कद्र करें चाहने वालों की

वर्तमान समय में स्वार्थी चापलुसों, चरणस्पर्शियों, निकम्मों, दुराचारियों, दुव्र्यसनियों, भ्रष्टाचारियों, रिश्वतखोरों, चोर-डकैतों-बेईमानों, हिंसकों, लूटरों, छीना-झपटी करने वालों, धींगामस्ती में माहिरों और हर तरह से गुण्डे-बदमाश माने जाने वाले लोगों के लिए जिन्दगी जितनी अधिक आसान, निरापद और मस्त होती जा रही है उतनी ही अधिक कठिन और दुःखदायी जिन्दगी उन लोगों की होती जा रही है जो लोग निष्ठावान, कर्तव्यपरायण,  ईमानदार, राष्ट्रभक्त और पुरुषार्थी हैं।

कारण स्पष्ट है कि जहाँ धर्म, सत्य और नैतिकता का वजूद ही खतरे में पड़ जाए, लुच्चे-लफंगों और व्यभिचारियों के समूह निरंकुश, उन्मुक्त और उन्मादी हो जाएं, तब यह स्वाभाविक ही है कि दुष्टों का संख्या बल असत्य और अधर्म के प्रसार में जुटा रहता है।

फिर जहाँ आसुरी लोगों की संख्या बढ़ जाया करती है वहाँ ईमानदार, परिश्रमी और निष्ठावान लोगों की जिन्दगी में पग-पग पर खतरे मण्डराते रहते हैं, बाधाएँ आती रहती हैं और तनाव, दुःख, अभाव एवं समस्याओं से सामना करना ही पड़ता है।

वर्तमान समय का यही सच है कि जो लोग हर मामले में बुरे और दुष्ट हैं,  पूरा जमाना उनके साथ है, और यदि हम सच्चे, पवित्र एवं ईमानदार हैं तो लोग हमारा विरोध करते हुए पीछे पड़े ही रहेंगे, निन्दा भी करेंगे, छवि खराब करने की हरचन्द कोशिश भी करते रहेंगे और बाधाएँ भी खड़ी करते रहेंगे।

और खूब सारे अपने लोग भी इस अनचाही, नाकारा, नपुंसक और तमाशबीन भीड़ के साथ हो जाएंगे क्योंकि उनमें हमसे बराबरी करने की क्षमता वाला कोई नहीं होता है इसलिए निन्दा और विरोध करते हुए हमें सच्ची राह और कर्मयोग से भटकाने की कोशिश करेंगे अथवा हमें भी अपनी ही तरह बना डालने की भरसक कोशिशों में रमे रहेंगे।

दुनिया में विद्यमान सभी प्रकार के आंशिक, आधे या पूर्ण अथवा अवसरवादी बुरों और दुष्टों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है और इसी अनुपात में हमारे सामने समस्याएं बढ़ती जा रही हैं।

कई बार तो विषम और दुर्भाग्यजनक हालातों को देखकर यही लगता है कि कहीं हम गलत समय पर तो पैदा नहीं हो गए हैं। और कई बार लगता है कि बहुत सारे लोग जानवरों के रूप में पैदा होने चाहिए थे, वे इंसानों की खाल चुराकर धरती पर अवतरित हो गए हैं।

इन सभी प्रकार के हालातों में सज्जनों के सामने हमेशा यही पीड़ा बनी रहती है कि हम चाहे कितना अच्छा काम करते रहें, हमारा व्यवहार कितना ही माधुर्यपूर्ण हो, हमारी भावनाएं चाहे कितनी पवित्र, अनासक्त और लोक मंगलकारी हों, हमारा उद्देश्य समाज की सेवा और परोपकार करना रहा हो, हमारा जीवन निष्काम कर्मयोग और निष्ठाओं से परिपूर्ण रहा हो, हम अपने आपमें कितने ही धार्मिक, सिद्धान्तवादी, नैतिक मूल्यों और आदर्शों पर चलने वाले हों अथवा कितने ही सच्चे और ईमानदार क्यों न हों, हमारे लिए हर जगह कुछ न कुछ मूर्ख, वर्णसंकर, उन्मादी, अहंकारी, नासमझ, स्वार्थी, धूर्त-मक्कार और खुदगर्ज लोग बेवजह पीछे पड़े रहते हैं।

ये लोग बिना किसी कारण तंग करते रहते हैं और  इन लोगों के कारण से जीवन भर हमें परेशानियाें का सामना करना पड़ता रहता है। आखिर ये लोग ऎसा क्यों करते हैं। जिन अच्छे लोगों और श्रेष्ठ कार्यों को प्रोत्साहन देना चाहिए उनके प्रति उपेक्षा और निन्दाजनक व्यवहार करना कहाँ का न्याय है।

सज्जनों की पूरी जिन्दगी में कुछ न कुछ मूर्ख, भौन्दू, कायर, भ्रष्ट, गुण्डे-बदमाश और लूटेरे, व्यभिचारी और राक्षसी लोग हर जगह ऎसे मिल ही जाते हैं जो इनकी निन्दा करने का ठेका लिए हुए रायता फैलाते रहते हैं। सज्जनों की मनःस्थिति कुछ विचित्र किस्म की होती है। संवेदनशील होने के कारण इन्हें इस बात का बुरा भी लगता है कि आखिर ऎसा क्या हो गया है कि कुछ नुगरे और निकम्मे हर बार उनके पीछे पड़े रहते हैं।

