सामाजिक यंत्रणा है परिवार सुख छीनना

इकाई, परिवार, समाज, क्षेत्र और देश आदि सभी का अपना सीधा संबंध है और रहेगा। भारतवर्ष में परिवार की अवधारणा है और यह परिवार की इकाई जितनी अधिक मजबूत होगी उतना ही समुदाय, समाज, क्षेत्र, गांव या शहर, प्रदेश और देश मजबूती प्राप्त करेगा।

आज के परिप्रेक्ष्य में सर्वाधिक चिन्ता परिवार को लेकर है। परिवार की जो सनातन और शाश्वत परंपरा रही है उसकी प्रगाढ़ता में ही देश की मजबूती निर्भर रही है। परिवार की यह इकाई जितनी अधिक मजबूत होगी, उतना ही आगे की श्रृंखलाएं मजबूत और टिकाऊ होती रहेंगी।

दुर्भाग्य से आजादी के बाद जिस संस्था को सबसे अधिक भंग किए जाने की कोशिशें हुई उनकी वजह से परिवार का मजबूत ढांचा अब बिखरा-बिखरा सा हो गया है। जहां कहीं समूह के अनुशासन के साथ कोई पहचान बनती है वह खुद के लिए भी, और क्षेत्र तथा देश के लिए भी ताकतवर मंच के रूप में उभरता है।

इससे सामूहिक रहन-सहन, एक-दूसरे के प्रति आदर-सत्कार, संवेदनशीलता और पारस्परिक विकास की भावनाओं का विकास होता है तथा संकट या दुःख की घड़ी में एक-दूसरे के काम आने की मनोवृत्ति से कई सारी समस्याएं हल हो जाती हैं।  परिवार की अवधारणा बरकरार थी तब तक एक-दूसरे के लिए जीने-मरने और काम आने की भावनाएं प्रगाढ़ हुआ करती थीं।

कहीं कोई अपने लिए ही नहीं जीता था। सभी लोग सभी के लिए जीते थे और दूसरों की भावनाओं का आदर करने के साथ ही इस बात के लिए भी चिंतित रहते थे कि हमारा कोई कुटुम्बी, पड़ोसी या क्षेत्रजन दुःखी अथवा समस्याग्रस्त न रहे।

चिन्ता इस बात की भी कि  अपने स्तर पर हर कोई यह जानने की स्वैच्छिक कोशिश करता था कि  हमारे आस-पास या साथ रहने वाले इंसान को किस चीज की कमी है और इसे हम कैसे दूर कर सकते हैं। घनीभूत समन्वय और सहयोग, सौहार्द और सहिष्णुता के साथ ही  संवेदनशीलता की इतनी गहरी जड़ें थी तभी तो परिवार के रूप में सुदृढ़  अभेद्य सुरक्षा और विकास का कवच आकार लेते हुए जीवन को धन्य कर दिया करता था।

हाल के वर्षों में परिवार का ढांचा तहस-नहस हो गया और इसका असर यह हुआ कि सारी की सारी इकाइयां अपने आपको संप्रभु और स्वतंत्र मानती हुई किसी सुनसान या भूतहा द्वीप की तरह विकसित होती चली गई और वे सारे लोग अलग-थलग होकर अपने-अपने संसार बसाते रहे जिन्हें एक साथ रहने के लिए ही सामाजिक बना कर धरती पर भेजा गया था।

जो सामाजिक प्राणी हैं, घरेलू या सामाजिक दृष्टि से उपयोगी प्राणी हैं उन सभी की मौलिक आदतें समूहों में रहने की होती है, वे सभी समूहों को पसंद करते हैंं और अपने-अपने समाज या समुदाय बनाकर साथ-साथ रहते हैं, पूरी जिन्दगी साथ रहते हुए एक-दूसरे के काम आते हैं लेकिन दुनिया के अधिकतर खूंखार और हिंसक प्राणी अकेले ही रहते हैं और अपनी साम्राज्यवादी हरकतों से अलगाववादी रवैया रखते हैं।

