कचूमर निकालें कमीन कैंकड़ों का

कोई कितना ही ऊँचा चढ़ना और बढ़ना चाहे, हर तरफ फिसलन के तमाम ताम-झाम भी हैं और इनके साथ ही कैंकड़ों का भी बाहुल्य है, जो किसी को ऊँचे चढ़ना और बढ़ना देख नहीं पाते।

जब भी कोई अपने कद को ऊँचा करने और ऊध्र्वगामी यात्रा करने की कोशिश करता है, एक-दो-तीन ही नहीं ढेरों कैंकड़े उधर खींचे चले आते हैं और अपनी कमीनी हरकतों पर उतारू हो जाते हैं। कई जगहों पर अपनी किस्म के सारे कैंकड़ों का एक गिरोह ही बन जाता है जो मनमानी हरकतें करता रहता है।

कोई कपड़े खींचता है, कोई टाँग पकड़कर नीचे खींचने की कोशिश करता है, और कोई हमसे ऊपर चढ़कर आँख में उँगली डालकर रोशनी पर पहरा बिठा देता है।

कैंकड़े हर क्षण टाँग खिंचाई कर नीचे गिराने में ही लगे रहते हैं।  कैंकड़ों का अपना धर्म ही होता है – टाँग खिंचाई। ये कैंकड़े न बाहर से आते हैं, न परदेस से। अपनी बिरादरी और समानधर्मा-समानकर्मा परिसरों में ही कैंकड़ों का जमावड़ा रहता है।

दूसरे कैंकड़े केवल दूर से चिल्लपों मचाते हुए औरों को अपने लक्ष्य से भटकाते रहते हैं। वे इस बात से नावाकिफ होते हैं कि हमें किस तरह गिराया जाए।

हमारी टाँग खिंचाई और नीचे गिराने के सारे हुनर में वे ही कैंकड़े माहिर होते हैं जो हमारे आस-पास रहते या काम करते हैं या फिर हमारे ही परिसरों और बाड़ों की खाक छानते हुए जो बरसों से टाँग खिंचाई में इतने अधिक पारंगत हो जाते हैं कि हमसे अधिक बुजुर्ग और अनुभवी होकर वरिष्ठता को पा लेते हैं।  और बहुधा नए सपोलों की तरह नए-नए प्रसूत हो गए कैंकड़े भी धमाल और धींगामस्ती दिखा जाते हैं।

जो कैंकड़ा जितना अधिक बूढ़ा, खूसट और नालायक होता है, वह उतना ही अधिक अतृप्त और उद्विग्न होता है और इसलिए अपनी हताशा और निराशा को कम करने के लिए दूसरे लोगों पर अधिकार जमाते हुए भांति-भांति से तंग करने लगता है, टाँग खिंचाई के सारे आसनों और कलाबाजियों को आजमाने लगता है। कइयों की तो घृणा जगाने वाली मनहूस शक्ल को देखकर ही भाँपा जा सकता है कि पुराने जाने कितनों जन्माेंं का पाप जमा हो जाने के बाद भगवान ने इन्हें पैदा किया होगा।

इन कैंकड़ों को इसी में मजा आता है कि कोई किस तरह तंग होता है, किसमें किस तरह तनावों का कहर ढाया जा सकता है, और कोई कितना अधिक हैरान-परेशान होकर उनके आधिपत्य और कुटिल सत्ता को स्वीकार करता है।

पहले कैंकड़ों की दो-चार किस्में ही हुआ करती थी लेकिन अब बड़े व महान लोगों के साथ रहने, उनकी झूठन खाने, खुरचन चाटने और हराम का माल हथियाने से लेकर जमाने भर की पैशाचिक वृत्तियों को सहर्ष अंगीकार कर लिये जाने के बाद कैंकड़ों की प्रजातियां इतनी अधिक हो गई हैं कि इन्हें गिन पाना तक मुश्किल हो गया है।

हाँ इतना जरूर है कि जितनी किस्मों के कैंकड़े, उतनी अधिक चालबाजियां, कुटिलताएं और उतने ही पैने, तीखे और धारदार दाँत, नाखून और काँटेदार लम्बी-लम्बी टाँगें। कैंकड़ा कल्चर और टाँगखिंचाई भरे क्रियाकर्म में कोई कैंकड़ा छोटा या प्रभावहीन नहीं होता।

