चिन्तनपरक आलेख लेखन के छह वर्ष पूर्ण

प्रसन्नता है कि रोजाना औसत हजार शब्दों वाले चिन्तन आलेख का जो दौर जैसलमेर में 26 फरवरी 2011 को आरंभ किया था वह अब सातवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है।

इससे पूर्व मेरे लेखन में वागड़ अंचल का बहुआयामी परिदृश्य समाहित था। अस्सी के दशक से लगातार लेखन प्रक्रिया जारी रही। इसी बीच सन् 2011 में मेरे एक लेखक मित्र ने उस समय मुझे उलाहना देते हुए कहा था कि वागड़ पर लिखना बंद करो, अब हमें लिखने दो।

तभी मैंने तय कर लिया था कि अब कुछ नया व अन्यतम लिखूंगा और ऎसा लिखूंगा कि जैसा दूसरे सामान्य लोग नहीं लिख पाते, पूरा का पूरा मौलिक होगा और दिव्यत्व से भरपूर भी।

इसकी शुरूआत 26 फरवरी 2011 को कर दी, जिन दिनों मैं जैसलमेर में जिला सूचना एवं जनसंपर्क  अधिकारी के पद पर कार्यरत था।

मित्रों और मेरे प्रति सद्भावना रखने वाली कृपालु हस्तियों की वजह से अपनी मातृभूमि से कोसों दूर जैसलमेर में पदस्थापित रहते हुए समय का भरपूर उपयोग किया और रोजाना चिन्तनपरक एक आलेख लिखने का दौर आरंभ किया जो आज भी लगातार जारी है।

मैं शुक्रगुजार हूं मेरे उस मित्र का जिसकी वजह से मेरे लेखन को नई दिशा मिली और यह अनन्य लेखन लोकप्रिय हुआ। इसका पहले पहल कॉलम के रूप में प्रकाशन भाई श्री चन्द्रकान्त डी. भट्ट ने अर्जेन्ट टाईम्स में किया।

आज चिन्तन लेख विभिन्न नामों से कई सारी पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं और इसका रेस्पोंस भी अवर्णनीय है।

सम सामयिक और लोक जीवन से लेकर परिवेश तक के विभिन्न आयामों पर केन्दि्रत ये लेख खूब पसंद किए जा रहे हैं, इसका सुकून है।

चिन्तन आलेखों ने कई मजेदार पक्षों से भी रूबरू कराया है। कुछ लोग इसे अपने पर भी ले लिया करते हैं और कुछ लोगों का मानना है कि वे जो सोच रहे हैं उन्हीं पर लिखा जा रहा है। कुछ इसे अस्त्र-शस्त्र मानते हैं, कुछ आत्मसुधार के लिए प्रेरक। और बहुत से मानते हैं कि लोक जागरण के लिए बहुत अच्छा लिखा जा रहा है।

चाहे कुछ भी हो, इस बहाने लेखन का नियमित दौर बना हुआ है और इससे वैचारिक विरेचन का अनिर्वचनीय सुख प्राप्त हो रहा है।

विचारों का कबाड़ जमा करते रहने और उन्हीं मकड़जालों में खोये रहने की बजाय रोशनदानों को निरन्तर साफ बनाए रखना ज्यादा अच्छा लगता है। जीवन्मुक्ति और मोक्ष की दिशा में इसे बेहतर और एकल उपाय के रूप में जाना जाए, तो अधिक अच्छा है।

उन सभी का आभार जो इस प्रकार के चिन्तनपरक लेखों को पसंद करते हैं। उन कतिपय लोगों के प्रति भी आभार प्रकट करने को जी चाहता है जो इन लेखों से असहमति रखते हैं लेकिन रोजाना पढ़ने का मोह संवरित नहीं कर पाते।