एक ही सवाल – क्या मिलेगा ?

एक जमाना वह भी था जब लोगों के पास धन-सम्पदा, वैभव आदि सब कुछ होते हुए भी सम्पन्न से सम्पन्न और गरीब से गरीब व्यक्ति भी सेवा करने में आगे रहता था और सेवा के जरिये पुण्य का संचय करने के हर काम में भागीदार हुआ करता था।

बात बहुत पुरानी नहीं है। कुछ दशक पूर्व तक यह परंपरा बरकरार थी लेकिन जब से आदमी के विचारों और व्यवहारों का संकुचन आरंभ हो गया है तब से इस परंपरा का निरन्तर ह्रास होता जा रहा है।

सेवा से जुड़े हुए सारे सरोकार अब आम आदमी और समुदाय की बजाय कुछेक संस्थाओं और गिरोहों में कैद होकर रह गए हैं। इनमें कई देशी हैं, कई विदेशी हैं। कई बाहरी पैसों से चल रही हैं और कई पैसों के लिए चल रही हैं। सेवा के नाम पर चलने वाली इन संस्थाओं ने सामाजिक सेवा के पुरातन संस्कारों और मूल्यों का जो हश्र किया है वह किसी से छिपा हुआ नहीं है। ये सारे सेवा के लिए काम कर रहे हैं लेकिन अब तक किसी की समझ में यह नहीं आ पाया है कि ये लोग सेवा करने के लिए कुछ कर रहे हैं अथवा सेवा कराने के लिए, या कि सेवा के नाम पर।

पहले जमाने में आदमी अपने घर-संसार और गृहस्थी के धर्म को निभाते हुए सेवा के धर्म को अच्छी तरह निभाना जानता था। उस समय सेवा और परोपकार व्यक्ति के जीवन की प्राथमिकताओं में शुमार होते थे और सेवा का मौका पाने वाले लोग अपने आपको धन्य समझकर पुण्य का संचय करने का अहसास करते थे।

इस सेवा के बदले किसी भी प्रकार का प्रतिफल प्राप्त करना उन पुरखों की कल्पना तक में नहीं था बल्कि जो कुछ करते थे उनमें समुदाय के कल्याण की भावना प्रमुखता पर हुआ करती थी। धर्म और अध्यात्म की धाराओें में सेवा धर्म भी अहम् स्थान रखता है।

शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि परोपकार से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। मन्दिरों में घण्टियां बजाने, बाबाओं और कथावाचकों के लिए आलीशान और एयरकण्डीशण्ड भवन बनाने और उनके लिए ऎशोआराम के संसाधन और जीवन्त खिलौने उपलब्ध कराने के लिए पैसा बहाना और फालतू लोगों को दान-धर्म करने से कहीं ज्यादा महत्त्व जरूरतमन्द की सेवा को प्रदान किया गया है और साफ परिभाषित किया गया है कि इस सेवा और परोपकार से ही  ईश्वर को जल्दी प्रसन्न किया जा सकता है। लेकिन यह सब कुछ होना चाहिए निष्काम और निरपेक्ष भाव से।

मानवीय मूल्यों में निरन्तर क्षरण होते रहने और स्वार्थ केन्दि्रत गतिविधियों में लगातार प्रसार के चलते आज मनुष्य जीवन से सेवा धर्म पलायन करता जा रहा है और इसकी जगह स्वार्थ परंपरा ने ले ली है।

समाज में सेवा के अनन्त अवसर विद्यमान हैं लेकिन इनका कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है। अधिकांश लोग मैं और मेरा घर तक सिमटते जा रहे हैं। उन्हें कोई मतलब नहीं है कि उनका पड़ोसी कौन है, कैसा है और उसे क्या चाहिए। समुदाय और क्षेत्र में भी क्या हो रहा है, उसके प्रति आदमी बेफिक्र है। उसे सिर्फ अपने बारे में सोचने की फुर्सत रह गई है। ज्यादातर लोग अपने में ही केन्दि्रत होकर रह गए हैं।

जीवन भर संचित करते रहकर अपने आपको धनी-मानी मानने के एक सूत्री महा-अभियान में आदमी आदमीयत को इतना भुला बैठा है कि उसका हर क्षण जमा करने में ही लगा हुआ है। यह भी गंभीरता के साथ सोचने का विषय है कि इसमें से कितने लोग स्वयं पर खर्च कर पा रहे हैं और कितनों का जमा किया हुआ धन और लोगों के भाग्य में चला जा रहा है। कमा कोई और रहे हैं, जमा कोई और, खा रहे कोई और हैं। संसार की इस विचित्र माया से बेखबर लोगों को इसके बावजूद सीख लेने की फुर्सत नहीं है और दौड़े जा रहे हैं इकट्ठा करने।

