धर्म विरूद्ध है आतिशबाजी

धर्म विरूद्ध है आतिशबाजी

आतिशबाजी धर्म संगत नहीं है। कोई भी ऎसा काम जो किसी भी जीव (इंसानों से लेकर पशु-पक्षी और जलचर सभी)  की शांति भंग करता है वह धर्म विरूद्ध है।  धर्म के नाम पर मूर्खता करने वाले जड़ मूर्खों और नौटंकीबाजों की वजह से से ही केरल हादसा हुआ। किसने कहा था कि आतिशबाजी करो।  जिस शादी-ब्याह में आतिशबाजी होती है उस परिवार में शांति भंग और शोक के कारण अक्सर पैदा होते रहते हैं। इन परिवारों का दाम्पत्य जीवन भी कलह से घिरा रहता है क्योंकि अपने परिवार को बसाने के चक्कर में ये पक्षियों को बसेरों से दूर कर दिया करते हैं। ये पशु-पक्षी इन्हें शाप देते हैं जिसके कारण आतिशबाजी के बीच शादी-ब्याह करने वाले लोगों का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रह पाता है।

भगवान और प्रकृति को शाश्वत शांति पसंद है, शोरगुल नहीं। जहां शोरगुल होगा वहाँ प्रकृति भी कुपित होगी और दूसरे समस्त प्रकार के प्राणियों के साथ भगवान भी। यह बात उन नालायक बाबाओं, धूर्त पण्डे- पुजारियों  और धर्म के धंधेबाज ठेकेदारों को समझाने की आवश्यकता है जो धार्मिक कार्यक्रमों और उत्सवों में आतिशबाजी से ही खुश होते हैं, भक्ति, मंत्रों या स्तुतियों से नहीं।

दीवाली पर लक्ष्मी आवाहन सब करते हैं लेकिन लक्ष्मी क्यों नहीं आ रही है, इसे कोई समझने को तैयार नहीं है। मूर्ख लोगों की आतिशबाजी से शांति भंग होती है और जहां शांति एवं आनंद नहीं होता वहाँ लक्ष्मी कभी नहीं आती। कौन समझाए इन किसम-किसम के पागलों को, ये इसी माजने के हैं। करो धर्म विरूद्ध व्यवहार, पाखण्ड और भुगतो  अपनी करनी।  मूर्ख और नुगरे लोगों की पाखण्डी भक्ति के कारण भोले-भाले श्रद्धालुओं को जीवन से हाथ धोना पड़ा। परमात्मा इन सभी को शांति प्रदान करे। यही स्थिति हमारे उत्सवों की हो गई है, आतिशबाजी इनमें प्रधान हो गई है इस कारण साल भर कोई न कोई उत्सव करते रहने के बावजूद देश में शांति और आनंद का नाम नहीं।  भगवान को पाना चाहें, जीवन में शांति, सुख-समृद्धि और सुकून चाहें तो आतिशबाजी को विदा करें हमारे रीति-रिवाजों और उत्सवों से।  आतिशबाजी का उपयोग युद्धों में होना चाहिए न कि लोक जीवन में।