यही स्थिति आज इंसान की हो गई है।  इंसान सामाजिकता से असामाजिकता की ओर गति करने लगता है तब वह अपने आपको अलग इकाई मानकर देखता है और उसी प्रकार का व्यवहार करता है। यह खुदगर्जी और संकीर्णता आजकल चारों तरफ इतनी अधिक पसर गई है कि कोई साथ-साथ रहना नहीं चाहता, कोई साथ देना नहीं चाहता। और इसलिए पूरे समाज और देश के सूक्ष्म एवं स्थूल धरातल पर विभाजनवादी और स्वार्थ केन्दि्रत मानसिकता हावी होती जा रही है।

असल में देखा जाए तो समाज और देश की सभी समस्याओं का यही एकमात्र कारण है और इसकी वजह से बाहरी लोग, आतंकवादी, संस्कारहीन विदेशी परंपराएं, नीच स्वार्थ भरी मनोवृत्ति, पाश्चात्य चकाचौंध के प्रति समर्पण, संगठन का अभाव और जड़ों से कटने, घुसपैठ, सीमाओं की सुरक्षा के खतरे, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट, अत्याचार, अनाचार आदि सब बढ़ते जा रहे हैं।

इन सभी के लिए और कोई नहीं, हम ही जिम्मेदार हैं। हम सामूहिक विकास की बातें करते हैं लेकिन सामूहिकता की बजाय हमारा विश्वास  अपने स्वार्थ पूरे करने में ही हो गया है। जिस जमीन को हम सभी सामूहिक उत्सवों, आयोजनों में उपयोग में लाया करते थे उस जमीन को हम सभी ने टुकड़े-टुकड़े पर बांट लिया है या अतिक्रमण करते हुए आगे बढ़ चले हैं। इसका खामियाजा हमें ही इस रूप में उठाना पड़ रहा है कि हमें छोटे-मोटे आयोजनों के लिए भी वाटिकाओं की विवशता है।

ज्यों-ज्यों पारिवारिक माधुर्य और प्रगाढ़ता खत्म होती जा रही है त्यों-त्यों सारी कला-संस्कृति, उत्सव, सामाजिक रहन-सहन और परंरपराओं का विनाश होता जा रहा है। पारिवारिक विघटन के इस दौर में भी बहुत से लोग अलग-अलग स्थानों पर रहने को विवश हैं।

ये सभी लोग अपने परिवार के साथ रहकर पारिवारिक सुख का आनंद पा सकते हैं लेकिन मानवी भीड़ में बहुत से लोग हैं जो पारिवारिक सुख के हत्यारों के रूप में चर्चित हैं। इन लोगों की हरकतें और कर्म ही ऎसे हैं कि लोग चाहते हुए भी परिवार के साथ नहीं रह पाते और बरसों बरस अलग-थलग पड़े रहने को मजबूर हैं।

शोषकों, अन्यायियों और अत्याचारियों की एक नई ऎसी हत्यारी प्रजाति विकसित हो चुकी है जो लोगों को परिवार-सुख से वंचित करने में सिद्ध है और इन्हें इसी में मजा आता है। दुर्भाग्य से इनके हाथ ऎसे तिलस्म लग गए हैं जिनकी वजह से ये मदारियों की तरह करतब दिखाते हुए वह सब कुछ कर रहे हैं जिससे इन्हें आनंद या इच्छित की प्राप्ति होती है।

समाज हित और राष्ट्र हित में देखा जाए तो किसी को भी जानबूझकर, द्वेषतापूर्ण तरीके से या कि अपने अहंकारों और मलीन मानसिकताओं की तृप्ति के लिए परिवार सुख से वंचित करना अपने आपमें प्रताड़ना और सामाजिक अपराध ही माना जाना चाहिए।

देश की विडम्बना और दुर्भाग्य ही है कि आजकल असुरों की तरह-तरह के रंगों वाली प्रजातियां यही काम कर रही हैं। और इसीलिए भारतमाता इन दिति-पुत्रों की हीन और क्रूर आसुरी हरकतों से दुःखी, सन्तप्त और व्यथित है व इसी कारण प्राकृतिक आपदाओं, अकाल मृत्यु और भय जैसी स्थितियां सामने आकर हमें चेताती रहती हैं फिर भी हम अपनी ही अपनी चलाते रहते हैं।