सहजता ही है सिद्धि का सिंहद्वार

जो लोग खाने-पीने और मौज उड़ाने को ही जिन्दगी समझते हैं उनके लिए कुछ भी सोचने-विचारने और करने तथा कराने की आवश्यकता नहीं है। वे सारे के सारे अपने-अपने हिसाब से अपने हाल में मस्त और पस्त हैं। 

चिन्तन करने की आवश्यकता उनके लिए है जो मनुष्य के रूप में पैदा होने से लेकर वापस लौटने तक के उद्देश्यों और लक्ष्य के प्रति गंभीर चिन्तन के साथ संवेदनशील बने हुए हैं क्योंकि यही वो जमात है जो कि मातृभूमि, कर्मभूमि और धर्मभूमि के लिए कुछ करने के लिए पैदा हुई है। इसलिए इनका चिन्तनशील होना नितान्त जरूरी भी है और स्वाभाविक भी है क्योंकि जिम्मेदारी का बोध उसी को होता है जो कि मेधा-प्रज्ञावान तथा समझदार है।

जो लोग जीवन का साधना मानकर कर्म करते हैं उनके लिए गीता का ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग प्रभावी है। इनमें से कोई सा एक योग हो सकता है अथवा किसी-किसी ज्ञानवान के लिए तीनों ही योग उपयुक्त हैं।  पर अधिकांश लोगों के लिए साधना का सीधा सा अर्थ उभरकर सामने आता है, वह है कि भक्ति और उपासना के विभिन्न आयामों का अवलम्बन। ज्ञानी-ध्यानियों में से बहुत से लोगों के तनाव का मुख्य कारण यही है कि वे उतनी साधना नहीं कर पाते हैं जितनी सोचते हैं। इस बात को लेकर अक्सर वे मायूसी और आत्महीनता के दौर से गुजरते रहते हैं।

आम तौर पर हर इंसान साधना को लेकर एक निश्चित समय और पूजा-अर्चना या पाठ-जप आदि का मानस बनाता है और उसी के अनुरूप संकल्प लेता हुआ आगे बढ़ने की कोशिश करता है। दो-चार-दस दिन तक तो उसका यह दृढ़ निश्चय कायम रहता है लेकिन बाद में कभी समय की कमी आ टपकती है, कभी कोई बेवजह आ धमकता हुआ समय नष्ट कर देता है, कभी विश्वास डगमगाने लग जाता है या कभी बिना किसी कारण के आलस्य और प्रमाद घेर लिया करते हैं।

इससे नियमितता का क्रम भंग हो जाता है और अपेक्षित साधना नहीं कर पाने का मलाल रहता है। यह आत्महीनता और शैथिल्य को प्रकट करता है और अनमनी सी स्थिति में हम जीने लगते हैं जहाँ बिना किसी कारण के भी कुछ नहीं हो पाता। खासकर साधना के बारे में यह स्थिति सामान्य से लेकर उच्चतम अवस्था प्राप्त कर सिद्ध हो चुके सभी लोगों में देखी और अनुभव की जाती रही है।

यह स्थिति मनुष्य की स्वाभाविक अवस्था है जिसके प्रति हमें किसी भी प्रकार से न खिन्न होने की आवश्यकता है, न तनाव पालने की। अधिकांश साधकों और भक्तों जीवन में बस इसी एक बात को लेकर जबर्दस्त अन्तद्र्वन्द्व की स्थिति होती है।

इस छोटी सी बात का तनाव हमारे जीवन की रोजमर्रा की प्रत्येक घटना को भीतर तक प्रभावित करता है क्योंकि हम अपना दिन ईश्वर आराधन व पूजा-पाठ से शुरू करते हैं और इससे हमें आत्मशक्ति और कर्म शक्ति से लेकर सभी प्रकार की सफलताओं का मार्ग प्राप्त होता है और इस बात का हमेशा अहसास बना रहता है कि ईश्वर हमारे साथ हमेशा बना हुआ है। 

पर एकाध दिन या कुछ दिन शारीरिक, मानसिक, सांसारिक कारणों, समयाभाव अथवा मनःशांति के अभाव में पूजा-अर्चना व जप-ध्यान आदि नहीं हो पाता है तब मन उदास हो जाता है और तन-मन दोनों ही से शिथिलता का अहसास होने लगता है।

तब स्वाभाविक रूप से हम यही मानते हैं कि पूजा-पाठ, ध्यान-भजन न हो पाने के कारण ही ऎसा होता है। अक्सर हम इस स्थिति में अपने आपको खिन्न पाकर यह शंका भी पाल लिया करते हैं कि इससे कहीं भगवान नाराज तो नहीं हैं।

यह सोच और स्थितियाँ हमें इतना अधिक उद्विग्न बना दिया करती हैं कि हम हर अनमनी और अनचाही बात के लिए भगवान की नाराजगी या कोप को जिम्मेदार ठहराने लगते हैं। जबकि सत्य तो यह है कि भगवान कभी किसी पर नाराज नहीं होता, वह प्रसन्न ही होता व रहता है।

