रक्षाबन्धन पर विशेष – बहनों ! माफ करना,  नाकारा हैं हम भाई लोग

रक्षाबन्धन पर विशेष – बहनों ! माफ करना, नाकारा हैं हम भाई लोग

भाई-बहन के रिश्तों का प्रतीक पर्व राखी आ ही गया है। सभी भाइयों को इंतजार है बहनों का, सहर्ष आएं और अपनी कलाई पर राखी बाँधें और परस्पर रक्षा और उन्नति के लिए संकल्पों का आदान-प्रदान करें और नई ऊर्जाओं के साथ भाई-बहन के रिश्तों को सुनहरा आकार देते हुए जीवन को ऊध्र्वगामी बनाते हुए आशातीत सफलता का वरण करें।

हालांकि वर्ष भर में अनेक ऎसे पर्व-उत्सव आते हैं जिनमें भाई-बहन को अहमियत दी गई है लेकिन खासकर ाखी को भाई-बहन से संबंधित प्रधान पर्व माना गया है। राखी केवल रक्षा सूत्र नहीं है बल्कि पारस्परिक संबंधों की आचार संहिता का पर्व है जिसमें भाई-बहन को एक-दूसरे के लिए किए जाने कर्तव्यों का भान होता है और नई ताजगी के साथ संकल्प बलवती होने लगते हैं।

हाल के कुछ वर्षों मेंं लड़के-लड़कियों का लिंगानुपात इस कदर गड़बड़ाया है कि लड़कों को बहनें नहीं मिल पा रही हैं और किसी न किसी को बहन बनाकर राखी का पर्व मनाना पड़ रहा है।

सामाजिक दुरावस्था और कन्याओं के प्रति भेदभाव का सीधा असर राखी के दिन समाज और परिवेश में देखने को मिलता है।  कन्या भ्रूण हत्या के पाप से सने हाथों वाले लोग भी राखी को बहनों से राखी बंधवाते रहे हैं।

इन लोगों को शर्म भी नहीं आती राखी का त्योहार मनाते हुए। बहुत सारी प्रजातियों के लोग हैं जो कन्या भ्रूण हत्या में लिप्त हैं और कन्याओं के जन्म लेने से पहले ही हत्या कर या करवा देते हैं।

राखी के त्योहार पर उन सभी महापातकी लोगों को रक्षासूत्र से वंचित कर दिया जाना चाहिए जो परोक्ष-अपरोक्ष रूप से कन्या भ्रूण हत्या के महापाप में शामिल हैं। फिर चाहे वे किसी भी पेशे के हों अथवा परिवार के।

ऎसे लोगों को राखी मनाने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। जो लोग इन भ्रूण हत्यारों की कलाई में राखी बाँधते हैं अथवा ऎसे पातकियों से जो राखी बँधवाते हैं उन्हें भी बड़ा भारी पाप लगता है।

भ्रूण हत्यारों को राखी बांधने और बंधवाने से उनके पापों का बोझ उन लोगों पर आ जाता है जो कि इन हत्यारों से राखी बांधते-बंधवाते हैं। ऎसे लोगों के दर्शन, इनका साथ और इनके पैसों का खान-पान की नरक की यंत्रणाओं की ओर धकेलता है।

कन्या भ्रूण हत्या के कारण समाज से कई सारे संबंध समाप्त होते जा रहे हैं और यह सब उन लोगों की देन है जो पाप कर रहे हैं अथवा कराने में प्रेरक अथवा सहयोगी बने हुए हैं।  राखी बहनों के लिए बराबरी के सम्मान का पर्व है और इसलिए सभी भाइयों के लिए यह आत्म चिन्तन का वार्षिक पर्व भी है जो हमें गंभीरता के साथ यह सोचने को विवश करता है कि पिछले वर्षों में हमने अपनी बहनों के लिए क्या किया और आने वाले वर्ष में बहनों की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए हमें क्या करना है।

बहनाें की आशाओं-आकांक्षाओं की पूति का कच्चा चिट्ठा खोल कर देखा जाए तो हम सभी भाइयों का सर शर्म के मारे नीचे झुक जाता है क्योंकि हम अपनी बहनों को या तो उपेक्षित करते हैं अथवा उनके लिए कुछ भी नहीं कर पाते।

