गंभीर चर्चा – कुछ नया करें, तब करें नामकरण

किसी भी पुराने स्थान, स्मारक, मार्ग, चौराहा, गांव, शहर, जलाशय, कूप-बावड़ी या किसी भी तरह की परंपरागत भौतिक संपदा का किसी और के नाम से नामकरण करना हमारे पूर्वजों, पुरातन भामाशाहों, निर्माताओं और सृजनकर्ताओं को भुलाने के सायास षड़यंत्र के साथ ही उनका घोर अपमान है। और सरासर नाम-अतिक्रमण है।

आजकल यह परिपाटी बन गई है कि लोग वादों और भावनाओं में बहकर नामकरण करने-कराने की राजनीति में उलझते जा रहे हैं और इससे इंसान की नवीन सृजन क्षमताओं को ग्रहण लगता जा रहा है। प्राचीन नामों के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ इतिहास और परंपराओं के साथही तत्कालीन योगदानकर्ताओं और रचनात्मक लोकसेवियों का अपमान है।

हम किसी के नाम और जीवन को चिरस्थायी बनाना चाहें तो उसके लिए कोई नवीन संरचना का निर्माण करें और उसका नामकरण इच्छित व्यक्ति के नाम पर करें। यही नैसर्गिक न्याय का सिद्धान्त है।

संसार में हम पुराने नामों का अतिक्रमण करने और बनी-बनायी संरचनाओं-संपदाओं और स्थलों को अपने नए नाम देने के लिए नहीं बल्कि नवीन सृजन और नई संरचनाओं के निर्माण के लिए पैदा हुए हैं। इस विषय को गंभीरता से समझने की कोशिश करें, भावावेश में न बहें।