लोक जीवन में केसर महकाता है ऋषभदेव मेला

केसरियाजी धाम पर शुक्रवार से दो दिवसीय विशाल मेले की धूम

 

देश और दुनिया में मशहूर है उदयपुर जिले का ऋषभदेव तीर्थ

उदयपुर-अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर उदयपुर जिला मुख्यालय से दक्षिण दिशा में 65 किलोमीटर दूर अरावली की छितराई हुई वादियों के बीच तीर्थ नगरी केसरियाजी में अवस्थित भगवान ऋषभदेव के इस प्राचीन लोक तीर्थ के प्रति लोगों में अगाध आस्था विद्यमान है। हर साल चैत्र कृष्ण अष्टमी (अमान्त पद्धति अनुसार फाल्गुन कृRishabhdeo (1)ष्ण अष्टमी) को भगवान ऋषभदेवजी के जन्मोत्सव पर यRishabhdeo (3)हाँ दो दिन का विशाल मेला भरता है।  इसमें सभी सम्प्रदायों के श्रद्धालु आते हैं और भगवान ऋषभदेव से मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। आदिवासियों के लिए भी ऋषभदेव भगवान असीम श्रद्धा के केन्द्र हैं और वे इन्हें काला बाबा या काला बावजी के नाम से पूजते रहे हैं। वागड़ और मेवाड़ के अलावा मध्यप्रदेश एवं गुजरात के समीपवर्ती हिस्सों से बड़ी संख्या में मेलार्थी प्राचीनतम केसरियाजी धाम में आते हैं और मेले में उत्साह से हिस्सा लेते हैं।

जनजाति लोक संस्कृति का प्रतिदर्श

01 April 2016 Rishabhdeo fair (1)जनजाति लोक संस्कृति और परंपराओं का मनोहारी दिग्दर्शन इस मेले की खासियतों में एक है। मेले में कस्बों-गांवों-ढाणियों, पालों-फलों और दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों से हजारों की संख्या में परंपरागत वेशभूषा में आदिवासी मेले में आते हैं। परंपरागत लोक नृत्यों और गीतों में झूमते हुए आदिवासी भक्तों के समूह मेले के आकर्षण और लोक रंगों को बहुगुणित करते हैं। मंदिर में भगवान ऋषभदेव जी की साढ़े तीन फीट ऊंची श्याम वर्ण की अद्भुत ओजपूर्ण  प्रतिमा प्रतिष्ठित है।

रोजाना केसर पूजा

इस प्रतिमा पर रोजाना केसर चढ़ाई जाती है और इनकी पूजा में केसर का विशेष महत्व है। इसी वजह से इन्हें केसरियाजी भगवान के नाम से भी पूजा जाता है। ऎतिहासिक प्रमाणों के अनुसार भौगोलिक दृष्टि से कोयल नदी पर स्थित ऋषभदेव (केसरियाजी) को पहले धुलिया गमेती ने 1316 में बसाया था, जो आगे चलकर ’धुलेव’ बनी। ऋषभदेव (केसरियाजी) ’धुलेव’ नाम से भी प्रसिद्ध  रहा है। भगवान ऋषभदेवजी के जन्मोत्सव अष्टमी पर प्रातः गजर बजते ही तीर्थनगरी के निकट स्थित कोयल नदी, सूरजकुण्ड, पगल्याजी पर स्थित बावड़ियों से श्रद्धालु स्नान कर नये वस्त्र धारण करते हैं। पवित्र वस्त्र पहन के01 April 2016 Rishabhdeo fair (2)सर चढ़ाकर पूजा-अर्चना प्रारम्भ करते हैं। भगवान के जन्मोत्सव पर्व चैत्र कृष्णा अष्टमी पर प्रातः साढ़े छह बजे गजर बजने पर मंदिर के फोर्स जवानों द्वारा इक्कीस तोपों की सलामी के साथ मंदिर के द्वार दर्शनार्थ खोल दिये जाते हैं।  भगवान की सेवा पूजा, प्रक्षाल के कार्यक्रम  के बाद  आरती,  केसर पूजा, ध्वजा  धारण और सेवा-पूजा के कार्यक्रम होते हैं।

मनोहारी शोभायात्रा बिखेरती है आकर्षण

सायंकाल भगवान ऋषभदेव की शोभायात्रा निकलती है जिसका शुभारंभ  इक्कीस तोपों की सलामी से होता है।  इसके अलावा पुतलियों की गाड़ी, धुलेव भण्डार का बैण्ड, रजत पालकी, छोटे छत्री, छामर, मंदिर  फोर्स जवानों का ध्वज आदि का प्रदर्शन होता है।  कोटड़ा एवं आस-पास के ग्राम्यांचलों से आए भक्त भजन एवं नृत्य प्रस्तुतियों से माहौल को धर्म-संस्कृति से परिपूर्ण किए रखते हैं। यह शोभा यात्रा नगर के मुख्य मार्गो से होकर सांझ में पगल्याजी पहुंचती है जहाँ विशेष पूजा-अर्चना, संध्या आरती, रात्रि स्तवन, गुलाल धारण एवं रात्रिकालीन मंगल आरती के साथ मंदिर मंगल होता है। मध्य रात्रि में  भगवान के जन्म कल्याण की आरती, झालर, वादनम् एवं मंगल दीपक के कार्यक्रम होते हैं।

मेलार्थियों के लिए व्यापक इंतजाम

सरकार द्वारा मेलार्थियों की सुविधा के लिए विशेष बंदोबस्त किये  जाते हैं। दर्शनार्थियों के लिए पेयजल, चिकित्सा सुविधा, फायर01 April 2016 Rishabhdeo fair (3) ब्रिगेड सहित मनोरंजन के लिए झूलों, चकरी, वेरायटी शो, सर्कस, जादू एवं खरीदारों के लिये विभिन्न सामानों की अनेक दुकानें सजती हैं। विभिन्न राज्यों से आने वाले दर्शनार्थियों एवं मेलार्थियों के रात्रि विश्राम और ठहरने के लिए पर्याप्त सुविधा भी सुलभ होती है। दो दिवसीय मेला नवमी को विशेष  पूजा-अर्चना के साथ सम्पन्न होता है। ऋषभदेव भगवान के प्रति दिली आस्था अभिव्यक्ति का यह वार्षिक मेला जहाँ लोक लहरियों और आस्थाओं का समन्दर लहराता है वहीं मेलार्थी यहाँ आकर नई ताजगी और ऊर्जा पाकर लौटते हैं और अपने जीवन में केसर सी महक का अहसास करते हैं।