दुनिया भर मेंं सज्जनों के साथ यही स्थिति है। सच्चाई और ईमानदारी से जीने वाले अच्छे लोगों में से अधिकांश इस विषम स्थिति से घबरा जाते हैं और अपने कर्म से पीछे हटकर पलायन को अपना लेते हैं।

इनकी यह सोच बन जाती है कि कुछ अच्छा करने से निन्दा करने वाले कुकुरमुत्ते पैदा हो जाएं, और हमारा मन खिन्न हो जाए, उससे तो अच्छा यही है कि चुपचाप बैठ जाएं। यही कारण है कि दुनिया में हजारों-लाखों की संख्या में कर्मयोगी इन नुगरों और नालायकों के कारण से कर्मयोग और सेवा-परोपकार की मुख्य धारा से पलायन कर जाते हैं और इसका सीधा सा नुकसान समाज, देश और विश्व को भुगतना पड़ता है।

इस दृष्टि से ये नुगरे लोग ही हैं जिन्हें दुनिया में सबसे अधिक असामाजिक और आतंकी माना जाना चाहिए और इनके साथ वही दण्डात्मक व्यवहार किया जाना चाहिए जो कि अपराधियों के साथ होता है।

इन लोगों के इस दुष्कर्म से बढ़कर और कोई अपराध हो ही नहीं सकता। एक तो खुद कोई अच्छा काम नहीं करना, ऊपर से अच्छे काम करने वाले लोगों को हतोत्साहित करना।

हम जैसे असंख्य लोग इसी मानसिकता में रह-रहकर सोचने को विवश रहा करते हैं कि आखिर ऎसा क्या है कि अच्छे लोेगों और श्रेष्ठ कर्मयोग को बर्दाश्त नहीं कर पाते।  यह आज की स्थिति नहीं है बल्कि युगों-युगों से इंसानी जिस्म में जाने कैसे खुराफाती कीटाणु हैं जो कि रह-रहकर प्रसूत हो आकार बढ़ाते रहते हैं।

और हम हैं कि इन दो-चार से लेकर दस-पन्द्रह नुगरे लोगों के कारण से समाज और आम लोगों के प्रति अपनी धारणाओं को बदल कर पलायनवादी मानसिकता को अपना लेते हैं। जबकि ऎसा नहीं है कि ये नुगरे हमारे ही पीछे पड़े रहने के लिए पैदा हुए हों।

इस प्रजाति के लोग अपने स्वार्थ और झूठन-खुरचन चाटते हुए जैसे-तैसे अपनी जिन्दगी चलाने के लिए सज्जनों के पीछे पड़े ही रहते हैं, यह इनके लिए जिन्दगी भर का मूल एजेण्डा है। इन्हें यदि सज्जनों की निन्दा और शिकायत का कोई अवसर न मिले तो ये असमय मर ही जाएं। इन्हें अपने आपको जिन्दा रखने के लिए पैशाचिक हरकतों का सहारा लेना विवशता है।

इस स्थिति में हमारे जैसे लोगों को यह सोचना चाहिए कि  ऎसे नुगरे और बिकाऊ लोगों की संख्या पाँच-दस से अधिक नहीं होती। फिर जो लोग हमारा विरोध करते हैं उनके जीवन को देखें तो पता चलेगा कि ये सारे के सारे पराये टुकड़ों और झूठन पर पलने वाले, ब्लेकमेलर, उच्छिष्टभक्षी, हराम का खान-पान करने वाले, भ्रष्ट, रिश्वतखोर, कमीशनबाज, पैसों, पद, प्रतिष्ठा और पुरस्कारों के लिए मरने वाले, दाम्पत्य सुख से वंचित, व्यभिचारी, शराबी, व्यसनी, धूर्त, मक्कार, लूटेरे, हरामखोर, खल, कामी,  आवारा, उन्मादी और उत्पाती लोग हैं जिनके पास करने को न कोई अच्छा काम है, न इनकी कोई सोच।

इस किस्म वालों का एक ही काम जिन्दगी भर रहता है और वह है – न खुद कुछ करना, न औरों को अच्छा कुछ करने ही देना। और हम संवेदनशील बुद्धिजीवी इन कमीनों और नालायकों के कारण से बेवजह चिंतित होकर पलायन करने लगते हैं।  हम सभी को यह सोचना चाहिए कि हमारे उत्तम व्यक्तित्व और श्रेष्ठ एवं आदर्श कर्मयोग की तारीफ करने वाले, हमारे हर कार्य को सराहने और प्रोत्साहित करने वालों की कहाँ कोई कमी है। हमें दिल से चाहने वालों में  हजारों और लाखों लोग हैं और ऎसे में इन नगण्य नुगरों की फिक्र हमें क्यों होनी चाहिए। हमारी ही तरह सभी प्रकार के सज्जनों, कर्मयोगियों और नैष्ठिक कर्तव्यपरायण लोगों को चाहिए कि वे नुगरों की परवाह न करें बल्कि उन असंख्य लोगों को दिल न तोड़ें जो हमारे चाहने वाले हैं।

इनकी चाहत का आदर-सम्मान करते हुए अपने जीवन में ऊँचाइयों और शिखरों का आरोहण करते रहना ही जिन्दगी का परम सत्य है जो यश, कीर्ति, शांति और आत्म आनन्द प्रदान करता है।

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