साधना देती है भोग-विलास

साधना देती है भोग-विलास

किसी भी इच्छा की पूर्ति के लिए साधना-भक्ति की जाए, उसका फल अवश्यमेव प्राप्त होता ही है।  साधना की तीव्रता, संकल्प की दृढ़ता और साधना से प्राप्त होने व संचित होने वाली ऊर्जा के घनीभूत होने के स्तर पर साधना का फल निर्भर करता है।

यह सारा घनत्व जितना अधिक प्रगाढ़ होगा उतना साधना से प्राप्त होने वाला फल और परिमाण अधिक होगा।  आम तौर पर लोग दो प्रकार की साधनाएं करते हैं। अधिकांश लोग समझदार होने के बाद से लेकर अपनी रोजमर्रा की छोटी-छोटी कामनाओं की पूर्ति के लिए साधना या भक्ति का सहारा लिया करते हैं।

ये इच्छाएं चाहे अपने सामथ्र्य या अधिकार क्षेत्र से बाहर कीभी होती हैं और जीवन या परिवार के सदस्यों से संबंधित भी हो सकती हैं। निन्यानवें फीसदी लोग सकाम साधना का सहारा लेते हैं और बात-बात में भगवान या और किसी प्रकार की शक्तियों का आवाहन, ध्यान और भजन-पूजन, जप, सेवा इत्यादि करते रहते हैं।

इन लोगों को ताजिन्दगी यही भ्रम बना रहता है कि भगवान उनकी इच्छाओं की पूर्ति करने या कराने वाला अथवा सहयोगी की भूमिका में होता है और जीवन का कोई सा जायज-नाजायज कर्म या ऎषणा हो, वह पूरी करता है।

इसलिए लोग रोज कूआ खोदो और रोज पानी पियो की तर्ज पर हर दिन पैदा होने वाली कामना के निमित्त कुछ न कुछ साधनाओं या भक्ति पूजा का सहारा लेते रहते हैं। न्यूनाधिक दैवीय ऊर्जा को रोजाना ये लोग खर्च कर दिया करते हैं और इसलिए इनके पास पुण्य या ऊर्जा का ऎसा कोई आरक्षित स्टॉक उपलब्ध नहीं होता है जिसके बूते इनकी गति-मुक्ति और मोक्ष हो जाए अथवा अगला जन्म वर्तमान के मुकाबले उच्च और अच्छा मिले। इन लोगों को इसी जन्म से मतलब है।

न तो आत्मा की अमरता से कोई सरोकार है, न पुण्य-पाप या पुनर्जन्म से।  इसलिए ये लोग अपने वर्तमान जन्म और देह को ही सर्वोपरि मानते हैं और देह के लिए ही सब कुछ करते रहते हैं।

शरीर से परे न ये लोग सोच सकते हैं, न इन्हें कोई समझा सकता है। इसलिए इन लोगों की साधना का कोई खास महत्व नहीं होता। फिर भी ये जो कुछ करते हैं उसका फल भगवान इन्हें देता ही देता है क्योंकि भक्त की भक्ति का सम्मान करना और भक्ति की एवज में कुछ न कुछ देना भगवान का नियम है इसलिए जो-जो लोग किसी न किसी प्रकार की भक्ति करते हैं उन्हें भगवान की ओर से निश्चित रूप से प्राप्त होता ही है।

और यही आस्था और विश्वास ही वह कारण है कि लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए भगवान को भजते हैं, चाहे उनका कोई सा स्वार्थ ही क्यों न हों। देवस्थानों में भारी भीड़ का यही कारण है क्योंकि इनमें कुछेक को छोड़कर सारे किसी न किसी कामना की मांग लेेकर ही आते हैं।

 

साधकों को एक दूसरा वर्ग ऎसा भी है जो आत्म साक्षात्कार या भगवान को पाने के लिए यजन करता है अथवा निष्काम भाव से भगवान की सेवा-पूजा, जप-आराधन आदि करता है।  इनकी कोई कामना नहीं होती।  किन्तु नियति हमेशा उसे देती है जो उसके लिए कुछ भी करता है।

इसलिए साधना चाहे सकाम भाव से की जाए अथवा निष्काम भाव से, इसमें भगवान की ओर से प्राप्ति का क्रम निश्चित रूप से बना ही होता है। साधना से तात्पर्य केवल जप-जपादि, अनुष्ठान, सेवा-पूजा ही नहीं है बल्कि जरूरतमन्दों की सेवा-परोपकार और समाज तथा दुनिया के लिए सेवाभावना से किया जाने वाला हर कार्य भगवान की भक्ति का ही स्वरूप होता है।

