आत्मीयता का प्रपात, लोकसेवा के पर्याय भाई श्री सुरेश पाठक

आत्मीयता का प्रपात, लोकसेवा के पर्याय भाई श्री सुरेश पाठक

हर दिल अजीज, असंभव को संभव कर देने वाला टाईगर नहीं रहा

विश्वास आज भी नहीं होता, पर नियति के शाश्वत सत्य को स्वीकार करने के सिवा और कोई चारा भी नहीं।  अभी 9 अक्टूबर 2017 सोमवार की ही बात है। मनहूस संध्या काल के कपाल पर कुछ ऎसा लिख गई है कि जिसे कोई पढ़ न सका।

केवल सूचना ही आ पाई कि भाई श्री सुरेश पाठक नहीं रहे, हृदयाघात से उनका देहावसान हो गया। हम जैसे अग्रजों से पहले हमारे अपने प्रिय अनुज का इस तरह पृथ्वी छोड़ देना अपने आप में हृदय विदारक ही था। परिवार और उनका अपना गाँव सरेड़ी बड़ी ही नहीं बल्कि आस-पास से लेकर दूर-दूर तक यह शोक समाचार आग की तरह फैल गया।

जिन-जिन के कानों तक संदेश पहुंचा, उनमें से किसी ने सहसा विश्वास नहीं किया। इतनी कम आयु में चुस्ती और स्फूर्ति के पर्याय श्री सुरेश पाठक का महाप्रयाण सभी के लिए गहरा सदमा ही है।

एक जाम्बाज और जागरुक इंसान के रूप में भाई श्री सुरेश पाठक का इतना दबदबा किसी और में नहीं देखा। जिन्दादिली के साथ हर किसी के प्रति आत्मीयता और प्रेम का माधुर्य भरा रिश्ता कायम कर लेना और समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में द्रष्टा की बजाय स्रष्टा के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ना उन्हीं का कमाल था।

पारिवारिक संस्कारों और राजनैतिक माहौल की बदौलत राजनैतिक गलियारों से लेकर सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और ग्रामीण विकास के गलियारों तक में उनकी जबर्दस्त धमक को हर कोई बड़ी ही शिद्दत से महसूस करता था। बहुत बड़ी संख्या में युवाओं को अपने लक्ष्य की प्राप्ति कराने में उन्होंने ऎसे भगीरथ का काम किया जो और कोई नहीं कर सकता था।

बिन्दास और पराक्रमी व्यक्तित्व को ओज-तेज इतना कि उसे टाईगर के रूप में जाना जाता था। हर किसी के सुख-दुःख में भागीदारी निभाते हुए अपनी ओर से हरसंभव सहयोग करना उनके व्यक्तित्व की वो विलक्षणता रही कि जिसके कारण जो उनके करीब आया, उनका अपना हो गया।

शैक्षिक एवं सहशैक्षिक अभिरुचियों के साथ ही खेलकूद में उन्होंने नाम कमाया। हाईजम्प से खेलजगत की शुरूआत से लेकर हर प्रकार के खेलों और उनसे संबंधित आयोजनों में भाई श्री सुरेश की भूमिका अहम रही। खिलाड़ियों ने भी महसूस किया कि उनका वो साथी चला गया जिसके दम पर बड़ी से बड़ी चुनौतियों को ध्वस्त कर दिया करते थे।

साहित्यिक और शैक्षिक दक्षता के क्षेत्र में उन्होंने जो कुछ किया उसे हजारों विद्यार्थी, उनके संगी साथी शिक्षक और विद्वजन आज भी याद करते हैं। वागड़ अंचल की संस्कृति और साहित्य धाराओं पर उन्होंने एम.फील की और इसके लिए जो शोध प्रबन्ध प्रस्तुत किया, उसे देखकर मैं स्वयं भी चकित रह गया उनकी मेधा-प्रज्ञा को देखकर।

होली का गढ़ भेदन अनुष्ठान हो या फिर गांव तथा आस-पास के इलाकों का कोई सा आयोजन, सुरेश पाठक की मौजूदगी मात्र ही काफी थी इनकी आशातीत सफलताओं का इतिहास रचने में। हर वर्ग और सम्प्रदाय के लोगों ने उसे दिल से चाहा और सराहा।

अपने भीतर बहुआयामी किरदारों को जीने वाले भाई श्री सुरेश पाठक जीवन और परिवेश के कई सारे आयामों में अपनी विलक्षण प्रतिभाओं की अमिट यादें छोड़ गए हैं। लगता है कि जैसे ऎसा बहुत कुछ हाथ से छिटक गया है जिसकी बदौलत रचनाधर्मिता और सामाजिक विकास की धड़कनों का स्पन्दन सुनाई देता रहा है।

हाल के कुछ माहों से फेसबुक पर उनकी सक्रियता और मस्ती के साथ जीने के अन्दाजों की झलक पाकर सभी लोग अभिभूत थे कि अचानक रंग बदरंग हो गए।

भाई श्री सुरेश पाठक के व्यक्तित्व, कर्मयोग और लोक व्यवहार के बारे में जितना कुछ कहा जाए, लिखा जाए, वह कम है। इसी कर्मवीरता का ही प्रताप है कि उन्हें लोग टाईगर नाम से जानते रहे हैं।

गांव और आस-पास के इलाकों के लोगों के लिए वे ऎसे टाईगर थे जिनकी वजह से लोग अपने आपको सुरक्षित और संरक्षित महसूस करते थे और उन्हें पक्का भरोसा था कि कोई भी समस्या या संकट आ जाने पर और कोई मदद करे या न करे, उनके अपने सुरेश भाई चौबीस घण्टे उनके लिए तैयार हैं।

उनके आकस्मिक महाप्रयाण को लोग ऎसा महसूस करते हैं कि जैसे काल ने उन्हें ठग लिया हो। उनकी कमी हर पर्व-उत्सव-त्योहार और ग्राम्य लोक जीवन में अखरती रहेगी।

अपने ही हाल में जीने वाले आत्मकेन्दि्रत लोगों की विस्फोटक भीड़ में सुरेश पाठक जैसे व्यक्तित्व नक्षत्र की तरह ही होते हैं जिनकी चमक-दमक भरी आभा और सेवा-परोपकार की रश्मियाँ अर्से तक प्रेरणा का संचार करती रहेंगी।

अनुज भ्राता श्री सुरेश पाठक के प्रति पुनः हार्दिक श्रद्धान्जलि।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः