविका शिक्षकीय जीवन से आरंभ हुई। आगे अध्ययन करने की प्रबल इच्छा होते हुए भी डूंगरपुर रियासत के तत्कालीन महारावल लक्ष्मणसिंह के फरमान से महारावल हाईस्कूल डूंगरपुर में उन्हें 10 जुलाई 1946 को नियुक्त होना पड़ा। इस स्कूल में शिक्षकों के अभाव के चलते रियासत ने उनकी सेवाएं लेने का हुक्म जारी कर दिया।

राज परिवार के ट्यूटर रहे

सन 1949 में विद्याभवन उदयपुर से बी.एड. का प्रशिक्षण प्राप्त किया।  तत्पश्चात एक वर्ष उन्हाेंने बांसवाड़ा जिले के गढ़ी में राजकीय माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में सेवाएं दीं।  इसी दौरान् वहां की रानी साहिबा ने उनकी सुपुत्री बाइजीलाल को पढ़ाने नियुक्त किया। राज परिवार के ट्यूटर होने का भी सौभाग्य इन्हें प्राप्त हुआ ।

जनजाति विद्यार्थियों का भविष्य सँवारा

      सन् 1957 में उन्हेंं व्याख्याता के पद पर पदोन्नत कर डूंगरपुर जिले की बनकोड़ा हायर सैकेण्ड्री स्कूल में स्थानान्तरित कर दिया गया। डूंगरपुर रहते हुए उन्हें स्वतंत्रता सेनानी गौरीशंकर उपाध्याय ने गांधी आश्रम में व्यवस्थापक का पद सम्भालते हुए तीन वर्ष तक सेवा संघ एवं आदिवासी बालक-बालिकाओं की सेवा का अवसर दिया ।

      सन् 1960 में उनका स्थानान्तरण उदयपुर हो गया तथा वहां  सीनियर स्कूल लम्बरदार का पारी प्रभारी बनाया। सन् 1962 में उन्हें अजमेर जिले के ब्यावर क्षेत्र का उप जिला शिक्षाधिकारी बनाया गया। सन् 1965 में उन्होंनेे विद्याभवन उदयपुर से एम.एड का प्रशिक्षण प्राप्त किया । 

      सन 1966 से 1970 तक उन्होंने राजस्थान राज्य शिक्षा संस्थान उदयपुर के प्रकाशन प्रकोष्ठ के प्रभारी का उत्तरदायित्व निभाया।  वे सन 1970 से 1974 तक डूंगरपुर जिले में वरिष्ठ उप जिला शिक्षा अधिकारी रहे और इसी पद से सन 1977 में सेवानिवृत्त हुए।

कभी नहीं मानी हार

      उनकी पत्नी श्रीमती शान्तादेवी द्विवेदी ने शैक्षिक योग्यता एफ.ए., एसटीसी अर्जित की थी। वे राजकीय प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापिका रही। जीवन पर्यन्त उन्होंने कंधे से कंधे मिलाकर द्विवेदी जी का साथ दिया। सन् 1977 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें पत्नी वियोग का सामना करना पड़ा जब उनकी अद्र्धागिनी ने ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित होने के कारण एक भरा-पूरा परिवार छोड़ विदा ले ली।

इस असह्य विरह वेदना से राहत पाने वे शिक्षण संस्थाओं से जुड़े रहे।  कांकरोली और मुम्बई में भी उनका आना-जाना बना रहा। न केवल डूंगरपुर बल्कि राजसमन्द और अन्य स्थानों पर भी द्विवेदी ने अपने जीवन को वैचारिक ऊँचाइयाँ देते हुए समाज को आदर्श के सांचे में ढालने का दौर जारी रखा।

      सन 1979 में मेवाड़ महामण्डलेश्वर महंत मुरलीमनोहर शरण, अस्थल उदयपुर के आग्रह पर निम्बार्क शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय का प्रारंभिक प्राचार्य का दायित्व संभाला। इसी प्रकार रामबोला मठ डूंगरपुर के महामंडलेश्वर केशवदास महाराज के आग्रह पर महंत श्री रघुनन्दनदास शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय का प्रारंभिक प्राचार्य पद संभाला।

गुरुजी का प्रभाव छाया रहा जिन्दगी भर

      हरीश द्विवेदी के जीवन पर उनके गुरु वृत्तीजी का पूरा प्रभाव पड़ा है। इसी के परिणामस्वरूप उनके जीवन में कई चमत्कारिक बदलाव देखे गए। जीवन के चरम उत्तरार्ध में भी वे दैदीप्यमान नक्षत्र की तरह वाग्वरांचल को आलोकित करते रहे।

अपने गुरु के प्रभाव की वजह से ही वे जीवन में सुख का आधार संयम मानते थे। धर्म और सम्प्रदाय की संकीर्णताओं से परे विभिन्न धर्मावलम्बियों एवं गुरुओं के प्रति उनके मन में अपार श्रद्धा थी। अपने जीवन में शताधिक गुरुओं, मुनियों और अध्यात्म चिंतकों से उनकी काफी निकटता रही।

विद्यार्थियों को दिया पुत्रवत् स्नेह

      उनका अध्यापन काल उनके लिए कर्मयोग का आदर्श रहा है। उन्होंने अपने विद्यार्थियों को स्वयं के सुपुत्राें की तरह स्नेह एवं ज्ञान दिया। अपने छात्राें, स्नेहियों से प्राप्त श्रद्धा और प्रेम को ही वे अपने जीवन की उपलब्धि मानते हैं।

