नैसर्गिक आकर्षण का विज्ञान

स्त्री और पुरुष में आकर्षण स्वाभाविक नैसर्गिक गुण है। पूर्ण पुरुष और पूर्ण स्त्री ही एक-दूसरे को आकर्षित करने और दुनिया को कुछ दे पाने की क्षमताएं रखते हैं। आधे-अधूरे या आंशिक स्त्री-पुरुष और नपुंसकों के भाग्य में कुढ़ना, महाविधुरों और महाविधवाओं की तरह रोना-धोना और आत्मीय प्रेम संबंधों तथा शाश्वत माधुर्य के खिलाफ जंग में डटे रहकर जिन्दगी बर्बाद करना ही लिखा है। रुदाली और निन्दागान को स्वीकार कर चुके इन तथाकथित और आधे-अधूरे या आंशिक स्त्री-पुरुषों और नपुसंकों का भगवान भी भला नहीं कर सकता। वर्तमान युग के दुर्भाग्य से आजकल ऎसे कापुरुष निर्वीर्य और बाँझ लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो क्षमताहीनता की वजह से ईष्र्या और द्वेष के सिवा कुछ नहीं कर पाते हैं। स्त्रीत्व और पुरुषत्व से हीन इन जीवों से तो वे वृहन्नलाएं अच्छी हैं जो वर्ष भर किसी न किसी उत्सवी धाराओं में रमे रहकर आनंद भी पाती हैं, स्वस्थ मनोरंजन भी करती हैं और इसके साथ ही रुपए-पैसे और उपहार भी पा लेती हैं। खुद भी आनंदित रहती हैं और दूसरों को भी आनंद प्रदान करती रहती हैं।