प्रवाह का सम्मान करें – कर्म को भोग लें, टालें नहीं

जब तक कर्म को जीवात्मा पूरी तरह भुगत नहीं लेते तब तक आगे से आगे चलते रहते हैं।

कारण यह है कि कोई से कर्म का अच्छा-बुरा फल सामने आने पर अच्छे फल को तो हम प्रसन्नतापूर्वक भुगत लेते हैं और आनंदित होते हैं लेकिन पाप कर्म की वजह से दुःख आने पर भगवान से अनुनय विनय करते हैं कि इसे हटा दे।  भगवान बड़ा ही दयालु है इस कारण वह उस समय तो हमें इस दुःख से मुक्त कर देता है लेकिन कर्म का क्षय नहीं होता, वे कर्म कुछ वर्ष बाद के लिए अथवा अगले जन्मों के लिए टल जाते हैं।

इसलिए जो कुछ अच्छे-बुरे कर्म का फल प्राप्त हो रहा है उसे प्रसन्नतापूर्वक भोग लिया जाना चाहिए ताकि बाद में इनसे दो-चार न होना पड़े।

नियति के विधान को जो प्रसन्नतापूर्वक भोग लेता है उसके प्रति नियति भी दयालु रहती है। इसलिए भगवान की इच्छा से जीने की कोशिश करो, अपनी इच्छा से नहीं।