दिली उद्गार – कृतज्ञता परमो धर्म

दिली उद्गार – कृतज्ञता परमो धर्म

मैं उन सभी के प्रति विनम्र भाव से, हृदय से कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ जिनकी आत्मीयता, चाहत, प्रेम और सद्भाव ने मुझे हमेशा आनंदित किया है। इन्हीं सज्जनों और आत्मीयों ने अपनी भरपूर क्षमाशीलता, सहनशीलता, सहिष्णुता और सदाशयता का परिचय देते हुए दिव्य आनंद की स्नेहवृष्टि का अनिर्वचनीय सुख प्रदान किया है।

मैं उन सभी के प्रति भी कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ जिन लोगों ने आलोचना और निन्दाओं में रमे रहकर मुझे उनके हृदय और मस्तिष्क में आतिथ्य भाव से स्थान दिया, पग-पग पर मुझे संभलने, हकीकत से परिचित कराने, रोशनी दिखाने, मेरी व्यापक पब्लिसिटी करने और मेरी ऊर्जाओं को बहुगुणित करने में अवैतनिक, मानद और स्वैच्छिक सहयोगी की भूमिका निभायी तथा अपना अधिकांश समय और सम्बल मुझे प्रदान किया।  ये अमित्र न होते तो न मुझे सफलता प्राप्त हो सकती थी, न यह आनंद भाव।

सभी के सभी प्रकार के सहयोग ने मुझे जो आनंद दिया है उसके लिए मैं अत्यन्त आभारी हूँ। मैं आप सभी के ऋण से उऋण होने के लिए हरसंभव प्रयास करता रहूंगा। बस आपका साथ, स्नेह, आशीर्वाद और मित्र-अमित्र भाव बना रहे। मेरे लिए आप जो कुछ करते रहे हैं, वे निरन्तर करते रहें, ईश्वर आप सभी को शक्ति, सम्बल एवं सफलता प्रदान करे।

आप सभी की दीर्घायु और यशस्वी जीवन की कामना करता हूँ।