जी उठी हैं कठपुतलियाँ, उछालें मार रहे कठपुतले

जी उठी हैं कठपुतलियाँ, उछालें मार रहे कठपुतले

किसी जमाने में जब श्रव्य-दृश्य के आज की तरह संसाधन नहीं थे तब कठपुतलियां ही मनोरंजन और संदेश से लेकर सम सामयिक हालातों का दिग्दर्शन कराती थी।

कठपुतलियां और कठपुतले उन दिनों मनोरंजन के महा पात्र हुआ करते थे और भीड़ भी खूब जुटती थी।  काठ की इन पुतलियाें को आज के टीवी, सिनेमा, मोबाइल और दूसरे सारे साईबर एवं सोशल माध्यमों ने पछाड़ कर रख दिया है और मूल कठपुतलियां हाशिये पर चली गई हैं।

भले ही आज कठपुतलियों का तमाशा देखने में कम ही आ रहा हो लेकिन सच यह भी है कि अब सब जगह कठपुतलियां और कठपुतले जीवन्त नज़र आने लगे हैं। यों कहें कि अब आदमी की बजाय कठपुतला सम्प्रदाय सब तरफ छाने लगा है तो कोई गलत नहीं होगा।

कहने को आदमियों का विराट जंगल पसरा हुआ है लेकिन कुछ असली और जमीनी लोगों को छोड़ दिया जाए तो सारे के सारे ऎसे हो गए हैं जिन्हें देख कर लगता है कि ये कठपुतलियों से भी अधिक अभिनयी आनंद देने वाले हैं।

पहले कठपुतली वाला पीछे नेपथ्य में रहता था और परदे के आगे-आगे कठपुतलियां और कठपुतले नाचते थे, संगीत भीर चलता रहता और संवाद भी। अब  जिन्दा आदमी ने कठपुतलियों के सारे हुनर आजमा लिए हैं सिवा मौन के।

हर बाड़े, परिसर से लेकर सर्कल-चौराहे-तिराहे और धर्मशालाओं, मठों, मन्दिरों और आश्रमों तक इन कठपुतलियों का जमाना है और कठपुतलियां व कठपुतले मुख्य धारा में आ गए हैं जहाँ यह ढूँढ़ने नहीं जाना पड़ता कि तमाशा कहाँ और कब हो रहा है।

अब दिन-रात तमाशे चलते रहते हैं। घनी भीतरी बस्तियों और गलियों से लेकर सरहदों तक तमाशे ही तमाशे चल रहे हैं और आदमी कठपुतलियों की तरह व्यवहार करता हुआ कभी अट्टहास करता है, कभी जुगाली, कभी धौंस-धपट और धींगामस्ती का आनंद लूटता दिखाई देता और जहाँ बस नहीं चलता वहाँ फालतू की बहस शुरू कर देता है और जहाँ विवश होता है वहाँ कड़ी निन्दा का अचार और अमचूर परोस पर उसका स्वाद लेने के लिए विनम्र अनुरोध करता रहता है।

और सब तरफ से जब हार जाता है तो औरों के सर बुराई का ठीकरा फोड़ता हुआ इस कदर रायता फैला देता है कि चाटने और चटवाने वाले कई-कई दिनों तक इसी में व्यस्त हो कर सब कुछ भूल जाया करते हैं।

अपनी बुद्धि, सोच और सत्य से कोसों दूर रहने वाली कठपुतलियां उन्हीं का कहा मानती हैं, जिनके साथ खाती-पीती, सोती-उठती और मजे मारती रहती हैं। कठपुतले भी अपना इंसानी वजूद खो बैठे हैं या भुलाते जा रहे हैं।

यानि की सब तरफ लगता है कि जैसे इंसान खुद में अब कुछ नहीं रहा। कभी कठपुतली की तरह पेश आता है, कभी पेण्डुलम की तरह इधर से उधर चक्कर काटता रहता है। उसे पता ही नहीं है कि वह क्यों और किसलिए, किसके लिए पैदा हुआ है और उसे क्या करना है।

