बचाएँ आत्म ऊर्जा

‘सेव इनर्जी’ केवल नारा ही नहीं है बल्कि जीवन विज्ञान का वह महत्त्वपूर्ण पक्ष है जो हर किसी को प्रभावित करता है। जीवन भर की संचित साधना और परिश्रम से अर्जित ऊर्जा  को अंतिम समय तक बचाए रखने का हरसंभव प्रयास करना चाहिए क्योंकि जीवन में किस समय किस बड़ी आफत से सामना हो जाए, कब अपने किसी काम के लिए बड़ी शक्ति की जरूरत पड़ जाए, यह अनुमान कोई नहीं लगा सकता।

लेकिन इतना तो कर ही सकता है कि वह अपने लिए शक्ति संचित कर रखे और इस बात के पक्के प्रयास करता रहे कि अपनी ऊर्जा का क्षरण न होने पाए बल्कि यह ऊर्जा निरन्तर बढ़ती और जमा होती रहे ताकि जीवन के किसी निर्णायक मोड़ पर काम आए।

अपनी ऊर्जा को बचा कर रखना बड़ा ही मुश्किल काम है। हर कोई इस संकल्प को हमेशा के लिए धारण नहीं रख सकता। इसके लिए संयम चाहिए। और संयम भी कोई मामूली नहीं बल्कि पहाड़ जैसा होना जरूरी है। यह काम बिरले लोग ही कर सकते हैं।

कारण यह कि आज के भय, तनाव और विषमताओं भरे माहौल में हर कोई सुलगता, जलता और भभकता दिखाई दे रहा है, रेडियेरटर बना हुआ है, कोई शांत नहीं हैं, हर किसी का दिमाग सातवें आसमान पर हैं और इस गर्मी के कारण शीतलता का प्रवेश संभव नहीं हो पा रहा है।

जहाँ चित्त शांत नहीं रहता वहाँ अशांति और उद्विग्नताओं का बोलबाला बना रहता है। फिर सब तरफ स्वार्थ, कामों की आपाधापी और लपकने-लूटने की जो प्रवृत्तियां पनपती जा रही हैं उसने आम और खास सभी लोगों का सुख-चैन छीन लिया है।

अब पाने ही पाने को जिन्दगी समझा जाने लगा है और सेवा-परोपकार तथा औरों पर लुटाकर खुश होने जैसी कोई बात रही ही नहीं। रोजमर्रा के लोक व्यवहार में कई बार ऎसे अवसर आते हैं जब ऎसी घटना-दुर्घटनाएं घट जाती हैं जिनमें हमारा प्रसन्न या विचलित होना स्वाभाविक है और उसी के अनुरूप हमारी प्रतिक्रिया सामने आती है और हर प्रतिक्रिया अपनी कुछ न कुछ ऊर्जा साथ लेकर ही बाहर निकलती है।

कई बार मूर्खों, मंदबुद्धियों और लपकों से पाला पड़ता है, कई बार दुष्ट लोग बेवजह पंगा लेकर परेशान करते रहते हैं। बहुत सी बार उन लोगाें से हमें परेशानी होती है जो लोग हमसे बिना किसी वजह से दुश्मनों की तरह पेश आते हैं, ढेरों लोग अपने से मुकाबला करते हुए खुद को ऊँचा, सभ्य और शालीन दिखाने के लिए हम से अपनी तुलना करने की कोशिश करते रहते हैं।

इस तरह के खूब सारे विभिन्न रंगों-रसों और आकारों वाले जीवों का संसार है जो दुनिया को तंग करने के लिए ही पैदा हुआ होता है और हमारी राह में रोडे अटकाता रहता है। जो लोग सफलता के शिखरों की ओर बढ़ते हैं, दैवीय कृपा और मौलिक हुनर के बूते बिना किसी के सहारे आगे बढ़ते रहते हैं उनके लिए वल्लरियां हमेशा यमपाश बनकर आगे -पीछे लगी रहती हैं।

ऊर्जावान और समर्थ लोगों के जीवन का सबसे बड़ा, अहम् और नकारात्मक पक्ष यही है कि ज्यों-ज्यों इनकी शक्ति,  ऊर्जा और सामथ्र्य आशातीत सफलता की ओर गतिमान होते रहते हैं, त्यों-त्यों उन लोगों की संख्या बढ़ती चली जाती है जो कैंकड़ों, साँप-बिच्छुओं और गिद्धों को भी पीछे छोड़ देने का माद्दा संजो लेते हैं।

प्रकृति भी हमारी परीक्षा लेती है। वह देखती है कि परेशानियों, विषमताओं और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कोई कितना अधिक खुश  और आत्मस्थिति में रह पाता है। जो लोग इस कसौटी पर खरे उतर जाते हैं वे लोग सब कुछ पा जाते हैं लेकिन जो विफल हो जाते हैं वे धकिया दिए जाते हैं।

दुष्ट लोग चाहे किसी भी किस्म के हों, वे हमारी ऊर्जा के क्षरण के लिए आने वाले असुर हैं जो छोटी-छोटी घटनाओं व विवादों को जन्म देकर हमेशा यही कोशिश करते रहते हैं कि किसी न किसी तरह से हम उन पर क्रोधित होकर अपना आपा खो बैठें और हमारी संचित ऊर्जा धीरे-धीरे नष्ट होती चली जाए।

अधिकांश लोग परिवेशीय हलचलों और दुष्टों की हरकतों पर क्रोधित होकर प्रतिशोध पाल लेते हैं और फिर यहीं से शुरू हो जाता है हमारे खाली होने का सिलसिला। जितनी भीतरी शक्ति प्रेम, स्नेह और भोग में खर्च नहीं होती, उससे बीस गुना शक्ति प्रतिशोध में खर्च हो जाती है।

यही कारण है कि हमारी ऊर्जा शक्ति छोटी-मोटी फिजूल की बातों और नालायक लोगों पर खर्च हो जाती है और हम रिक्त होते चले जाते हैं। इस वजह से हमें बड़े और ऊँचे लक्ष्यों को पाने में या तो और अधिक परिश्रम करना पड़ता है अथवा ऊर्जाहीनता के कारण विफल हो जाते हैं।

दुनिया के घटिया और नुगरे लोगों के कारण हमें हानि उठानी पड़े, वह काम हम सभी लोग कर रहे हैं।  जीवन में जिस किसी मोड़ पर ऎसे पिशाचवृत्ति वाले लोग मिलें, उनसे किनारा कर लें, इन्हें पैदाइशी मूर्ख और मंदबुद्धि मानकर पूर्ण उपेक्षा कर दें और आगे बढ़ चलें। इससे हमारी शक्तियों का क्षरण नहीं होगा और ये ताकत हमारे महान लक्ष्यों को पाने में मददगार सिद्ध होगी।