इन अघोरियों को देखें

वह जमाना बहुत पुराना हो चला है जब गाँव से बाहर किसी शिवालय में या श्मशान भूमि पर ऎदी और अघोरियों को अपनी ही मस्ती में घूमते, राख में लौटने तथा भक्ष्य-अभक्ष्य खाते हुए देखा जा सकता था। बात बहुत पुरानी भी नहीं हैं, पचास के दशक से पहले तक ये नज़ारे आम हुआ करते थे।

बढ़ती जनसंख्या और बस्तियों के श्मशान तक फैलाव ने इन अघोरियों की शांति भंग कर दी व एकांत छिन लिया। अब शहरों व गाँवों के आस-पास ही इन्हें को देखा जा सकता है। इन अघोरियों के तंत्र सिद्ध, स्वयं शिव के समान सिद्धियों के स्वामी होने तथा इनके चमत्कारों की चर्चाओं को छोड़ भी दिया जाए तो अब इन अघोरियों का रूपान्तरण हो चला  है। हमारे क्षेत्र तथा आस-पास इतनी बड़ी संख्या में अघोरी अब दिखने लगे हैं जिनके न मन में स्वच्छता है न शरीर में। इसीलिए ऎसे  दरिद्री और गंदे लोगों को भी बुजर्ग अघोरी कह कर पुकारते रहे हैं।

अघोरी रहे नहीं, अब आधुनिक अघोरी हमारे सामने हैं। इनके जीवन का कोई क्रम या मर्यादा निश्चित नहीं है। कई ऎसे हैं जो न रोज अथवा  समय पर नहाते हैं, न कपड़ों का ध्यान है न खान-पान का। न कोई जीवन मर्यादा है न अनुशासन। न उठने-बैठने का ध्यान रहता है, न किसी प्रकार के संस्कारों का।

जो जहाँ से मिला, उसे ग्रहण कर लिया। फिर आजकल थोड़ा बहुत हुनर आ जाने पर कहीं भी मुफ्त में माल उड़ाया जा सकता है। इसके लिए न कोई वर्जनाएं हैं न किसी की रोक-टोक।  जैसे-तैसे औरों का माल हजम कर डकार भी न लेने वाले ऎसे लोगों की संख्या आजकल खूब बढ़ती जा रही है।

कइयों की मलीन मनोवृत्ति ने उनके चेहरे- मोहरे तक को बेडौल बदसूरत बना डाला है।  मनोमालिन्य भरे ऎसे कई लोगों के चेहरे ही ऎसे हो गए हैं  जैसे किसी बड़े बूचड़खाने के मालिक या मैनेजर ही हाें, जिनके स्वभाव में मनमर्जी से लूट -खसोट और नर पिशाचों सी क्रूरता व हिंसक व्यवहार, शोषण और उन सारी कलाओं में महारत है जो एक आम आदमी पूरी जिंदगी में नहीं कर सकता।

इन आधुनिक अघोरियों का पूरा जीवन अश्लील बकवास, षड़यंत्रों व बेईमानी के व्यामोह से घिरा रहता है।  इन अघोरियों की दिनचर्या से लेकर इनकी कार्यशैली, स्वभाव तथा इनके चाल-चलन तक में अघोरियों सा व्यवहार झलकता है ही, इनके अपने डेरे भी अघोरियों की तरह हो जाते हैं।

आदमी का मन जैसा होता है वैसा ही वह परिवेश व अपने डेरे को देखना चाहता है। जो लोग मन से मलीन है उनके कक्ष, उनके पर्दे, उनकी टेबलों की दराजें, उनके बाथरूम तक भी गंदे , सड़ाां मारने वाले तथा बेकार होते हैं।

इनके डेरे किसी कचरा पात्र को ही प्रकटाते हैं। अपने आस-पास देखें और जानें कि गंदे डेरों वाले इन अघोरियों की पूरी जिंदगी सड़ांध मारती है। जहां न मानवता की खुशबू है न इनमें किसी भी लिहाज से मानव का स्वरूप।

अपने आस-पास बसने वाले इन अघोरियों की ही तासीर हैं कि ये जहां रहते हैं वहाँ श्मशान नहीं  तो श्मशान जैसा नकारात्मक माहौल पसर ही जाता है। ईश्वर इन अघोरियों के लिए कहीं दूर श्मशान का प्रबन्ध करे ताकि बस्तियों में रहने वाले इंसान खुशी से रह सकें और इंसानियत की सुगंध के कतरे हमेशा सुकून देते रहें।@डॉ. दीपक आचार्य