भगवान कभी यह नहीं चाहता कि हम जप-तप या अनुष्ठान, पूजा-पाठ आदि के यांत्रिक अनुशासन के चक्कर में पड़े रहें और मशीन की तरह काम करते रहें।  भगवान चाहता है कि मनुष्य चाहे कुछ करे लेकिन वह हमेशा सहज अवस्था में रहे ताकि उसका मन शांत रहे, उद्विग्नता मिट जाए और हर हाल में संतुष्ट और मस्त रहने की आदत बना ले। और प्रत्येक क्षण उसका स्मरण बनाए रखे।

यही कारण है कि हम चाहे कितने अशांत और उद्विग्न हों, थोड़ी सी पूजा-पाठ और श्रद्धाभक्ति के साथ भगवान का स्मरण करते ही सहजावस्था को प्राप्त हो जाते हैं और आनंद भाव का अनुभव करने लगते हैं।

इस तथ्य को स्वीकार लें कि सारी साधनाएं पहले चित्त को शांत करती हैं, मन के विकारों का शमन करती हैं और परम संतोष के साथ पूर्ण सहज बनाती हुई आनंद के द्वार तक ले जाती हैं।

फिर जहाँ कोई भी इंसान सहज, सरल और पावन हो जाता है वहाँ ईश्वर तत्व अपने आप प्रतिष्ठित हो ही जाता है। ईश्वर को भी सहजावस्था पसन्द है। वह नहीं चाहता है कि सांसारिक भागदौड़ में वह उसके लिए चिन्तित रहे और पूजा-पाठ के नाम पर कत्र्तव्य कर्म में कमी आ जाए अथवा किसी कारण से किसी दिन अथवा कुछ दिनों तक ध्यान-भजन न हो पाए तो उद्विग्न और अशांत बना रहे।

इस अशांति, खिन्नता, मायूसी और असहजावस्था में की गई साधना और भजन-पूजन का कोई मतलब नहीं है चाहे कितने ही घण्टे मर-मर के मालाएं और स्तोत्र पाठ गिनते रहें। कुछ न हो पाए तो इसका मलाल न रखें। सिर्फ ईश्वर का स्मरण ही बनाए  रखें और केवल अपने नित्य कर्म के प्रति ही बंधे रहें, नैमित्तिक और काम्य कर्मों का मोह न रखें।

फिर हर प्रकार की साधना का पहला लक्ष्य शुचिता देना है। साधना में कोई अवरोध आ जाए तो उसे लेकर असहज न हो जाएं बल्कि इसे सामान्य रूप में ही लें। कई बार कई-कई दिनों तक कुछ भी नहीं हो पाता, यह आत्म उदासीनता अथवा घोर शून्यावस्था भी अपने आप में सिद्धि प्राप्ति के लक्षणों मेंं समाहित है। यह स्थिति सामान्य स्तर के साधकों से लेकर उच्चावस्था तक पहुंच चुके योगियों, ध्यानियों और सिद्धों तक में पायी जाती है।

लेकिन इतना जरूर ध्यान रखें कि साधना न होने की स्थिति में अपने आपको संयमित रखें, अपनी पावनता बनाए रखें और कोई सा पाप कर्म न करें। इससे साधना न हो पाने के बावजूद अपने पुण्य या ऊर्जाओं का क्षरण नहीं होगा। साधना न होने की स्थिति में यदि हम पाप कर्म में प्रवृत्त होते हैं तब हमारी शक्तियों का ह्रास होता है और उसका परिणाम बुरा हो सकता है।

जीवन में जब कभी संकल्पित साधना न हो पाए, समय न मिले या कोई से व्यवधान आ जाएं, तो विचलित न हों बल्कि आनंद भाव में रहें और इस तथ्य को हमेशा याद रखें कि सहजावस्था में आनंद भाव की स्थिति में की गई मामूली सी साधना से भी बड़ी से बड़ी ऊर्जा, दिव्यता और दैवत्व प्राप्त किया जा सकता है। कई बार ईश्वर भी हमें सहज मुक्तावस्था के लिए छोड़ देता है ताकि सांसारिक वृत्तियों का उन्माद अपने आप समाप्त हो जाए और हम मौलिक स्वभाव में लौट आएं।

 इसलिए साधनाहीनता के दौर में अपने आपको आत्महीन न मानें, सहज बने रहें। कुछ भी न हो पाए तो कोई बात नहीं, इसका कोई बुरा प्रभाव अपने जीवन पर नहीं पड़ सकता। ऎसा होने पर कुछ घण्टों या दिनों में अपने आप साधनात्मक पक्ष प्रबल वेग प्राप्त करने लगेगा।

हमेशा इस शाश्वत सत्य का स्मरण बनाए रखना चाहिए कि सरलता, सहजता और आनंद अवस्था में की गई साधना ही आशातीत सफलता और सिद्धि, मुक्ति अथवा ईश्वरीय साक्षात्कार के द्वार खोल सकती है। इसलिए सदैव आनंद भाव में रमण करें, प्रसन्नता से भरपूर रहें और मानसिक रूप से ईश्वरीय अंश होने का अनुभव करते रहें।

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