      छात्रों के प्रति अगाध स्नेह, वात्सल्य, सौहार्द एवं पढ़ाने की अद्वितीय शैली से नई पौध अत्यन्त अभिभूत रही। कर्मयोगी की तरह वे अपने स्वेदकणों एवं स्नेह से राष्ट्र के कर्णधारों का सिंचन करते रहे । छात्रों की प्रतिभा उनकी प्रेरणा, प्रोत्साहन एवं भूरि-भूरि प्रशंसा से निखरती रही और प्रत्येक उनका शिष्य अपनी शक्ति एवं क्षमता से आगे बढता रहा।

अध्यापक और छात्र के मध्य की दूरी कम कर पुत्रवत व्यवहार उनके शिष्यों द्वारा विस्मृत नहीं किया जा सका है। आज भी उनके पढ़ाए हुए शिष्य उच्च पदों पर रहकर समाज और क्षेत्र की सेवामें जुटे हुए हैं।

पारदर्शी व्यक्तित्व, सहजता की खान

      सादगी और सरल-सहज स्वभाव के धनी हरीश द्विवेदी अपने बारे में कहते थे कि  ‘‘मुझ में अपने आप में कुछ भी नहीं है, मात्र खोखला और खाली  हूँ, मगर हाँ, मेरे शुभचिन्तकों ने मेरे बारे में लोगों को जो कह रखा है उसे निभाने का प्रयास करता रहता हूँ।’’

मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पित

      उनके शब्दों में – ‘‘समग्र सृष्टि में मैं मानव को श्रेष्ठतम मानता हूँ और उनसे प्यार पाना चाहता हूँ और देना भी चाहता हूँ । मेरा प्रयास रहता है कि अपने से दुःख-सुख बाँटता चलूं , मुझे वृद्धाें, युवाओं एवं बच्चों से बात करने में तनिक भी संकोच नहीं होता। महिलाओं के लिए मेरा मन, उदार, कोमल, संवेदनशील एवं सहानुभूतिपूर्ण बना रहता है। मैं प्रकृति को मातृवत मानता हूँ और उससे पोषण प्राप्त करता रहता हूँ।’’

      जीवन विज्ञान और व्यवहार के इस दार्शनिक का ताजिन्दगी स्पष्ट मंतव्य रहा कि तन को स्वस्थ रखने के लिए मन को स्वस्थ, स्वच्छ एवं मधुर बनाएं रखना जरूरी है। इसके साथ ही यदि कोई आदमी किसी आदमी के काम आ जाता है तो इससे बढ़कर हार्दिक प्रसन्नता कुछ और हो ही नहीं सकती।

हमेशा खुश रहे, खुशियाँ बाँटते रहे    

      समाज के साथ समरसता स्थापित करके चलना उनके जीवन का चरम लक्ष्य रहा। हजारों-लाखों की भीड़ में हरीशचन्द्र द्विवेदी वह अजीम हस्ताक्षर थे जिनका स्वभाव ही मुस्कराते रहना बन गया है। उन्हीं के शब्दों में – हमें परखने का नज़रिया नहीं है वरना कोई किसी का दुश्मन नहीं है।

      बुजुर्गों को वैचारिक मंच से जोड़ने और समाज को इनके अनुभवों से लाभान्वित करने के लिए उनके निर्देशन में डूंगरपुर में स्थापित विचार मंच की खासी पहचान रही। प्रबुद्ध बुजुर्ग रोजाना शाम एक-दो घण्टे डूंगरपुर के श्रीनाथजी मन्दिर में इकट्ठा होकर स्वाध्याय, सत्संग, बौद्धिक एवं चारित्रिक विकास की चर्चाओं में रमे रहकर समाज में नई प्रेरणा का संचार करने में कामयाब रहे। कांकरोली (राजसमन्द) भी इसी प्रकार उनका अपना क्षेत्र रहा है जहाँ इसी प्रकार का विचार मंच उनके सान्निध्य में पल्लवित-पुष्पित हुआ।

      वृद्धावस्था के बावजूद द्विवेदी जी जीवन के अंतिम क्षणों तक पारस्परिक प्रेम, सुख दुःख में परस्पर सहभागितापूर्ण सारगर्भित सांसारिक मानव जीवन व्यतीत करते हुए राष्ट्रीय दायित्वों और मानवीय मूल्यों की स्थापना का संदेश संवहित करते रहे।

बरसते रहे प्रशंसा के बादल

उनके समग्र जीवन की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि वे हर पल प्रशंसा की फुहारों से हर किसी को आह्लादित कर दिया करते। जो उनके करीब आया, वह माधुर्य भरी तारीफ में डूबे बिना नहीं रह पाया। उनके मुँह से तारीफ के अलावा किसी ने कभी कुछ नहीं सुना। आलोचना या निन्दा से वे कोसों दूर थे। हर किसी के प्रति आत्मीय भाव, माधुर्य, सहजता और सरलता के साथ प्रोत्साहन भरी प्रशंसा के मामले में उनका कोई सानी नहीं।

युगों तक बनी रहेंगी यादें शिक्षा, संस्कारों और सामाजिक आदर्शों की यह विलक्षण विभूति 7 दिसम्बर 2014 को दुनिया को अलविदा कह गई। प्रेरणादायक व्यक्तित्व हरीश द्विवेदी को जानने वाला हर कोई नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सकता। एक आदर्श शिक्षक, मनोविज्ञानी गुरु, संस्कार, सकारात्मक सोच और माधुर्य के संवाहक और सामाजिक आदर्शों से ओत-प्रोत श्री हरीशचन्द्र द्विवेदी को आज भी श्रद्धा से याद कर मौजूदा पीढ़ी उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करती है।

Urgent Times Dungarpur – 21 January 2020

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