बजा दो पाञ्चजन्य

अब हो ही जाए आर-पार

बर्दाश्तगी की सारी सीमाएँ अब टूट चूकी, सहिष्णुता के सारे बाँध ध्वस्त हो चुके, सहनशीलता के समन्दरों पानी अपने-पराये, बाहरी-भीतरी गद्दारों की हैवानियतों को देखकर सूख चला है।

अब क्या बाकी रह गया है देखना और सुनना। भारतमाता के होनहार सपूतों ने इसलिए जन्म नहीं लिया है कि वे सीमाओं पर गद्दारों और मजहबी धूर्तों के देशद्रोह को चुपचाप देखते रहें और उनके खौफ की चिंगारी दिखाने भर के लिए शहीद होते रहें।

दुश्मनों की क्या बात करें, लानत हैं अपनों पर जो इतना वीभत्स नर संहार देखने के बावजूद उन लोगों की पीठ थपथपा रहे हैं जो इसके लिए जिम्मेवार हैं।  दुनिया का यही एक मुल्क है जहां इस तरह की बेशरमी, राष्ट्रद्रोह और गद्दारी संबंध सरेआम देखने को मिलते हैं।

पूरा देश मुखर होकर एक साथ खड़ा हुआ है और लगातार विरोध का माहौल बना हुआ है। पुलवामा की इस घटना में देश में उबाल ला दिया है, और उधर बहुत से लोग हैें जो इस पर खुल कर बोल भी नहीं पा रहे हैं।

और तो और जो बयान आ रहे हैं उससे तो लग रहा है कि ये दुश्मन देश के संरक्षक, आश्रयदाता और प्रोत्साहक हैं। इंसानी कमजोरी ने इन्हें इतना संवेदनहीन बना डाला है कि इन्हें सब जगह अपना ही अपना दिखता है और उसे अपना बनाए रखने की खुदगर्जी में ये अपना सब कुछ दाँव पर लगा सकते हैं। फिर चाहे इंसानियत हो या और कुछ।

इसे आतंकवाद या मजहब से ही जोड़कर देखना हमारी मूर्खता भी है और बेमानी। अघोषित युद्ध के इन सारे प्रयोगों को हमें देशद्रोह और युद्ध की ही तरह जानना, समझना और व्यवहार करना होगा।

कबीलाई कमीनेपन से लेकर भीतर-बाहर के नेटवर्क में स्थान बनाकर जो कुछ आतंकी हिस्सा हो रही है उसे अब सीधे तौर पर युद्ध मानकर आर-पार की लड़ाई के रूप में स्वीकारना होगा अन्यथा आज जो कुछ दिखाई दे रहा है वह देश की एकता, अखण्डता और भविष्य के लिए अच्छा नहीं है।

जरूरी है देश के भीतर छिपे बैठे हुए उनके आकाओं को चुन-चुन कर निशाना बनाने की, चाहे वे किसी भी पाश से बंधे क्यों न हों। जो देश का नहीें, वह किसी का नहीं हो सकता। इतने बड़े हमले घुसपैठियों या मददगारों के बिना हो ही नहीं सकते।

आन्तरिक सुरक्षा कवच मजबूत करने के साथ ही स्पष्ट, सुदृ़ढ़ और निर्णायक सोच के साथ अब हो ही जाना चाहिए महासंग्राम। दो दिन रोने-धो लेने, कैण्डल मार्च निकाल देने भर से कुछ होने वाला नहीं है। देश के शहीदों का हमसे यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि हम देश के लिए इतना कुछ करते रहे हैं लेकिन देशवासी हमारे लिए कुछ भी क्यों नहीं कर पाए हैं।

आग उगलने वाले बयानों, भाषणों या कि अहिंसा व शान्ति, सद्भाव और भाईचारे की बातों से कुछ होने वाला नहीं। हम सभी देशवासियों को अपने स्वार्थ छोड़कर स्पष्ट भूमिका में देश के साथ खड़ा होना होगा, अपने राष्ट्रीय चरित्र की नींव मजबूत करनी होगी और ईमानदारी से देशभक्ति को अपनाना होगा।

यह कर पाए तो ठीक है वरना आने वाली पीढ़ियों कोसती रहेंगी सदियों तक। यह कहकर कि इस देश में बिकाऊ, भ्रष्ट और बेईमानों से अपने स्वार्थ के लिए देश का कबाड़ा कर दिया, देश  की बलि चढ़ा दी। खुद को भी जवाबदेह बनना है और हर परिचित की भी जवाबदेही सामने लानी है।

तेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहें न रहें…

1 thought on “बजा दो पाञ्चजन्य

  1. अब किस बात की देरी …
    वक्त आ गया है कूच करने का, असुरों पर टूट पड़ने का। चौतरफा संहार जरूरी है। गद्दारों और रहनुमाओं का खात्मा, साथ-साथ सीमाओं पर भी रौद्र रूप महाभीषण। सब्र, अहिंसा, दया-धर्म, सहिष्णुता, सहनशीलता … खो चुके हैं अर्थ सारे ये शब्द। महाकाल पुकार रहे महासंहार को। आईये, हम सब भी अपने आस-पास के छिपे देशद्रोहियों को चुप-चुन कर खोजें और हवाले करें। उन स्वार्थ संबंधों को भी त्यागें जो हमारी देह को तृप्त करने की शर्त पर देश की बलि चढ़ा रहे। जब तक आर-पार, अपना-पराया साफ-साफ नहीं होगा, तब तक देश को बचाए रखना संभव नहीं होगा। धर्मयुद्ध का आगाज हो चुका है। हम सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारियों के साथ आगे आएं।

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