आत्म निखार के लिए शरीर को तपाना जरूरी

आत्म निखार और आत्म ज्ञान की प्राप्ति के लिए सबसे पहली आवश्यकता इंसान की मौलिक शक्तियों की उपलब्धता और सभी प्रकार की शुद्धता का होना जरूरी है। यह शुद्धता तभी आ सकती है कि जब हम भीतर-बाहर सभी प्रकार से शुद्ध-बुद्ध हों तथा इसमें किसी भी प्रकार का कोई अंतर न रहे।

हालांकि यह स्थिति प्राप्त करना मुश्किल जरूर है पर असंभव कदापि नहीं। इसके लिए अपने आप का मजबूत होना और सच्चाई पर टिकना जरूरी है।

आम तौर पर इंसान मन-मस्तिष्क और शरीर सभी प्रकार से किसी न किसी प्रकार की मलीनता और प्रदूषण से ग्रस्त होता है। मानसिक से लेकर शारीरिक धरातल पर सभी प्रकार की मलीनता के रहते हुए आत्मा का निखार या आत्म तत्व की प्राप्ति संभव नहीं है।

आत्मज्ञान को पाने के लिए अपने शरीर को उसके अनुकूल बनाना निहायत जरूरी होता है। इसके लिए शरीर की सभी प्रकार की ज्ञानेन्दि्रयों और कर्मेन्दि्रयों का अनुशासित, मर्यादित और संयमित होना जरूरी है।

चातुर्मास इसी आत्मज्ञान की प्राप्ति का अवसर है जिसमें इंसान एकान्तवास करता हुआ अपने मूल स्वभाव में लौटता है और उसे इस बात का अहसास होता है कि वह क्या है, क्याें आया है तथा क्या करना शेष है।

यह स्थिति तभी प्राप्त हो सकती है कि जब हम सांसारिकता से प्राप्त तमाम प्रकार के विकारों का परित्याग करें और इनसे मुक्त हो जाएं।

हालांकि इन सांसारिक विकारों से मुक्ति कोई सहज सुलभ कार्य नहीं है लेकिन ईश्वरीय कृपा, बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद, ज्ञानियों और संतों  की अनुकंपा से सब कुछ संभव है। वे बिरले लोग ही हैं जो इस प्रकार की कठिन और शाश्वत यात्रा का मार्ग चुनते हैं और अपने दैवीय लक्ष्यों में कामयाबी पा जाते हैं।

इस स्थिति को पाने के लिए यह जरूरी है कि हम मन-मस्तिष्क से एक-एक कुविचार को त्यागें, नकारात्मक भावनाओं का परित्याग करें और शून्यता की स्थिति में अपने आपको लाएं ताकि सकारात्मक और दैवीय ऊर्जा से परिपूर्ण विचारों और सूक्ष्म शक्तियों की आवक शुरू हो सके।

इसी प्रकार शरीर को सोने की तरह तपाने के लिए विजातीय द्रव्यों और गैर पुरुषार्थी मार्गों से आए खान-पान से पुष्ट शरीर की शु        द्धि करने की जरूरत है।  इसीलिए त्याग और तपस्या का मार्ग अपनाया जाता है ताकि शरीर से गंदगी धीरे-धीरे बाहर निकले, भीतरी गंदगी प्राणायाम और जपादि के माध्यम से भस्मीभूत होती रहे और हमारा शरीर तपकर सामने आए।

इसके लिए चातुर्मास में एकान्तिक साधना जरूरी है। हम सभी को चाहिए कि सांसारिकता, धूम धड़ाकों और आडम्बरों, शोरगुल और पाखण्ड से ऊपर उठकर ईश्वर को पाने के लिए प्रयास करें, आत्मज्ञान पाएं और आत्म साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करें।

आजकल चातुर्मास के नाम पर जो कुछ हो रहा है उसे धर्म अध्यात्म की दृृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता क्योंकि चातुर्मास का अर्थ ही यह है कि इन चार माहों में अपने आपको जानने के लिए सब कुछ करना चाहिए न कि सार्वजनिक धूम धड़ाका।

जो धर्म-कर्म और अनुष्ठान, शोरगुल भरे आयोजन, सार्वजनिक समारोह, उत्सव और सब कुछ हम साल भर करते रहते हैं उन्हीं को हम इन चातुर्मास में भी करते रहते हैं, फिर चातुर्मास और दूसरे आठ माहों में फर्क क्या रहा।

और जब कोई फर्क नहीं रहा, हम चातुर्मास के महत्व को समझने की क्षमता नहीं रखते हैं, ऎसे में चातुर्मास के नाम पर सब कुछ करने का क्या अर्थ है। इस बात का न धर्माधिकारी समझ पा रहे हैं, न बाबा लोग। हो यह गया है कि आजकल धर्म के नाम पर धंधों भरी गतिविधियां इतनी अधिक हो गई हैं कि सभी लोग चाहते हैं कि अपना धंधा हर क्षण चलता रहे, ताकि पैसों की आवक बनी रहे।

इन चार माहों में शादी-ब्याह, मांगलिक कर्म आदि कुछ नहीं होने पर जिन लोगों की कमाई पर असर पड़ता रहा है वे लोग धर्म के बहाने अपने धंधे चला लेने के लिए चातुर्मास में धूम-धड़ाकों, उत्सवों और तरह-तरह के लोक लुभावन धार्मिक आयोजनों में घुसपैठ कर लिया करते हैं और उन लोगों को प्रोत्साहित करते रहा करते हैं जिनकी वजह से साल भर कुछ न कुछ चलता रहे।

चातुर्मास केवल और केवल एकान्तिक साधना से है जिसमें हर इकाई को आत्म संयमित रहकर भगवान का चिन्तन करने, अपने आपको जानने, चुपचाप रहकर गोपनीय साधना करने आदि की परंपरा रही है।

जो जितना अधिक शरीर को तपाता है वही निखर कर आगे आता है। इसके लिए अनुकूल समय में निरहंकारी बने रहना और प्रतिकूल समय में धीर-गंभीर बने रहने के साथ ही जीवनचर्या के प्रत्येक कर्म और व्यवहार में सादगी को अपनाना बहुत जरूरी है। भोग-विलासी, प्रमादी और आलसी जीवन में व्यस्त रहने वाले इंसान टाईमपास औसत जिन्दगी ही जी पाते हैं।