यह है मोह भंग होने की वजह

यह है मोह भंग होने की वजह

दुनिया में हर जीवात्मा और स्थान विशेष का संबंध केवल तभी तक रहता है जब तक कि उसका पूर्वजन्म का कोई लेन-देन पूरा चुकता न हो जाए। बात चाहे पाने की हो अथवा देने की, दोनों ही स्थितियों में एक-दूसरे से अथवा एक का अनेको जीवात्माओं से संबंध बना रहता है।

जैसे ही लेन-देने की स्थिति पूर्णता को प्राप्त होती है अर्थात् एक-दूसरे का पूर्वजन्म का ऋण समाप्त होने की पूर्णता पर आ जाता है तब अनायास किसी न किसी कारण से मोह, ममता, वात्सल्य और पारस्परिक आकर्षण का दौर समाप्ति के कगार पर पहुंच जाता है।

कई बार अधिक मोहग्रस्तता अथवा मोहान्धता की वजह से जब संबंधों में प्रगाढ़ घनत्व की स्थिति होती है लेकिन लेन-देन पूर्णता प्राप्त कर लेता है, उस स्थिति में बिना किसी ठोस कारण के अथवा दूसरे लोगों के कारण संबंधों में विभ्रम आकार लेने लगता है और इससे शंकाओं के कारण संबंधों में विच्छेद हो जाता है।

लेकिन किसी भी प्रकार का कोई सा संबंध हो, उसकी समाप्ति के पूर्व कम से कम तीन बार पूर्वाभासी संकेत प्रत्येक जीवात्मा को प्राप्त होते ही हैं। यदि जीवात्मा इन संकेतों को समझ जाए और संबंधों को प्रेमपूर्वक बिना किसी झंझट या आशंका के यदि विराम दे डाले, तब तो ठीक है अन्यथा किसी न किसी विवाद, दुःख या अनहोनी घटना-दुर्घटना की वजह से संबंधोंं का खात्मा हो ही जाता है।

हम यदि प्रसन्नतापूर्वक संबंधों में सहर्ष ठहराव ले आएं अथवा संबंधों को केवल आत्मीय एवं निरपेक्ष भावों तक ही सीमित रखें, इसमें लेने या देने की कोई बात नहीं हो, पूर्णतः निरपेक्ष भाव बना रहे, अथवा संबंधों के भीतर से मोह और आसक्ति का भाव समाप्त हो जाए, उस स्थिति में यह संभव है कि लेन-देन की पूर्णता का स्तर प्राप्त कर लिए जाने के बाद भी इनमें सम्पर्क व संबंध बने रहें। अन्यथा अपेक्षा और आसक्ति के बरकरार रहने की स्थिति में ऎसे संबंधों का स्थायित्व रह पाना कभी संभव नहीं है।

लेन-देन से सभी प्रकार के अशेष संबंध होने समाप्त होने की यह बात केवल जीवात्माओं से ही संबंध नहीं रखती। प्रकृति के प्रत्येक जड़-चेतन पदार्थ और स्थान से भी इस समीकरण का उतना ही संबंध है। संबंधों के स्थापित होने के पीछे भी यही गणित काम करती है। पूर्वजन्म के लेन-देन के संबंधों की वजह से ही जीवात्माओं और स्थान विशेष से संबंध स्थापित होते हैं, चाहे ये जीवात्माएं देश-विदेश से हों, दूरदराज के क्षेत्रों की हों या फिर किसी भी प्रकार के कर्म, व्यवहार व स्वभाव की।

जिन-जिन स्थानों से हमारा पूर्वजन्म का या वहां रहने वाले व्यक्तियों का संबंध होता है वहां हमारा आवागमन होता रहता है और उन इलाकों के अन्न-जल का संबंध रहता है। जब तक उस स्थान विशेष का हवा-पानी और खान-पान का हिसाब पूरा नहीं होता, तब तक हमारा पिण्ड उस स्थान से छूट नहीं सकता। यह हम पर निर्भर है कि जीवन्मुक्ति और जीवनोपरान्त मोक्ष प्राप्ति के लिए हम पहले से तैयार रहें और ईश्वरीय प्रवाह में बहते हुए सभी प्रकार के प्रारब्ध को भोग कर इनका क्षय कर लें। ऎसा नहीं होने पर हमें केवल इसी के लिए दुबारा जन्म लेने की जरूरत पड़ेगी ही, और यह किसी भी जीवात्मा के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता।

हर किसी के जीवनकाल में यह अक्सर देखा जाता है कि किसी भी इंसान से सायास संबंध स्थापित करने की चाहे लाख कोशिश की जाए, लेकिन इनमें सफलता नहीं मिल पाती। इसके विपरीत कई जीवात्माओं और स्थलों से अनायास ही ऎसे संबंध स्थापित हो जाते हैं कि जिन्हें देख कर यही लगता है कि बरसों से या कई जन्मों के रिश्ते हों।