वैश्वीकरण और उदारीकरण के वर्तमान दौर में विश्व भले ही व्यापक धरातल पा रहा हो मगर आदमी लगातार सिकुड़ता जा रहा है।  सिकुड़न के इस दौर में जहाँ आदमी को अपनी ही पड़ी है, ऎसे में उसे सेवा के प्रति न कोई लगाव रह गया है, न भावना। सेवा धर्म की पुरानी परंपराओं को भी वह आगे नहीं बढ़ाना चाहता।

जरूरतमन्दों को उनके लायक रास्ता दिखाने और हरसंभव मदद करने की भावना अब गौण होती जा रही है। सेवा के नाम पर कुछ होगा तो तभी जब पब्लिसिटी का कोई मौका सामने हो।

लोगों की एक किस्म अब ऑक्टोपस की तरह समाज की छाती पर मण्डराने लगी है जो सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए सेवा से जुड़े आयोजनों में रमने लगती है और फिर गायब हो जाती है। कुछेक लोग और संस्थाएं ही अभी ऎसी बची हैं जिनका तन-मन-धन सेवा में जुटा हुआ है।

पब्लिसिटी के तमाम प्रोपेगण्डों से दूर रहकर सेवा करने वाले ऎसे लोगों को इससे कोई मतलब नहीं है कि उनके बारे में लोग क्या कहेंगे। ऎसे लोग दिन-रात सेवा में रमे हुए अलग ही मस्ती में जी रहे हैं। न इन्हें पब्लिसिटी चाहिए, न धन संपदा या पद-प्रतिष्ठा का मोह।

समाज में पहले जहां सेवा प्राथमिकताओं पर हुआ करती थी वहीं अब सबसे पिछले पायदान पर आकर अटक गई है। समाज की परिस्थितियां इतनी विषम हो चली हैं कि अब हर कोई मेवा खाना चाहता है, सेवा करना कोई नहीं। और अब तो मेवा खाने का माद्दा ही नहीं रहा, न पचाने का। इसलिए अब छपास की भूख ही काफी है आदमी को खुश होने का भ्रम पाले रखने के लिए।

आजकल समुदाय और समाज के कल्याण की भावना से कोई सृजनात्मक गतिविधि चलानी हो या आमजन की भलाई का कोई सेवा अनुष्ठान, लोग इनसे दूर-दूर भागने लगे हैं। समाजसेवा के लिए पहले लोग खुद ब खुद अपनी ओर से पहल कर आगे आते थे, पर अब किसी से सेवा में हाथ बँटाने की बात भी कहेंगे तो उसका सबसे पहला और सीधा प्रश्न यही होता है कि क्या मिलेगा।

आदमी अब वहीं पर काम करने लगता है जहां कुछ मिलने की उम्मीद हो। उसकी घर-गृहस्थी के संचालन के लिए जीवननिर्वाह के निश्चित साधनों से जो मिल रहा है उसमें उसे कोई संतोष नहीं है। वह एक कदम भी अब तभी आगे बढ़ाता है जब उसे कहीं कुछ मिलने की उम्मीद हो। वरना वहीं धँसा रहकर  टाईमपास करने लगेगा या बकवास करता रहेगा।

कुछ मिल जाने की उम्मीद आजकल हर कहीं पाँव पसार रही है। जिन्हें भरपूर मिल रहा है वे भी भिखारियों की तरह ज्यादा से ज्यादा मिल पाने के लिए याचना करते रहते हैं। इन घोड़ों-गधों को थोड़ी भी घास नहीं दिखेगी तो अधमरे पड़े रहेंगे।  ये अंगड़ाई भी लेंगे तो कुछ मिल जाने का आश्वासन पा लिए जाने के बाद।

सेवा का धर्म रहा नहीं। वो जमाना अलग था जब लोग निष्काम और निस्पृह भाव से समाज को आगे बढ़ाने के लिए सेवा को अपनाते थे। आज का जमाना वह आ गया है जब खुद आगे बढ़ने और कुछ पा जाने के लिए समुदाय को दरकिनार करते हुए आदमी की सेवा का चलन चल पड़ा है।

आदमी के भीतर वैचारिक धुंध और मुद्राओं का संगीत इस कदर हावी हो चला है कि आदमी अब दुकान होता जा रहा है। हर काम मेंं हिसाब लगाता है और जहाँ मुनाफा दिखता है वहाँ दौड़ लगाने लगता है, जहाँ कहीं कुछ मिलने की आस नहीं होती, वहाँ अधमरा पड़ा रहता है और आडम्बरी जीवन के साथ अभिनय करने लगता है। अपने क्षेत्र में ऎसे लोगों की खूब भरमार है जो इस परंपरा को धन्य करने में जुटे हुए हैं। और हमारा दुर्भाग्य या कि समाज का अभिशाप ये कि ऎसे लोगों को हम आदर-सम्मान दर्शा कर पूज्य मान बैठे हैं।

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