आशातीत सफलता चाहें तो ग्रहण काल में साधना का आश्रय पाएं

आशातीत सफलता चाहें तो ग्रहण काल में साधना का आश्रय पाएं

अधिकांश लोग ग्रहण की महिमा से अनभिज्ञ हैं और उन्हें यह तक पता नहीं है कि ग्रहण काल में क्या करना चाहिए और क्या नहीं। इन लोगों को ग्रहण के महत्व से कोई सरोकार नहीं है।

वर्तमान मेंं हर तरफ कलियुगी माहौल है, मैले मन वालों और मैली विद्याओं का बोलबाला है और अधर्म, असत्य एवं कुटिलताओं भरी गलाकाट प्रतिस्पर्धा के चलते सब तरफ माहौल इतना अधिक खराब है कि हर आदमी अक्सर यह सोचता रहता है कि आखिर इसी युग में इतना अधिक संघर्ष, पाप, बेईमानी, चोरी-डकैती, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, हरामखोरी और एक-दूसरे को नीचे गिराने के लिए झूठ और निन्दा आदि क्यों है  और इस तरह की विषम परिस्थितियों में कैसे अपने जीवन को निरापद और आनंददायी बनाएं।

यह हम सभी के लिए चिन्ता और चिन्तन के वे विषय हैं जो साल भर हमें उग्र, व्यथित और दुःखी करते रहते हैं। प्राचीन भारतीय संस्कारों, परंपराओं और आस्थाओं से भटक जाने के कारण हम जीवन निर्माण और निर्वाह के सरल और आसान तरीकों से अपने आपको भुला चुके हैं और इसी का नतीजा है कि हमारा जीवन बिना किसी वजह के दुःख, शोक, बीमारियों, अवसादों और असफलताओं से भरा रहने लगा है।

साल भर में खूब सारे ऎसे कल्याणकारी समय आते हैं जिनका उपयोग करना हम सीख जाएं तो जीवन में आनंद ही आनंद छा जाए। लेकिन हम आलसी, दरिद्री व प्रमादी लोग पाश्चात्यों की उन्मुक्त एवं मर्यादाहीन भोग-विलासी कुसंस्कृति के चक्कर में ऎसे फंसे हुए हैं कि हमें अपने शुभ और अनुकूल अचूक समय का पता ही नहीं चलता और इसी में हमारी जिन्दगियां बिना किसी उपलब्धियों के फालतू सिद्ध हो रही हैं।

ग्रहण काल के बारे में मान्यता है कि जितने समय चन्द्र या सूर्यग्रहण रहता है उतने समय में हम जो कुछ करते हैं उसका अनंतगुना फल प्राप्त होता है लेकिन हम अनभिज्ञता या विदेशी संस्कृति के दासत्व भावों से घिरे होने के कारण इनका जरा भी लाभ नहीं ले पाते हैं।

हराम के खान-पान, माँसाहार, व्यभिचार, शराब, तम्बाकू, गुटकों और विजातीय द्रव्यों के सेवन, अमर्यादित जीवनपद्धति आदि में ऎसे रमे हुए हैं कि हमारे लिए अपनी संस्कृति, संस्कार और परंपराएं बौनी या बेकार लगने लगी हैं। और यही सब हमारे दुःखों, अभावों और दीनता का मूल कारण है।

ग्रहण काल में की गई साधना हमारे जीवन के कई सारे दुःखों

और अभावों का खात्मा कर सकती है बशर्ते हम शुचिता और आस्था के साथ ग्रहण काल का भरपूर उपयोग करना सीख लें।

ग्रहण काल में खान-पान, लघुशंका या दीर्घशंका अथवा दूसरा कोई कर्म नहीं करें, सिवाय भगवद भक्ति, साधना, जप, स्तुति पाठ आदि के।

ग्रहण काल में अपनी उस पूजा-पाठ की एक बार आवृत्ति जरूर कर लें जो हम रोजाना करते रहते हैं। ग्रहण में यदि आवृत्ति नहीं होती है तो उस मंत्र, स्तुति, पूजा-पाठ का कोई प्रभाव नहीं होता, चाहे हम साल भर में कितनी ही और कितने ही घण्टों तक पूजा-पाठ व जप क्यों न करते रहें।

इस बार चन्द्र ग्रहण 7 अगस्त सोमवार रात्रि 10.41 से 12.39 मिनट तक रहेगा। यानि की कुल ग्रहण अवधि  1 घण्टा 58 मिनट रहेगी। सांसारिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए ग्रहण काल में जप, पाठ आदि का विधान है। जो जप किए जाते हैं उनके पुरश्चरण का फल इस समय प्राप्त होता है और इसका फायदा यह होता है कि मंत्र सिद्ध हो जाता है और सिद्ध मंत्र ही कार्यसिद्धि में मददगार हो सकता है।

ग्रहण काल से पूर्व साधना का क्रम तय कर लें। सबसे पहले वे सारे मंत्र, स्तुति और पाठ दोहरा लें जो हम रोजाना करते हैं। इससे इनमें ऊर्जा का संचरण हो जाता है।

अपने ईष्ट मंत्र की अधिक से अधिक माला जप करें। इससे ईष्ट मंत्र पावरफुल हो जाता है।

प्रणव अर्थात ॐ की एक-दो माला जप लें। इससे यह सिद्ध हो जाएगा। और फिर जिस किसी मंत्र के साथ यह लगेगा वह ताकतवर इंजीन के रूप में काम करेगा।

अपने जीवन की प्राथमिकताओं के अनुरूप ग्रहण काल साधना क

 

रें और इनसे संबंधित मंत्रों को सिद्ध करें, ताकि वर्ष भर इनके जप करते हुए सिद्धि के वेग को बहुगुणित किया जा सके।

और कुछ न कर सकें तो सारे प्रपंच छोड़कर किसी एक मंत्र को पूरे ग्रहण भर में जप करते रहें। एक बार कोई सा मंत्र सिद्ध हो जाने के बाद दूसरे सारे मंत्रों की सिद्धि आसान हो जाती है।

चन्द्र ग्रहण में देवी मंत्र और सूर्य ग्रहण में देव मंत्रों की सिद्धि का फल अधिक प्राप्त होता है तथापि अपनी रोजाना की जाने वाली साधना की ग्रहण में एक बार आवृत्ति कर लेना जरूरी है।

शरीर शुद्धि के लिए ग्रहण काल में अपने ईष्ट मंत्र से 11 बार प्राणायाम कर लें। इससे आन्तरिक शुद्धि हो जाती है।

ग्रहण की साधना आरंभ करने से पूर्व दत्तात्रेय भगवान का स्मरण करते हुए ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः के 21 बार जप कर लें। इसके उपरान्त गणपति और भैरव के कुछ मंत्र जप ले। ध्यान रहे ग्रहण में भूत-प्रेतों और पितरों का स्मरण नहीं करें।

आत्म कल्याण चाहने वाले, आध्यात्मिक उन्नति पाने के इच्छुक साधकों को चाहिए कि वे ग्रहणकाल में निष्काम भाव से साधना करें और अपने ईष्ट का ही स्मरण करें।

ग्रहण के स्पर्शकाल में पवित्र स्नान, मध्य में जपादि अनुष्ठान तथा मोक्ष के समय दान करना चाहिए।

ग्रहण जैसे समय के एक-एक क्षण का उपयोग करने वाले साधक जीवन में कभी दुःखी नहीं होते। ईश्वर उनकी सदैव सहायता करता है।