समाजभक्षी हैं या तमाशबीन

समाज में बहुत सी बीमारियां और अभाव इतने अधिक गहरे तक जड़ें जमा लिया करते हैं कि इनके जख्म, सिहरन और सिसकियाँ दिखती नहीं लेकिन पूरे समुदाय और राष्ट्र के लिए परमाणु बम विस्फोट से भी अधिक विध्वंसक और महाघातक से भी अधिक गंभीर होती हैं और इनका प्रभाव पूरे समाज और देश ही नहीं बल्कि विश्व भर पर पड़ता है।

समाज सेवा और सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों को सब कुछ पता है लेकिन इनकी संवेदनाएं उतनी अधिक जग नहीं पाती जितनी कि जरूरत होती है। ये लोग केवल नाम कमाने या धन वैभव पाने अथवा अपनी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता को पाने या बरकरार रखने के लिए केवल उन्हीं मुद्दों को उठाते और हल करने के प्रयास करते हैं जिनमें रंग लगे न फिटकरी, रंग चोखा का चोखा।

ये लोग समाज के लिए घातक गंभीर विषयों को उठाने से भय खाते हैं क्योंकि इन्हें इस बात का खतरा होता है कि इतना बड़ा जोखिम उठाने से सामाजिक गुण्डे और बदमाश तथा समाज को अपना दास या बपौती समझने वाले लोग नाराज हो जाएंगे और उनके कामों में विघ्न पड़ने की संभावना है। इसलिए ये लोग इन ज्वलन्त विषयों की ओर सोचते तक नहीं।

ये लोग उन्हीं विषयों की ओर ध्यान देते हैं जिनमें कोई नाराज न हो, सभी को खुश रखा जा सके चाहे कोई कितना ही अधिक गुण्डा-बदमाश, चोर-डकैत, अन्यायी, शोषक, हरामखोर और अत्याचारी क्यों न हो।

बुद्धिजीवियों की सबसे बड़ी खासियत यही हो गई है कि वे अपनी छवि को लोकप्रिय, सर्व स्वीकार्य बनाने और खुद को महान, धीर-गंभीर और भारी पेटे वाला बताने की गरज से हमेशा तटस्थ रहते हैं और जो सामने मिल जाए, उसकी तारीफ के पुल बांधते नज़र आते हैं।

इन प्रबुद्धजनों को पता है कि आजकल लोग केवल अपनी झूठी तारीफ सुनना ही पसन्द करते हैं और इसी से खुश हो जाते हैं इसलिए और कुछ भी जतन करने की कोई जरूरत नहीं। अच्छा-अच्छा बोलते जाओ, अच्छा ही अच्छा लिखो और अच्छा बताते रहो, बस फिर क्या है, कोई भी हो, खुश हो ही जाता है। मिथ्या सराहना करने का काम आजकल अधिकांश लोगों के लिए वह अचूक अस्त्र हो चला है जो कभी व्यर्थ नहीं जाता, हर बार तीर निशाने पे ही लगता है।

लोग चाहे अपने आपको कितना ही संवेदनशील, समाजसेवी, सेवाभावी, परोपकारी और धर्मात्मा कहें या सिद्ध करते रहें, उनका लक्ष्य या तो लोकेषणा पाने तक केन्दि्रत होकर रह जाता है अथवा वित्तेषणा भरे जंगल में भटकने के आदी हो जाते हैं।  इन ऎषणाओं में खो जाने की वजह से इन लोगों की संवेदनाएं मर जाती हैं और केवल स्वार्थ सिद्धि को ही जिन्दगी मानकर चलते रहते हैं।

वर्तमान में समुदाय की सबसे बड़ी समस्या एकला चालो रे की हो गई है। पहले परिवार और समाज में संगठन, माधुर्य और सामूहिक विकास की जो परंपरा विद्यमान थी उसमें एक-दूसरे या सभी के सुख-दुःखों को अपना मानकर सहभागी बने रहने की मानवीय सद्भावना और संवेदनशीलता मुँह बोलती थी। मगर आज हर कोई अपने आपको द्वीप की तरह स्थापित करने लगा है।

आज की सबसे बड़ी समस्या विधवाओं और परित्यक्ताओं के समुचित पुनर्वास की है। सामाजिक नियंत्रण के अभाव में स्त्री को वस्तु और भोग्या समझने वाले लोग निरंकुश होते जा रहे हैं। वैधव्य की ढेरों समस्याओं और अभावों में जी रही स्ति्रयों की दशा को सब चुपचाप देख-सुन रहे हैं, मगर सम्बल या सहयोग दे पाने को कोई राजी नहीं है। लांछन लगाने वाले हजार मिल जाएंगे जिनकी जिन्दगी ही इसी में गुजरती जा रही है कि किसी पर किस तरह लांछन लगा कर बदनाम किया जाए।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से सोचा जाए तो हालात भयावह होते जा रहे हैं। प्रभावशाली और पूंजीपतियों के हाथों सामाजिक व्यवस्थाएं गिरवी होती जा रही हैं अथवा समाज अपना नियंत्रण खोता जा रहा है या कि सामाजिक व्यवस्थाएं उन लोगों के हाथों में कैद होती जा रही हैं जो केवल नाम मात्र के समाजसेवी और समाजसुधारक हैं।

इन लोगों से समाज की सेवा और सुधार के नाम पर भाषण दिलवा दो, मंच और लंच मुहैया करा दो, पद-प्रतिष्ठा और कुर्सी नवाज दो, लेकिन सामाजिक विकास या सुधार के नाम पर स्थायी और ठोस महत्व के कामों में उनका कोई योगदान सामने नहीं आता, सिवाय पब्लिसिटी के।

उन बेटियों के रिश्तों के बारे में कोई नहीं सोच रहा जिनकी आयु विवाह की हो गई है और जो अच्छा जीवनसाथी चाहती हैं। जहाँ बात चलती है वहाँ लड़की के गुणों की बजाय उसके घर वालों की आर्थिक समृद्धि का अन्दाज पहले लगाया जाता है और लगता है कि जैसे लड़के वाले लड़की नहीं अपने जीवन निर्वाह और अपनी हैसियत ठीक करने के लिए भीख मांग रहे हैं। इनके लिए सुयोग्य कन्याएं भी वस्तु हैं जो उनके घर की समृद्धि का द्वार खोलने के लिए हैं।

उन माँ-बाप की मनःस्थितियों को भाँपने को कोई तैयार नहीं है जिनकी बेटियां विवाह योग्य हो गई हैं और जिन्हें वर ढूँढ़ने के लिए जितने अधिक जतन करने पड़ रहे हैं उसे बयाँ नहीं किया जा सकता। इतना बड़ा समाज, इतने महान और चर्चित समाजसेवियों और भाँजगड़ियों की फौज और कुटुम्बियों के होते हुए वैवाहिक विज्ञापन का सहारा लेना पड़े, उस समाज को लानत है।

हम सारे लोग तमाशबीन होकर समाज की समस्याओं की अनदेखी करते हुए अपने आपकी प्रतिष्ठा बरकरार रखने, समाजसेवी के रूप में सतही धींगामस्ती वाले आयोजन करने और समाज की समस्याओं के निराकरण के प्रभावी कामों के प्रति उपेक्षा रवैया अपनाने, सम्मान, पुरस्कार और अभिनंदनों की भूख-प्यास को मिटाने के लिए जाने कौन-कौन से मंचों, रेवड़ों और हथकण्डों का इस्तेमाल करने में रमे हुए हैं।

समाज की बुनियाद को मजबूती देने के लिए सामाजिक मूल समस्याओं की ओर आँखें मूँदे बैठकर तमाशबीन या तसल्लीदेवता के रूप में स्थापित हो जाने से समाज का भला नहीं होने वाला। आने वाली पीढ़ी हम सभी सम्मानितों, महानों, समाजसुधारकों, समाजसेवियों को कोसती नज़र आएगी और हम सारे लोग नरक में यंत्रणा भोगते हुए यह सब सुनने को विवश होंगे।

अपनी भूमिकाओं को बदलें और समाजोन्मुखी रचनात्मक गतिविधियों के साथ ही सामाजिक ताने-बाने की बुनियाद को मजबूत बनाने में जुटें वरना न आज हमारा है, न कल होगा।