जैसा ऊपर वाले नचाते हैं वैसा नाचते रहते हैं। किसी को परवाह नहीं है उस ऊपर वाले की जिसने उसे धरती पर भेजा है। हर आदमी के लिए कोई न कोई गॉड फादर या ऊपर वाला है जिसके इशारे पर सारी बुद्धि, ज्ञान और विवेक भुलाकर वह नाचता और उछलकूद करता रहता है।

अपार भीड़ है जिसके बारे में कहा जाता है कि ये लोग कठपुतलियों और कठपुतलों की तरह औरों के इशारों पर नचैयों की तरह नाचने का काम करते हैं। इनके लिए कोई सा आँगन अपना नहीं होता। जिस आँगन में नाचने पर कुछ नसीब हो जाए वही आँगन उनका अपना हो जाता है।  इसलिए कोई स्थायी आँगन कभी नहीं रहता। आज इसका तो कल उसका। इसी तरह आँगन बदल-बदल कर नाचते रहते हैं।

जब से जवाबदेही और पारदर्शिता का शोर मचा है तभी से सब कुछ नंगा और पारदर्शी हो चला है। हर किसी को यह अच्छी तरह पता चल जाता है कि कौन किसकी कठपुतली बना हुआ है अथवा कौन किसे नचा रहा है और क्यों नचा रहा है।

नाचने वालों से लेकर नचाने वालों तक से भरा रहने लगा है संसार। हर नाचने-नचाने वाले को एक-दूसरे की कमजोरियों का पता है इसलिए सारे नंगे और बदहवास होकर नाच रहे हैं।

किसी को लज्जा का अनुभव नहीं होता। हो भी क्यों जब सारे नंगे और बदरंग हैं और एक-दूसरे के अन्तरंग अंगों से लेकर मन-मस्तिष्क की खुराफातों तक का पता रखते हैं। कहने को पूरी की पूरी व्यवस्था है चींटियों-मकौड़ों, चौपायों से लेकर दोपायों तक के लिए। लेकिन निष्ठा के मामले में सब कहीं न कहीं गड़बड़ है।

अब निष्ठाएं उनके प्रति तनिक भी नहीं रही, न कोई श्रद्धा का भाव रहा है जिनसे हमारा सीधे तौर पर रोजमर्रा का काम पड़ता है। जब से लोगों ने यह जान लिया है कि कठपुतलियां और कठपुतलों के भरोसे कोई काम नहीं हो सकता, न उनकी कहीं कोई चलती है, ये तो नाकारा होकर औरों के रिमोट कंट्रोल से चलने वाली मशीनों के सिवा कुछ नहीं हैं। जो कुछ होता है, जो हो रहा है सब ऊपर वालों के वहाँ से हो रहा है। तब से इन कठपुतलों और कठपुतलियों के प्रति किसी की कोई निष्ठा रही ही नहीं।

सब जानते हैं कि ये मूर्ख और दुर्बुद्धि, स्वाभिमानशून्य लोग केवल नाचने वाले हैं और जो नचाने वाला है उसकी हर एक बात को ब्रह्मवाक्य और आज्ञा मानकर सर झुकाकर इन्हें मानना ही मानना है फिर क्यों इनकी पूछ की जाए।

इसलिए अब सारी की सारी निष्ठाएं स्थानान्तरित होकर उनके पाले में चली गई हैं जो इन कठपुतलियों को नचाने वाले हैं। कठपुतलियां और कठपुतले इंसानी पुतले होकर भी अपने कुकर्मों, आत्महीनता और दासत्व बोध के कारण हाशिये पर आ गए हैं और सभी की निष्ठा भी खो चुके हैं और विश्वास भी।

लगता है कि जैसे ये इंसानी पुतलियां और पुतले पालतु चौपायों की तरह बनकर जंगलराज को आकार देने में जुट गए हैं। लोग समय के अनुसार बदलना अच्छी तरह जानते हैं इसलिए उनकी निष्ठाएं अब पालतुओं के गले में पट्टा डालकर इधर-उधर ले जाकर नचाने वालों पर केन्दि्रत हैं।  कठपुतलियों-कठपुतलों के भाग में विवशता और अंधानुचरी के सिवा और कुछ बचा ही नहीं रह गया है।

तमाशों का नया युग आरंभ हो चुका है। संसार के रंगमंच पर नित नए परिवर्तनों का जो आनंद लेता है वही दुनिया का समझदार प्राणी है।