न हो जाए पानी-पानी

न हो जाए पानी-पानी

बरसात का मौसम है चारों तरफ।

बरस रहा है सब तरफ पानी ही पानी।

क्या मैदानी, क्या पहाड़ी और क्या रेगिस्तानी धरा, अबकि बार पानी ने कहीं का नहीं छोड़ा है।

कई बार तो लगता है कि जैसे पानी-पानी हो गई है धरा।

बरसात की कहीं कमी है, और कहीं जरूरत से अधिक, और अधिक बारिश का कहर बरपा रही है प्रकृति।

पता नहीं क्या हो गया है, प्रकृति क्यों कुपित हो चली है।

इंसान की तरह आजकल प्रकृति का कोई भरोसा नहीं रहा। बादलों की बदचलनी देखियें। कभी कहीं चुपचाप बरस जाते हैं और तबाही मचा डालते हैं।

कहीं ये हवाओं के चक्कर में आकर ऎसी जगहों पर खाली हो आते हैं जहाँ पहले से ही पानी-पानी हो रहा है।

न बादलों का भरोसा रहा है, न हवाओं को।

हवाएं बादलों के कान भर कर या कान खींच-मरोड़ कर अपने साथ ले जाती हैं और लक्ष्य भेदन के बाद ऎसे छोड़ देती हैं जैसे कि बादलों से कभी कोई संबंध रहा ही नहीं हो।

बेचारे बादल बगावत भी नहीं कर सकते, हवाओं की पीठ पर सवार होकर करनी होती है दिग-दिगन्त की यात्रा।

हवाओं का भरोसा किसी को नहीं रहा। बादलों को भी पता है हवाओं की फितरत, पर मजबूरी के मारे-सताये बेचारे करें भी तो क्या।

फिर आजकल तरह-तरह की हवाओं का जोर बना हुआ है।

कभी उत्तर की हवा दक्षिण को लग जाती है, कभी दक्षिण की हवा उत्तर हो। बीच के इलाके वालों को हर बार हवाओं के कारण मुँह की खानी पड़ती है। पेण्डुलम की तरह बादलों का झुकाव कभी इधर और कभी उधर होता रहता है।

बरसात तो बरसात, अतिवृष्टि का माहौल, असहनीय बाढ़ का प्रकोप और तिस पर प्रकृति का गुस्सा। सब कुछ जैसे इंसानों और पशुओं पर भी आफत लेकर बरस गए हों।

बरसात का यह कहर पुकार रहा है हम सभी को।

हमारी सभी की जिम्मेदारी है कि हम बरसात से प्रभावित लोगों को मदद करें। उन्हें राहत के लिए अपने हाथ बंटाएं। उन्हें जितना कुछ जरूरी हो, वह सम्बल प्रदान करें।

राहत प्रदान करना अपने आप में पुण्य का प्रतीक है और जो निष्काम भाव से जरूरतमन्दों की मदद करते हैं।

हम सारे खुश, स्वस्थ और मस्त रहें, यही जरूरी नहीं है।

आवश्यक यह है कि हमारे आस-पास के लोग भी खुश रहें और हम जिन इलाकों में रहते हैं वहाँ के लोगों को जितनी आवश्यकता हो, उसकी पूर्ति में मददगार बनें। इसके बिना हमारे सुख-चैन और आनंद का कोई औचित्य नहीं है।

जिन क्षेत्रों में बाढ़ का कहर है वहां अपने मानवीय फर्ज अदा करने का यह सुअवसर है और जो इस समय चुप रहता है, चुपचाप सब कुछ देखता रहता है, वह समय का सबसे बड़ा अपराधी है और आने वाली पीढ़ियाँ उसे कभी माफ नहीं करेंगी।

अपने पूर्वज भी हमें तब तक कोसते रहने वाले हैं जब तक उनका मोक्ष नहीं हो जाता।

आईये बरसात से प्रभावितों के लिए कुछ करने में मदद के लिए आगे आएं।