हम सारे भाई बड़े ही प्रेम से राखी के दिन बहनों के हाथों कलाई पर राखी बंधवा लेते हैं, मुँह मीठा कर लिया करते हैं और इसकी एवज में बहनों को कुछ रुपए देकर मुक्त हो जाते हैं। फिर साल भर हममें से अधिकांश लोग कभी नहीं सोचते कि हमारी बहनों की क्या स्थिति है।

यहाँ बहनों से अर्थ सहोदर ही नहीं बल्कि अपनी परिचित सभी स्ति्रयां हैं जो या तो अपनी सगी अथवा बनाई हुई बहन होती है अथवा माता के स्वरूप में। हम भाई अपनी बहनों की पीड़ाओं को चुपचाप देखने-सुनने के सिवा कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं हैं।

या तो हम सारे के सारे कायर, नपुंसक और तटस्थ हैं अथवा अपने स्वार्थों के चक्कर में उन असुरों, जानवरछाप लोगों, अन्यायी, शोषकों और विधर्मियों के चक्कर में अपने स्वाभिमान को गँवा कर उनके पिछलग्गू और दास हो गए हैं जिनके लिए स्ति्रयां केवल भोग्या ही मानी जाती हैं।

न तो हम अपनी बहनों का तबादला करवा कर उन्हें पीड़ाओं से मुक्ति दिलाने की स्थिति में हैं, न उनके आत्म स्वाभिमान की रक्षा और उन्नति के लिए कुछ कर पा रहे हैं।

हममें से बहुत सारे लोग उन दुर्योधनों और महिषासुरों की झूठन पर पल रहे हैं जिनके लिए माँ-बहनों का कोई मूल्य नहीं है। माँ-बहनें ठगी जा रही हैं, किसी न किसी काम की एवज में उनकी अस्मिता के साथ खिलवाड़ होता है और प्रताड़ित की जाती हैं।

पर हम सारे कायर और कापुरुष लोग चुपचाप सुनने के सिवा कुछ नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि हम सारे किसी न किसी स्वार्थ में औरों के टुकड़ों को प्रसाद मानकर उनकी गुलामी को ही जीवन का ध्येय समझ चुके हैं।

हम बहुत से ऎसे लोगों को जानते हैं जिनके लिए स्त्री का कोई वजूद नहीं है, पौरुषी दंभ और आसुरी व्यवहार के बूते वे कहर बरपाते रहे हैं। बावजूद इसके हम खामोश रहकर सब कुछ देखते रहते हैं क्योंकि हमारे लिए माँ-बहनों की आबरू की रक्षा से कहीं ज्यादा अपने स्वार्थ और कामों की चिन्ता है अथवा इन लोगों से भय।

और इसी चक्कर में हम भी इन बदचलन, आवारा और गुण्डे-बदमाश लोगों को न केवल बर्दाश्त करते रहते हैं बल्कि उनका साथ भी देते हैं, उनके साथ भी रहते हैं और उनके साथ

हम किसी भी माँ या बहन के बारे में झूठी बातें करते हैं, चटखारे ले लेकर अश्लीलता भरे विचारों का विस्फुरण करते रहते हैं, उन पर लांछन लगाकर खुश होते हैं और माँ-बहनों पर होने वाले अत्याचारों को देखते रहते हैं।

हर माँ भी किसी न किसी की बहन है। स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो सबसे खराब स्थिति बहनों की है। आए दिन बलात्कार, प्रताड़ना, पीड़ा, अन्याय और शोषण की शिकार बहनें ही अधिक संख्या में हो रही हैं।

गुण्डे-बदमाश तो अनाचारी हैं ही,अभिजात्य और बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोग भी हैं जिनके कारण से बहनें किसी न किसी रूप में परेशान हैं।  बहनों की परेशानी हम दूर न कर पाएं तो हमारा भाई होना और राखी बँधवाने का नाटक बेकार है।

क्यों न हम सारे कायर और नाकारा भाई अपनी बहनों से इस बात की माफी मांग लें कि हम भले ही हम उनके हाथों राखी बँधवाते हैं, मुँह मीठा कर लेते हैं, लेकिन हमारी आज के बाद उनके प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं। वे अपनी सुरक्षा खुद करें, अपनी उन्नति के रास्ते खुद तलाशें, हम उदासीन भाइयों के भरोसे न रहें।

यों भी अब काफी कुछ बहनें अपने भाइयों की स्थिति को देखकर अच्छी तरह यह समझ चुकी हैं कि वे किसी काम के नहीं, जो कुछ करना है वह बहनों को अपने बूते ही करना है।

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