कुछ कह रही है यह भीषण-भयावह गर्मी

कुछ कह रही है यह भीषण-भयावह गर्मी

कुछ कहना चाहती है

बहुत कुछ कहना चाहती है यह गर्मी हम सभी से।

उन लोगों से भी जो खुले में घूमने-फिरने और काम करने को विवश हैं

और उनसे भी

जो लोग एयरकण्डीशण्ड में रहने के आदी हैं, बिना एसी के जी नहीं सकते।

उनसे भी बहुत कुछ कहना चाहती है जिनके पास न कूलर हैं, न फ्रीज और न ही एसी।

शीतलता में रहने वाले आनंदी ठेकेदारों से भी बतियाना चाहती है गर्मी, जो अल्पसंख्या में हैं

और उस आम इंसान से भी बातें करना चाहती है जो बहुसंख्यक है और गर्मी के मारे भी।

हर साल बढ़ती जा रही  गर्मी ग्लोबल वामिर्ंंग की चुनौतियों के साथ मुखर होकर सामने आ रही है,

मगर हम न उसकी भयावहता के प्रति संवेदनशील हैं, न उसके परिणामों को लेकर जागरुक।

हम सभी लोग छाया तलाशने लगे हैं, यहाँ-वहाँ, जहां-तहां, सब जगह हमें छाया ही छाया चाहिए लेकिन छाया की बुनियाद को हमने ध्वस्त कर दिया है।

हमारी पुरानी पीढ़ियां जो दरख्त दे गई, जो बरकत दे गई हैं उसे भी हम नहीं रख पा रहे हैं बरकरार।

हमें खुद को भी छाया चाहिए, हमारे कुत्तों, गधों और घोड़ोें को भी। हाथियों और वाहनों को भी। हमारे कबीलों और कुनबों को भी छाया चाहिए।

जरा फुरसत निकाल कर देखने की कोशिश भी करें कि आखिर हमने छाया के लिए क्या कुछ किया है अब तक।

हमने बहुत कुछ उजाड़ दिया है जो आसमान और हमारे बीच सुकून का समन्दर उमड़ाता रहा है।

वन-उपवन और हरियाली को बरबाद किया, जल स्रोतों पर कहर ढाया और वह सब कुछ कर डाला जिससे प्रकृति हमारे पीछे गर्मी, अकाल और सूखा लेकर पड़ गई है।

हम चाहे लाख कोशिशें कर लें लेकिन नहीं बच पाएंगे क्योंकि अब कुछ बचा ही नहीं है जो हमें बचा सके या या हमारा बचाव कर सके।

हम केवल गर्मी को कोसने का काम ही कर सकते हैं उसके सिवा कुछ नहीं।

हम पेड़ नहीं लगा सकते, पेड़ उगा नहीं सकते, पल्लवन और संरक्षण नहीं कर सकते, और तलाशते हैं छाँव।

नामुमकिन है अब छाँव।

कुछ साल और रुक जाओ, जितनी छाया है, हरियाली और पानी है उतना भी नसीब नहीं होगा यदि हमारी बदचलनी इसी तरह बदस्तूर जारी रही।

उन पेड़-पौधों को देखो, पशु-पक्षियों को देखो, जिन्हें न पानी नसीब हो पा रहा है, न कोई दाना।

ठण्डे पानी, बर्फ, कुल्फी और सभी प्रकार के ठण्डे का मजा हम ही लूट रहे हैं।

हम जी भर कर शीतल जल से गला तर कर रहे हैं और बेचारे बहुसंख्यक लोग, पशु और पक्षी बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं।

हमारी कैसी संवेदनशीलता है ये। सारा आनंद और जीवन हमें ही चाहिए, दूसरे जीव चाहे भूख और प्यास से मरते रहें।

इंसान के सामने यदि कोई पशु-पक्षी या दूसरे जीव भूख-प्यास से मरते हैं तो यह पाप इंसान के खाते में ही दर्ज होना है क्योंकि हमारी जिम्मेदारी है कि हम प्राणी मात्र के प्रति संवेदनशील रहकर उसके काम आएं, उसकी जिन्दगी को सुरक्षित रखें और मानवता का फर्ज निभाएं।

बाहर की भीषण गर्मी इतना सब कह रही है फिर भी हम अनसुना करने पर तुले हुए हैं।

याद रखें, कब तक उपेक्षा करते रहेंगे, यह आग जब और अधिक मुखर होगी तब दावानल बनकर भस्म कर देगी, अग्नि के प्रचण्ड वेग ने नौतपा के जरिये अब फिर संदेश दे दिया है।