जो एक बार कैंकड़ा हो गया, खून पीने और काट खाने का स्वभाव अपना लिया, वह मरते दम तक कैंकड़ा ही बना रहता है। आयु और अनुभवों के साथ कैंकड़ों में भी बहुस्तरीय कद व्यवस्था होती है।

हर बड़ा कैंकड़ा उतना ही कड़क और कड़ा होता हुआ उन्मुक्त होकर अपनी मनमानी चलाता हुआ मनचाही करता रहता है। कुछ कैंकड़े शक्ल और सूरत से दीख जाते हैं और दूसरे दुबके रहते हैं।

कोई कुनबा ऎसा नहीं बचा है जहाँ कैंकड़ों का कोहराम न मचा हुआ हो। हम सभी लोग चन्द्रमा से लेकर मंगल ही नहीं, दूसरे सारे ग्रहों-उपग्रहों तक अपनी बस्तियां बसाने में कामयाबी पा सकते थे यदि ये कैंकड़े न होते।

यों तो कैंकड़े हर मामले में उदासीन और स्थान परिधि सापेक्ष होते हैं लेकिन दूसरों की टाँग खींचकर नीचे गिराने और वक्त-बेवक्त बिना बात काट खाने और दुनिया के तमाम तटाें पर माँद बनाकर रहते हुए ये किसी को छोड़ते नहीं, इसी मामले में ये प्रो एक्टिव और एनर्जेटिक होते हैं।

सब तरफ कैंकड़ों के अभयारण्य भी पनपते जा रहे हैं और कैंकड़ों के जंगल भी।  अब तो अपने हित साधने के लिए लोग कैंकड़ों का पालने भी लगे हैं।

बहुत सारे कैंकड़े हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि ये इनकी झूठन पर पलने वाले हैं, इनके कैंकड़े हैं। दुनिया भर में कई सारी नदियों-महानदियों और जलाशयों के तटों पर कैंकड़ों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है।

कोई तट ही शायद ऎसा बचा हो जहाँ कैंकड़ों की पावन देह और उनकी नापाक हरकतों का दिग्दर्शन न होता हो। कैंकड़ों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है, ये चाहे जहाँ रहते हैं, आते-जाते रहते हैं और जिसे चाहे उसे काट लेने का पूरा और पक्का माद्दा रखते हैं।

कई बाड़ों और परिसरों में कैंकड़ों को अभयदान का वरदान मिला हुआ है। इन्हें न कोई कुछ कह सकता है, न कोई टोक सकता है, कैंकड़ों को तट बदर करने की बात तो बहुत दूर है।

दुनिया भर से इंसानों को छोड़कर तमाम प्रकार के प्राणियों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है लेकिन कैंकड़ों के बारे में ऎसा कुछ नहीं रहा। हर युग में इनका बाहुल्य रहा है।

आजकल तो कैंकड़ों की कुमाया सब तरफ छायी हुई है। अपने आस-पास और अपने परिसरों में भी कैंकड़ा छाप आदमियों की कोई कमी नहीं है।

तरक्की पसन्दों ने कभी कैंकड़ों के कहर के बारे में नहीं सोचा वरना आज हम कहाँ के कहाँ होते। अब भी समय बीता नहीं है, पूरी तैयारी के साथ कैंकड़ों की खोज का युद्धस्तर पर अभियान चलाएं और कैंकड़ों का कचूमर निकालने के लिए तैयार हो जाएं, फिर देखें हमारे ऊध्र्वगमन को कौन रोक सकता है, लेकिन इसके लिए चाहिए तगड़ा संगठन, दृढ़ संकल्प शक्ति और अदम्य आत्मविश्वास।

अभी नहीं चेते तो ये कैंकड़े अपनी ही अपनी चलाते रहेंगे, किसी को ऊपर चढ़ने ही नहीं देंगे। कैंकड़ों के सत्यानाश की कामना से आगे आएं और कुछ करके दिखाएं।