इस प्रकार साधना का कोई सा प्रकार अपनाया जाए, उसका प्रतिफल प्राप्त होगा ही। आमतौर पर यह अनुभव में आता है कि थोड़ी सी साधना कर लिए जाने के बाद अनायास ऎसे संयोग बन जाते हैं कि संसार की माया विभिन्न रूपों में आकर साधक को घेर लेती है।

साधना में दृढ़ता और संकल्प बल जितना अधिक दृढ़ीभूत होता जाता है उतना विघ्न भी आते हैं और भोग-विलास के अवसर भी।  जिन साधनाओं के दौरान विघ्न आते हैं उन साधनाओं को सफलता की ओर बढ़ने के रूप में स्वीकारा जाना चाहिए क्योंकि भगवान साधना की सफलता की स्थिति प्रसन्न होने पर उन सारे नकारात्मक पक्षों को न्यूनतम स्तर पर लाकर जीवात्मा के खाते से हमेशा के लिए बाहर कर देता है जिनकी वजह से भावी सुखों के आनंद में कमी की आशंका हो।

इस तरह भगवान साधक को शुचिता देता है और जो बुरे अनुभव बाद में आने होते हैं उन्हें क्रम में एक साथ आगे लाकर भुगतवा देता है।  कई बार साधकों का यह अनुभव भी रहता है कि साधना और सेवा के मार्ग पर कदम बढ़ाते ही संसार की कोई न कोई माया हमें प्रभावित करने लगती है।  जब तक इंसान अपने-अपने भाग्य के अनुरूप प्रवाहमय होकर चलता रहता है तब तक सब कुछ सामान्य बना रहता है।

कुछ अतिरिक्त या उच्च अवस्था प्राप्त होने पर प्रकृति अंकुश लगाने और साधना के विखण्डन की कोशिश करती है। इसे ही परीक्षा कहा जाता है। इसमें साधक के ज्ञान, विवेक और संयम को तौला जाता है। जो लोग माया से घिर जाते हैं वे वहीं अटक कर रह जाते हैं, फिर आगे नहीं बढ़ पाते हैं।

मृत्यु होने तक स्थिरता को प्राप्त हो जाते हैं। जबकि दृढ़ संकल्पी लोग माया से मुक्त होकर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन ऎसे लोग बिरले ही होते हैं। साधना से भोग और विलास प्राप्त होगा ही, चाहे हमारी साधना निष्काम हो या सकाम। कई बार साधना की वजह से हमारे जीवन में डाँवाडोल और माया के चक्करों में पड़ जाने की स्थिति आती है।

साधना करते हुए दो तरह की स्थितियां आती हैं। यदि साधक माया की ओर आकर्षित होने लगे तो यह समझ लेना चाहिए कि नियति उसकी संचित ऊर्जाओं के क्षरण का बन्दोबस्त कर रही है। इसके ठीक विपरीत यदि साधक की ओर से अनचाहे और अनायास माया आकर्षित होकर आने लगे तो यह मान लेना चाहिए कि यह दैवीय भोग-विलास का प्रकार है।

और इससे भी यदि साधक दूर रहे तो वह आध्यात्मिक ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकता है। सकाम साधना में अधिक मेहनत करने के बावजूद कम फल प्राप्त होता है और एक ही प्रकार का इच्छित काम होता है जबकि निष्काम साधना करने पर कम मेहनत में भी अधिक से अधिक फल की प्राप्ति होती है और जीवन की सभी कामनाओं की पूर्ति सहज स्वाभाविक रूप से होने लगती है।

2 comments

  1. Dr madhu upadhyay

    मनुष्य यदि बालक है वो पिता तो माँगना उसका अधिकार हो सकता है ।क्यूँकि जो वह दुनियाँ से प्राप्त नहीं कर पाता वह ईश्वर से अपेक्षा करता है ।कभी कभी जब वह निःस्वार्थ दूसरे के भले और कष्ट निवारण के लिए उससे हठ कर बैठता है तो उसे भगवान से ज़्यादा उम्मीद बनती है ।पर उसकी सीमा के बाहर प्रतीक्षा उसे हर दिन कमजोर बना सकती है ।ऐसे में वो भक्त क्या करे ।

  2. Dr madhu upadhyay

    मनुष्य यदि बालक है वो पिता तो माँगना उसका अधिकार हो सकता है ।क्यूँकि जो वह दुनियाँ से प्राप्त नहीं कर पाता वह ईश्वर से अपेक्षा करता है ।कभी कभी जब वह निःस्वार्थ दूसरे के भले और कष्ट निवारण के लिए उससे हठ कर बैठता है तो उसे भगवान से ज़्यादा उम्मीद बनती है ।पर उसकी सीमा के बाहर प्रतीक्षा उसे हर दिन कमजोर बना सकती है ।ऐसे में वो भक्त क्या करे ।