यथार्थ पर हावी छद्म जिन्दगी

यथार्थ पर हावी छद्म जिन्दगी

हम सब लोग वास्तविकताओं से मुँह मोड़कर या ता नकलची बंदर-भालुओं की जिन्दगी जी रहे हैं या फिर हर तरह से छद्म जिन्दगी को अपनाते हुए यथार्थ को भुला चुके हैं।

हमारा छद्म, कुटिल और स्वार्थपूर्ण व्यवहार हर मामले में छलकने और झलकने लगा है। जो लोग हमारे सम्पर्क में आते हैं वे सभी लोग हमारे बारे में अच्छी तरह यह जानते हैं कि हम कितने पानी में हैं। हमसे संबंधित सभी लोग हमारे बारे में सब कुछ जानते-बूझते हुए चुप रहते हैं।

इसका यह मतलब नहीं है कि लोगों को कुछ पता नहीं है। ये पब्लिक है सब जानती है। हाल के कुछ वर्षों में जो कुछ दिखाई दे रहा है वह सारा छद्म व्यवहार इस बात का प्रतीक है कि हम सभी लोग अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं।

हम अपने परिवार, कुटुम्ब, समाज और क्षेत्रवासियों से लेकर सभी तरह से कट चुके हैं। अपने उत्सवों, परंपराओं, पर्वों, मेलों, त्योहारों और सभी प्रकार के अवसरों से हमारा रिश्ता खत्म होता जा रहा है। प्रकृति से हम दूर होते जा रहे हैं।

अपनी परंपरागत मौलिकताओं और सनातन प्रवाह से छिटक कर इतने दूर पहुंच चुके हैं कि जहाँ लगता ही नहीं कि हम वो इंसान हैं जिसके बारे में कहा जाता था कि देवता भी इंसानी अवतार धारण करने को लालायित रहते हैं।

विदेशियों की नकल के साथ-साथ हम अपनी संस्कृति और संस्कारों को छोड़ते चले गए। आज हममें से बहुसंख्य लोग कहीं के नहीं रहे। न घर के रहे, न घाट के। इसमें अब दो वाक्य और जोड़ देने चाहिएं – न सर्कलों के रहे, न रास्तों-चौराहों के।

और तो और हम अपने भी नहीं रहे।  जब से व्यक्तिकेन्दि्रत स्वार्थों का चलन चल पड़ा है तब से परमार्थ और समाज की सेवा का भाव खत्म हो चला है।

आज बहुत बड़ी संख्या में लोग केवल दिखावों और पब्लिसिटी पर ही जिन्दा हैं और जो कुछ करते हैं वह औरों को दिखाने भर के लिए, खुद को दूसरों के मुकाबले अधिक ऊँचा और बड़ा दिखाने के लिए। हम जो हैं वह न तो दिखाना चाहते हैं, और न ही देखना।

इस मामले में हम लोग कृत्रिम और छद्म जिन्दगी को ही मनुष्य जन्म का अंतिम और सर्वोपरि लक्ष्य मानकर चल रहे हैं।  भरा-पूरा परिवार और कुटुम्ब हो तब भी हमें पराये लोगों को अपना बनाने और घर वालों की उपेक्षा करने और उन्हें हीन मानने का भाव प्रधान हो चला है।

फिर जब से सोशल मीडिया की धूम मची है तब से तो हम और अधिक असामाजिक होते जा रहे हैं। हम अपनों की बजाय उन गैरों की निकटता पाने और उन पर भरोसा जताने के लिए तरह-तरह के जतन करने लगे हैं जो कि न हमारे थे, न हमारे हो सकते हैं।

सहोदर और रक्त संबंधों की अपेक्षा परायों को अपनाने की इस तेज रफ्तार प्रतिस्पर्धा में हम लोग तमाशबीनों के झुण्ड जमा करते जा रहे हैं जो केवल लल्लो-चप्पो और आनंद के सहभागी होने के सिवा हमारे लिए कुछ नहीं कर सकते।

इन तमाशबीनों और छद्म विशिष्टजनों की विस्फोटक भीड़ में आजकल सब तरफ माहौल अलग ही अलग दिखाई देने लगा है। या तो हर तरफ संबंध तलाशने, बनाने और निभाने के चोंचलों की होड़ मची है या फिर संबंधों के समुद्र मंथन मेें स्वार्थ को तलाशने का अभियान जारी है।

सुख और समृद्धि में सब लोग मिठाई खाने के लिए जीभ लपलपाते हुए दौड़े चले आते हैं लेकिन बीमारी या जरूरत के वक्त कोई नहीं आता। आज जो लोग व्हाट्सअप, फेसबुक और सोशल मीडिया के दूसरे क्षेत्रों में हमें जन्मदिन की बधाई देते हुए यशस्वी और दीर्घायु जीवन की कामना करते हैं, अपने परिजनों की मौत पर आआईपी-आरआईपी की टर्र-टर्र करते हैं, संवेदना, शोक और श्रद्धान्जलि व्यक्त करते हैं वे सारे अवसरवादी और मुफतिया संवेदनशील लोग हैं।

यदि सोशल मीडिया पर शुल्क लागू कर दिया जाए तो ये सारे संदेश भूल जाएं। और वे मुर्गे की बांग देना छोड़ दें जो गुडमॉर्निंग, गुड़नाईट आदि की रट लगाये रहते हैें। जैसे कि इनके कहने से ही दिन अच्छा गुजरेगा और इनके कहने से ही रात को नींद अच्छी आएगी।

छद्म दुनिया ने कई अपराधों, संवेदनहीनताओं और दुराचारों को भी जन्म दिया है। यों कहें कि ज्ञान और विवेक के अभाव में हमारी स्थिति बिना ब्रेक वाली गाड़ी जैसी हो रही है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जो लोग छद्म दुनिया को अपनी मान रहे हैं उन सभी के लिए सब कुछ छद्म ही छद्म है।

इन लोगों को यथार्थ से कोई सरोकार नहीं है। यंत्रों और रोबोट्स की तरह ये काम कर रहे हैं और अन्त में कबाड़खाने में जमा होने लायक होते जा रहे हैं।

सच पूछा जाए तो चकाचौंध भरे भौतिक विकास की अंधी दौड़ में हम वो सब भुलाते जा रहे हैं जो हमें इंसान के रूप में स्थापित और प्रतिष्ठित करता रहा है। यथार्थ पर हावी छद्म जिन्दगी का हर फल भी छद्म ही होगा।

6 comments

  1. वर्तमान सत्यता

  2. True sir

  3. वास्तव में यही सच है