बहुत सारे प्राणी ऎसे मिल जाते हैं जो कि पृथक-पृथक व्यवहार, चेहरे, जाति और गुणों के होते हैं किन्तु उनमें परस्पर सहोदर की तरह समानता होती है और इनमें आसानी से भेद तक नहीं किया जा सकता। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि संबंधों का पूरा गणित पूर्वजन्म की लेन-देन पर ही आधारित होता है।

खूब सारे लोग प्रेम में इतने अधिक डूब जाते हैं कि सात जनमों तक या जनम-जनम तक साथ रहने और साथ निभाने का वादा करते हुए प्रेम विवाह कर लिया करते हैं और एक-दूजे के लिए जीने-मरने की कसमें खाते हैं लेकिन विवाह के थोड़े दिनों बाद ही सम्बन्धों में कटुता आ जाती है, ज्यादा दिन तक निभ नहीं पाते और संबंधों का खात्मा हो जाता है।

इसी प्रकार बहुत से लोग इतने प्रगाढ़ मित्र और अन्तरंग होते हैं कि इनके बारे में लोग नज़ीर देते हुए मित्रता की पराकाष्ठा को अभिव्यक्त करते हैं किन्तु इनमें भी खूब सारे लोग ऎसे देखे जाते हैं कि जिनमें एक समय बाद इतनी अधिक कटुता और दुश्मनी आ जाती है कि कुछ कहा नहीं जा सकता।

जितने ये लोग मित्र होते हैं उससे कई गुना अधिक जानी दुश्मन बन जाते हैं और एक-दूसरे को बरबाद कर डालने तक के लिए तमाम प्रकार के षड़यंत्र रचते रहते हैं। इस मामले में संबंधों का यथार्थ सत्य यह भी है कि इन लोगों की मैत्री के पीछे दोनों ही प्रकार की स्थितियां होती हैं।

दोनों पक्ष एक-दूसरे से पूर्वजन्म का कुछ न कुछ मांगते भी होते हैं और देनदारी भी चुकाने के लिए पैदा होते हैंं। इस स्थिति में पहले एक-दूसरे को कुछ देना ही देना करते रहते हैं और तब तक मित्रता या संबंध बने रहते हैं लेकिन जब एक-दूसरे को कुछ न कुछ देते रहने से संबधित आपसी हिसाब पूरा हो जाता है तब एक-दूसरे से लेनदारी का दौर आरंभ होता है और जब इसकी पूर्णता आती है तब संबंधों के बने रहने का कोई आधार नहीं होता इस कारण बिखराव और विच्छेद हो जाता है।

कई बार घर-परिवार में सभी प्रकार के संबंधियों में यकायक कोई न कोई ऎसा कारण बन जाता है कि पिता, माता, पुत्र-पुत्री, पति-पत्नी, भाई-भाई, भाई-बहन आदि में किसी शंका या कारण को लेकर वैमनस्य आ जाता है।

कई बार लोभ और मोह के कारण से संबंधों में तनाव और अलगाव पैदा हो जाता है। अक्सर यह भी देखा जाता है कि जीवनकाल के उत्तरार्ध में पिता और माता में से किसी एक के अथवा दोनों के अपनी संतति से संबंध खराब हो जाते हैं।

चाहे दोष किसी भी पक्ष का क्यों न हो, लेकिन यह मोह भंग होने की वह अवस्था है जो कि जीवात्माओं के बीच दूरी पैदा कर डालती है और वैराग्य की भावना को बलवती बना दिया करती है। ऎसा इसलिए भी होता है कि जब माता-पिता और संतति के मध्य लेन-देन का कोटा पूरा हो जाता है तब सर्वशक्तिमान यदि जीवात्माओं पर कृपालु हो तो यह प्रयास करता है कि सभी पक्ष गति-मुक्ति की राह प्राप्त करें।  और यह राह पारस्परिक मोह के रहते हुए खुल नहीं सकती। और इस वजह से मोह छुड़वाने और वैराग्य की भावनाओं को दृढ़ करने के लिए भी इस प्रकार की विषमता भरी स्थितियां सामने आती हैं।

गृहस्थाश्रम में रमे हुए लोगों को वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करते समय हर्ष का अनुभव होना चाहिए और धीरे-धीरे मोह, ममता और लोभ का परित्याग करना चाहिए तभी संन्यास आश्रम तक आते-आते वह स्थिति प्राप्त हो सकती है कि जीवन्मुक्ति का आधार मजबूत हो सके।

ऎसा हम यदि प्रयत्नपूर्वक कर पाएं तो ठीक है अन्यथा बेमन से भी यह सब करना ही पड़ेगा क्योंकि विधि का विधान होकर रहता है। जीवन में तमाम प्रकार के संबंधों में लेन-देन की पूर्णता के बाद भी यदि संबंध कायम रखे रहने की भावना हो तब हमें निरपेक्ष भाव से अनासक्त जीवन जीने का अभ्यास करना चाहिए। इससे प्रेम में कहीं कोई कमी नहीं आती बल्कि सभी प्रकार के संबंध सामान्य रूप से चलते रहते हैं।

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