धर्म बिना सब बेकार

धर्म बिना सब बेकार

बहुत सारे लोग सभी स्थानों पर ऎसे हैं जो अपने कुकर्मों, पाप, दुष्टताओं और राक्षसी वृत्तियों के कारण कुख्यात होते हैं लेकिन किसी न किसी अभेद्य सुरक्षा कवच या संरक्षण की वजह से सार्वजनिक तौर पर कोई इन्हें कुछ कहने-सुनाने की हिम्मत नहीं करता।

आवारा साण्डों और बदचलन लोमड़ियों की तरह इंसानों की यह किस्म हर छलांग लगाकर हर बाड़े में घुस जाने और चर जाने के लिए स्वच्छन्द हुआ करती है।

लोग शुरू-शुरू में इन्हें समझाते जरूर हैं, घर वाले भी पुचकारते हुए इन्हें सीधे रास्ते पर लाने की हरचन्द कोशिश करते हैं लेकिन ये किस्म ही ऎसी है कि न तो किसी की कुछ सुनती है और न ही किसी की परवाह करती है।

ऎसा तब होता है जब या तो इनके प्रॉडक्शन में भी कोई न कोई मिलावट हो यानि की वर्णसंकर प्रजाति का कोई भरोसा नहीं। ये किसी के नहीं हो सकते, अपने भी नहीं। या फिर इनका शरीर दुनिया भर के गंदे लोगों के वहाँ का अथवा हराम के पैसों के खान-पान से बना हो।

जिन लोगों का भरण-पोषण भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, अत्याचार, अन्याय और शोषण के पैसों से होता है उन सभी लोगों का धर्म भ्रष्ट हो जाता है। धर्म भ्रष्ट हो जाने के बाद हमारा शरीर धर्महीन होने के कारण इसमें से वो शक्ति बाहर निकल जाती है जो शरीर को हल्का-फुल्का रखकर चलाती है तथा जीवन निर्वाह और व्यवहार के हर कर्म में सहयोगी बनकर इंसान के सभी प्रकार के लक्ष्यों को आसान बनाती है।

जो इंसान एक बार बुरी आदतों, व्यभिचार, हराम का खान-पान, व्यसन, भ्रष्ट और विधर्मी आचरण को अपना लेता है उसे धर्म छोड़ देता है। जिसे धर्म त्याग देता है उसकी रक्षा न तो देव कर सकते हैं और न ही पितर। ऎसा व्यक्ति दिव्यताहीन होकर भटकने को विवश हो जाता है।

यही कारण है कि संसार भर में बहुत से पामर लोगों की भारी भीड़ है जिसके पास भोग-विलास और आनंद पाने के लिए सब कुछ होता है किन्तु लाख कोशिश करने के बाद भी उन्हें संतोष, शांति और आनंद की प्राप्ति नहीं हो पाती और जीवन के अंतिम क्षण तक भटकाव की स्थिति बनी रहती है।

यह स्थिति तब आती है कि जब धर्म हमारा साथ छोड़कर चला जाता है। धर्म तभी तक हमारे साथ रहता है जब तक हम धर्म की रक्षा करते हैं।

यह धर्म किसी उपासना पद्धति का पर्याय या पूरक नहीं है अपितु इंसानी धर्म का प्रतीक है जिसमें मानवता के तमाम संस्कार और सदाचार कूट-कूट कर भरे हों। धर्म जिसके साथ होता है उसी की जय होती है, अन्यथा वह इंसान जीवन में न तो अच्छा मनुष्य साबित हो सकता है और न ही किसी भी प्रकार का संबंधी।

यही नहीं तो इनके शगुन लेना या प्रभातकाल में इनका मुखदर्शन भी खराब होता है। धर्म द्वारा त्याग कर दिए गए लोगों से किसी भी प्रकार का व्यवहार रखने वाला भी दुःखी होता है और उसे अनिष्टों का सामना करना पड़ता है।

एक बार धर्म जब किसी को छोड़कर पलायन कर जाता है तब धर्महीन इंसान के सारे खराब ग्रह-नक्षत्र पूरे यौवन में आकर क्रूरता का बर्ताव करने लग जाते हैं क्योंकि उस अवस्था में इंसान का संरक्षण करने वाला धर्म साथ नहीं होता।

फिर आजकल कलियुग का प्रभाव है और ऎसे में  यदि धर्म हमारा परित्याग कर दे तब फिर हमारी स्थिति सर्वस्व लुट गए इंसान की तरह हो जाती है। हम केवल कर्म ही कर्म करते चले जाते हैं, इसका कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ पाता।

धर्महीनता की स्थिति में हम यदि कोई सा पुण्य कार्य भी  करते हैं तो इसका फल प्राप्त नहीं हो सकता क्योंकि हम अपनी जिस कमाई से दान-पुण्य करते हैं वह हमारी मेहनत का फल नहीं होता, उसमें भ्रष्टाचार की दुर्गन्ध आती है।

आजकल कई सारे लोगों के बारे में यह धारणा ही बन चली है कि ये लोग धर्म, सत्य, नीति, न्याय और मानवता आदि सब को छोड़-छाड़ कर पैसे बनाने और जमा करने, भ्रष्टाचार की काली कमाई से घर भरने और सच्चे इंसानों को तंग करते हुए तनाव देने, परेशान कर शोषण करने तथा अमानवीय बर्ताव को अपनाते हुए इतने अधिक अहंकारी हो गए हैं कि इन लोगों ने राक्षसों को भी पीछे छोड़ दिया है।

कोई इलाका शायद अब ऎसा नहीं बचा होगा जहाँ ऎसे पिशाच और राक्षसियां न हों। पहले नरपिशाचों के ही कारण लोग परेशान थे, राक्षसियां कम ही देखी जाती थीं।

अब राक्षसियाँ भी खूब हैं जो कहीं अपने बूते और कई स्थानों पर राक्षसों के साथ मिलकर जो कहर बरपा रही हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि इन पिशाचिनियों में अब ममत्व, वात्सल्य, मातृत्व और स्नेहिल भावों के बीज ही नष्ट हो गए हैं। इस मामले में ये निरी बाँझ ही नहीं कुलटा और भ्रष्टाएं होती जा रही हैं।

समझदार लोगों का मानें तो आजकल उन्हीं का बोलबाला है जो लेने-देने, करने-करवाने, लूटने-लुटवाने वाले हैं या फिर दुनिया को परेशान करने के लिए ही पैदा हुए हैं।

यह भी घोर आश्चर्य है कि जो जितना अधिक महापापी, शोषक और भ्रष्ट है वह अपने आपको उतना ही अधिक धर्मात्मा, महान और पवित्र होने का दम भरता हुआ खुद को ऎसे पेश करता है जैसे कि आसमान से फरिश्ता ही आ टपका हो। आसुरी अधर्म और कलियुगी अंधेरे में वो सब कुछ जायज माना जा रहा है जो नाजायज है।  ईश्वर इन असुरों से हमारी रक्षा करे।

2 comments

  1. Shakuntala Sharma

    Jai ho