आत्म संवाद

दोनों में से एक ही मिलना संभव –

श्रेष्ठ कर्म की खबर छपवा कर राजी हो जाओ अथवा मौन कर्मयेाग कर पुण्य संचय करते जाओ।

 

संकेत –

अपने आत्मीयजन, आस-पास वाले और मातहत ही जब हमारे पराभव या मृत्यु की कामना करते हैं, तब समझ लो अंत आ ही गया है।

 

पोषण –

कुतियाएँ और कुत्ते आजकल ब्रेड नहीं रुपए खाने के आदी हो गए हैं।

 

यथार्थ –

जिसका प्रबल ईष्ट है, वही शिष्ट हैं, शेष सारे उच्छिष्ट हैं।

 

– सदैव मजबूत रखें अपना ईष्टबल –

ईष्टबल है तो कोई बाल बांका नहीं कर सकता, चाहे कितना ही बड़ा आदमी या औरत क्यों न हो। ईष्ट बिना सब भ्रष्ट है ज्योतिष, वेद, पुराण।

 

पैसा फेंको-तमाशा देखो –

विचारधारा पर हावी हो गई है मुद्राधारा और धाराओं पर हावी है धार

 

अपनी बात –

सरहद पर रहकर आया हूँ, अब सरहद का खौफ नहीं। हर सरहद से प्यार है।

 

अवैतनिक सहयोगी –

वे हमेशा करते रहते हैं जिक्र मेरा हर किसी के सामने, वे मेरे पीआरओ भी हैं और सफाईकर्मी भी।

 

सादगी –

सादगी का उच्चतम स्तर अपनाने वाले ही लोकनायक और ऋषि परम्परा का हिस्सा हो सकते हैं, भोगी-विलासी और पराश्रित कभी नहीं।

 

– हर-हर महादेव –

अपेक्षाओं से मुक्त हो जाना अपने आप में दिगम्बर अवस्था पा लेना है। यही है असली शिवत्व।

 

जंगलराज जिन्दाबाद –

पनीर का मजा ले रहे हैं पालकी वाले, और इधर कहारों को पालक तक नसीब नहीं। उधर मखमली खुमारी में मदहोश हैं वे, और इधर छीले हुए कँधे रह-रहकर कराह रहे हैं।वे सारे तटस्थ, अन्यायी और स्वार्थी लोग सड़-सड़ कर मरेंगे और नरकगामी होंगे, जो बेशर्म होकर अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे हैं।

 

वाह-वाह –

राष्ट्रवाद की डींगे हाँकते उनके गले सूख रहे हैं, और उधर उनके पाले-पोसे हुए उत्पाती कुत्ते ईमान को फाड़ खा रहे हैं।

 

– राष्ट्रवाद अमर रहे –

उठाईगिरे मंगतों को पैसे दे दो, इनके पुण्य प्रताप से राष्ट्र अपने आप पा लेगा परम वैभव।

 

भरोसा –

विश्वास करना ही होगा – डायनें आज भी जिन्दा हैं।

 

जिज्ञासा –

रिश्वत देने के लिए कहीं लोन मिलता हो तो कृपया बताएँ। खूब सारी भिखारिनें और भिखारी पीछे पड़ गए हैं।

हे राम! उसे मतलब है सिर्फ पैसों से। फिर भाड़ में जाए घर-बार, समाज और देश। इन गलियों में ऎसे भिखारी पहले कभी नहीं देखे गए।

 

– भिखारी  ही हो गए हैं निर्णायक –

पैसों और स्थान का तगड़ा रिश्ता है। पैसे दे दो, बने रहो। पैसे दे दो मनचाहा पा जाओ।

 

– नज़र आता है भिखारियों का कुंभ –

सब तरफ लुच्चे-टुच्चे और भीखमंगे ही देखे जा रहे हैं। इन मंगतों का अलग से राष्ट्र बनना चाहिए।

 

– भूतभावन हर-हर महादेव –

आजकल रोज भूत बोल रहे हैं घुग्घुओं की तरह, सुना रहे हैं नित नई कहानियाँ और दे रहे हैं अपने  भविष्य के संकेत।

 

– बड़े लोगों की बड़ी भूख –

भिखारी और लालची सब होते हैं, चाहे राजा हो या रंक-फकीर।

 

खाने वाले, मजे से खाता रह –

ये गाजर की पूंगी है, तु भी खा, अपने-अपनों को भी खिला। अभी पूरा खेत भरा हुआ है गाजर से। तेरे बाप-दादा भी यही करते रहे हैं।

 

अनुकरणीय –

अपेक्षाओं से मुक्त हो जाना जीवन्मुक्ति का प्रथम द्वार है।

 

भूतों की श्रेणियां –

वर्तमान भूत, भूतकालीन भूत और भावी भूत। बोलो बाबा भूतनाथ की जय।

 

– जय हो भूतनाथ की –

लातों के भूत बातों से नहीं मानते।

भूतों की ही क्यों, भूतनियों की भी तो चर्चा करो। भूतों से तो भूतनियां ज्यादा खतरनाक और घातक हो गई हैं।

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